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दीवाना मुझसा नहीं !

Posted on: 22 May 2018 19:16 by Lokandra sharma
दीवाना मुझसा नहीं !

शशांक दुबे

हरी-भरी वादियाँ, शांत-सुरम्य परिवेश, हवाओं में ठंडक, फिज़ाओं में खुशबू, दूर कहीं बज रही बांसुरी. वे दोनों कार से उतरते हैं. लड़की पहाड़ी की ओर कूच करती है और लड़का उसके पीछे-पीछे. दोनों में कुछ यूँ गुफ्तगू होती है:

लड़का: मुड़ मुड़ के देख रही हैं, कुछ खास बात है पीछे ?

लड़की: पीछे आप हैं, कुछ खास बात नहीं?

लड़का: यूँ ही देखती रहेंगी आप, तो यूँ ही चलते रहेंगे हम पीछे-पीछे

लड़की:यूँ ही चलते रहेंगे हम, तो रास्ता कौन देखेगा?

लड़का: रास्ता देखने वाला जो है पीछे-पीछे.

लड़की: और अगर ठोकर लग गई, तो गिरेगा कौन?

लड़का: गिरने की बात कैसी? थामने वाला भी तो है पीछे-पीछे!

लड़की: अच्छा, अब आप आइये, साथ-साथ चलें.

लड़का: जी नहीं, हमारी यही जगह है पीछे-पीछे.

लड़की: पीछे-पीछे पीछे-पीछे! दीवाने तो नहीं हो गए आप?

और फिर संगीत का एक छोटा सा कतरा बजता है, जैसे पानी की नन्ही लहरों के बीच किसी ने नन्हा सा साफ सुथरा कंकड़ मारा हो. ठंड और बढ़ती है, शीत लहर सी. और इस शीतलता में गुनगुनी सी धूप का आभास देते सुरीले रफी तान छेड़ते हैं: दीवाना मुझ सा नहीं इस अम्बर के नीचे. फिर वे थोड़ा ‘हम हमाते’ हैं, थोड़ा ‘इतराते’ हैं और फिर कुछ यूँ गाते हैं कि वादी सात सुरों के इस संगम से झनझना जाती है:

दीवाना मुझ सा नहीं इस अम्बर के नीचे

आगे है क़ातिल मेरा और मैं पीछे-पीछे

दीवाना मुझ सा …

पाया है दुश्मन को जब से प्यार के क़ाबिल

तब से ये आलम है रस्ता याद न मंज़िल

नींद में जैसे चलता है कोई चलना यूँ ही आँखें मींचे

दीवाना मुझ सा …

हमने भी रख दी हैं कल पे कल की बातें

जीवन का हासिल हैं पल दो पल की बातें

दो ही घड़ी का साथ रहेगा करना क्या है तनहा जी के

दीवाना मुझ सा …

क्या स्वर्ग में इस अमृत रस से भी बेहतर कोई चीज़ होगी?

सलाम शम्मी कपूर, नासिर हुसैन, विजय आनंद, मुहम्मद रफी, पंचम और मजरूह सुल्तानपुरी. और हाँ, आशा पारेख जी को भी सलाम
शशांक दुबे
(सदाबहार फ़िल्म ‘तीसरी मंज़िल’ पर लिखे जा रहे एक लेख का अंश)

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