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No man is worth of a woman. यह कहने वाली वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा जी से लम्बे वर्षो बाद कोलकाता में एक पूरी शाम मुलाकात

Posted on: 02 Jun 2018 10:35 by Ravindra Singh Rana
No man is worth of a woman. यह कहने वाली वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा जी से लम्बे वर्षो बाद कोलकाता में एक पूरी शाम मुलाकात

उनकी जीवटता ने मुझे सम्मोहित किया। हम लोगो ने मेरे मुंबई प्रवास के जनसत्ता के दौरान मेरे पत्रकारिता जीवन पर काफी बातें की। सुधा जी वे शख्श हैं जो फेज अहमद फेज, सरदार जाफरी, राजेन्द्र सिंह बेदी, इस्मत चुगताई और कमलेश्वर जैसे लोगो से अपने मिलने-जुलने का एक विशिष्ट रिश्ता रखती थी। वे आज भी बहुत सक्रिय है, बावजूद इसके कि अपने ही जीवन में उन्होंने 12 वर्ष अपनी लोकप्रियता के वावजूद कुछ नहीं लिखा। उनसे मिलते हुए मुझे जमीनी ऊर्जा मिली। उनकी पूरी पढ़ाई कोलकाता में ही हुई है और वे लाहौर में जन्मने के बाद भी अपने आप को बंगालिन कहना पसन्द करती है। इसलिए वे कोलकाता के रसगुल्ले भी बहुत पसंद करती हैं, जो मैंने उनके साथ कल अपनी इच्छा से अधिक ही खाएं।

उनकी लिखी कुछ पंक्तिया आप लोगों को पढ़ाना चाहूंगा।
“मुझे ठीक-ठीक याद नहीं, वह कौन सा लम्हा था, जब उसने पहेली बार मेरे हाथों को मजबूती से थामा और मुझे अपने होने का बहुत साफ-साफ अहसास दिलाया। पर मुझे इतना याद है कि उसकी पैदाइश मेरी डायरी के पन्नों पर हुई थी। मैंने पहली बार अपने ही अनपढ़ हाथों से उसे पढ़ा था, पर वह सही लकीरों की एक मुकम्मल तस्वीर बन पड़ी थी और कागज के पन्नों में शब्दों की आकृति से बाहर निकल जब-तब मेरे रु-ब-रु खड़ी हो जाती थी। कभी बुजुर्ग बनकर मुझे डॉट लगाती,कभी साथी बनकर मुझे तसल्ली देती, कभी गाइड बनकर मुझे जीने के रास्ते दिखाती, जैसे उसने मुझे नहीं, उसने ही मुझे खड़ा किया हो। मैं जानती थी, यह सच भी था- वह मेरी ताकत थी, मेरा सम्बल भी, मेरे होने की वजह थी, मेरी जरूरत थी। अपने वजूद की शुरुआत से ही वह मेरे लिए “लाइफ सेविंग ड्रग्स” की तरह थी।”

राकेश श्रीमाल

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