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इस लोकसभा सीट पर 67 सालों से नहीं लड़ी कोई महिला प्रत्याशी

Posted on: 26 Apr 2019 14:53 by Parikshit Yadav
इस लोकसभा सीट पर 67 सालों से नहीं लड़ी कोई महिला प्रत्याशी

हिसार। लोकसभा चुनावों के लिए नामांकन की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है और हिसार लोकसभा सीट से 46 उम्मीदवार मैदान में हैं। इस बार भी चुनावी दंगल में उतरने वाले सभी उम्मीदवार पुरुष हैं और कोई महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं है। 46 फीसदी महिला मतदाताओं के सामने विकल्प के तौर पर सभी पुरुष उम्मीदवार हैं।यह विडंबना है कि 1952 के पहले आम चुनावों से लेकर अब तक हिसार सीट पर केवल पांच महिला उम्मीदवार ही मैदान में उतरीं और कोई महिला उम्मीदवार जीत कर संसद नहीं पहुंची है। हरियाणा की राजनीति में हिसार लोकसभा सीट कई मायने में अहम है। 17वें लोकसभा चुनावों में इस सीट को जीतने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों ने पूरा जोर लगा दिया है। जीत के समीकरणों को साधते हुए पार्टियों ने बड़े राजनीतिक घरानों से ही उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है।कांग्रेस पार्टी से भव्य बिश्नोईए, भाजपा से बृजेंद्र सिंहए, आप से दुष्यंत चौटाला व इनेलो से सुरेश कौथ उम्मीदवार हैं। इनके अलावा 25 आजाद उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है। गत चुनावों में जहां एक महिला बतौर आजाद उम्मीदवार मैदान में थीए लेकिन इस बार तो आजाद उम्मीदवार के रूप में कोई महिला चुनावी मैदान में नहीं है। कुल 46 उम्मीदवार मैदान में हैं| जो 1952 के पहले चुनावों से अब तक सबसे अधिक संख्या है।

46 फीसदी वोटर महिला

हिसार लोकसभा क्षेत्र में हांसीए हिसारए उचानाए आदमपुरए नारनौंदए नलवाए बवानी खेड़ाए बरवालाए उकलाना शामिल हैं। इन 9 विधानसभा क्षेत्रों में कुल वोटरों की संख्या 15 लाख 80 हजार 349 हैए जिसमें से 7 लाख 28 हजार 514 महिला वोटर हैं। हैरत की बात है कि इतनी बड़ी आबादी राजनीतिक भागीदारी के मामले में पुरुषों से पीछे है।

1984 में पहली बार मैदान में उतरी थीं दो आजाद महिला उम्मीदवार

1952 में देश के प्रथम आम चुनावों से लेकर 1980 तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने महिला उम्मीदवार को लोकसभा का टिकट नहीं दिया। इतना ही नहींए 1952 से लेकर 32 सालों तक कोई आजाद महिला उम्मीदवार भी हिसार लोकसभा से मैदान में नहीं उतरी। 1984 के आम चुनावों में सुमित्रा देवी व हरबंस कौर ने इस परंपरा को तोड़ते हुए पुरुषों के खिलाफ मैदान में ताल ठोकी थी। हालांकिए दोनों को चुनाव जीतना तो दूरए ये महिला प्रत्याशी अपनी जमानत बचाने में भी सफल साबित नहीं हो सकी थीं। इसके बाद 1996 में विद्या देवी बतौर आजाद उम्मीदवार चुनावी जंग में उतरीं और वो भी चुनाव हार गईं।

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