अब प्रियंका गांधी वाड्रा भी मैदान में

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Priyanka Gandhi Robert Vadra

प्रसिद्ध पत्रकार ऋषिकेश राजोरिया

अपने देश में चलन है। कोई भी सुंदर तस्वीर दिखती है तो लोग उसकी पूजा करने लगते हैं। राम, कृष्ण, शंकर, हनुमान आदि की तस्वीरें और प्रतिमाएं सदियों से पूजी जाती रही हैं। जनता के इस मनोविज्ञान का अंग्रेजों और कांग्रेस नेताओं ने फायदा उठाया और ऐसे काम किए कि समाज के जेहन में व्यक्ति की पूजा का सिलसिला शुरू हो गया।

जब नेहरूजी प्रधानमंत्री थे उनकी तस्वीरें सब दूर दिखती थीं। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी ऐसा ही हुआ। नरसिंहराव और मनमोहन सिंह कुछ अलग तरह के प्रधानमंत्री थे। उन्हें अपनी तस्वीरें जनता तक पहुंचाने का शौक नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी की तस्वीरें भी खूब आई। देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, चंद्रशेखर आदि प्रधानमंत्रियों को इस तरह का अवसर नहीं मिला।

व्यक्ति पूजा के कारण कांग्रेसियों में इतने सारे नेता होने के बावजूद उसका अस्तित्व एक परिवार पर आकर टिक गया है। जो गांधी परिवार कहलाता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी का बहुत प्रचार हुआ। 1948 में उनकी हत्या के बाद से कांग्रेसी गांधीजी के नाम से सत्ता चलाने लगे। बाद में करेंसी नोटों पर उनकी तस्वीर छप गई। यह किसी व्यक्ति को महापुरुष का दर्जा देकर उसे भगवान का दर्जा देने की शुरुआत थी।

आज गांधी व्यक्ति नहीं, एक ब्रांड हैं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में जो संघर्ष किया और बाद में भारत में जिस तरह की राजनीति की, उससे वे देश के सर्वोच्च स्तर के नेता बने। कांग्रेसियों को सत्ता तक पहुंचाने में महात्मा गांधी की ख्याति का भरपूर योगदान रहा। महात्मा गांधी के नहीं रहने पर कांग्रेस और सत्ता का दारोमदार जवाहर लाल नेहरू ने संभाला। उनके बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी, राजीव गांधी ने सत्ता संभाली। उसके बाद मनमोहन सिंह के माध्यम से सोनिया गांधी की सरकार रही। इस पूरे कार्यकाल में कुछ समय अन्य नेता भी प्रधानमंत्री रहे, जैसे लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, वीपी सिंह, देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, पीवी नरसिंहराव, चंद्रशेखर। लेकिन कांग्रेस की निर्भरता गांधी परिवार पर ही रही।

इस निर्भरता के कारण कांग्रेस दिनोदिन सिमट रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी की आंधी में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट कई। उसके विपक्ष में आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी हैं। उनके बाद अब परिवार की एक और सदस्य उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीति में धूमधाम से प्रवेश की घोषणा हुई है। अभी उनका राजनीतिक पराक्रम सामने नहीं आया है, लेकिन वे एक घोषणा के साथ देश की बड़ी राष्ट्रीय स्तर की नेता बन गई हैं।

टीवी चैनलों पर और राजनीतिक क्षेत्रों में बहस होने लगी है कि प्रियंका के आने से क्या कांग्रेस फिर अपने पैरों पर खड़ी हो पाएगी? प्रियंका गांधी वाड्रा राजीव-सोनिया की बेटी होने के नाते राजनीति में हैं। फिलहाल चुनावी गणित यह दिख रहा है कि कांग्रेस मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के अलावा और कहीं भी मजबूत स्थिति में नहीं है। ज्यादातर राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व है, जो मोदी के खिलाफ महागठबंधन बना रही हैं।

कांग्रेस ने पहले से प्रचार शुरू कर दिया है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। ऐसे में इंडिया टुडे-कार्वी का सर्वे सही मालूम पड़ता है, जिसमें कांग्रेस की बढ़त सौ से कम सीटों पर बताई गई है। ज्यादातर सीटों पर क्षेत्रीय पार्टियों के जीतने की संभावना है। कांग्रेस को सत्ता में रहने की आदत है और उसे लगता है कि मोदी का विरोध जोर पकड़ने पर वह फिर सत्ता में लौट सकती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना के केंद्र में भी राहुल गांधी और गांधी परिवार ही रहते हैं। उप्र में सपा-बसपा के गठबंधन में 2 सीटों के प्रस्ताव को कांग्रेस अपनी किरकिरी मान रही होगी। कांग्रेस की सत्ता उत्तर प्रदेश से ही फली-फूली है। यही कारण है कि प्रियंका गांधी वाड्रा को चुनावी मैदान में लाया गया है। वे कांग्रेसियों की भक्ति-भावना के प्रताप से लोकप्रिय हैं। वे एक ऐसी नेता हैं, जिनका परफार्मेंस देखना अभी बाकी है। कांग्रेस की रणनीति देखकर यही लगता है कि उसे मोदी सरकार को हराने की कम, अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की चिंता ज्यादा है।

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