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नए बन्दर

Posted on: 13 Feb 2019 12:07 by Rakesh Saini
नए बन्दर

अमित मंडलोई

भरे सदन में किसी ने अखबार लहराया। जोर से चीखा ये देखिए, क्या हो रहा है, इस सरकार में। खुलेआम सत्ता का दुरुपयोग हो रहा है। पूरे सदन में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। अगले ही पल जितने गले, उतनी आवाजें गूंजने लगीं। हंगामा जिसके लिए हुआ था, वह मकसद पूरा हुआ। सदन स्थगित कर दिया गया। अब लोकतंत्र चौराहों पर उतर आया है। ट्विटर की चिडिय़ा चहक रही है, सोशल मीडिया पर बहस हो रही है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने-अपने दावे ठोंके जा रहे हैं। सफाई दी जा रही चुनौतियां खड़ी की जा रही हैं।

बाहर निकलते ही कैमरों से मुखातिब नेताओं ने दावे दोहराना शुरू कर दिया। किसी ने कहा, केस आईने की तरह साफ है। उन्हें कैसे पता चला कि सरकार क्या करने जा रही है। कोई तो था, जो मदद कर रहा था। वरना क्या मजाल जो इतनी अहम सूचना लीक हो जाए। कुछ भी तय होने से पहले कोई वहां तक पहुंचकर प्रस्ताव दे आए। ये मजाक नहीं तो और क्या है। कोई तो बिचौलिया होगा, जो लगा था उनके इशारों पर कठपुतलियों की तरह काम कर रहा था। जगह बना रहा था। ऐसी क्या आन पड़ी थी, जो इतनी मेहरबानी की गई। कहीं से कोई जवाब नहीं आया।

फिर किसी ने कहा कि सौदे में शर्तें बदलने की जरूरत क्या थी। नीति के विरुद्ध जाकर गड़बड़ी करने वालों पर कार्रवाई का प्रावधान किसकी मिजाजपुर्सी के लिए बदला गया था। दलाली खत्म करने के लिए जो नियम तय किए गए थे, उनका उल्लंघन कर रास्ते क्यों बनाए गए। अगर नियत साफ थी तो फिर इरादे नेक क्यों नहीं रह पाए। हम खरीदार थे या उनसे भीख मांग रहे थे, जो हर जगह अपना पैर उनके जूतों तले दबाते चले गए। जनता की गाढ़ी कमाई के हजारों करोड़ रुपए दांव पर थे, फिर इतना लिजलिजा होने की क्या जरूरत थी। बाजार में थे तो सिर उठाकर चलते। अपनी शर्तों पर खरीदते।

जबकि यह बात ठोंक बजाकर तय है, हर दुकान पर मोटे-मोटे शब्दों में लिखा है कि ग्राहक मेरा देवता है। तुम कैसे देवता थे यार, जो खुद याचक की भूमिका में नजर आ रहे हो। तुमने कहा, कीमत नहीं बताई जा सकती। फिर अदालत में टायपिंग मिस्टेक के चक्कर में कैग की रिपोर्ट का काढ़ा बना दिया। यहां से सफाई दिलवा दी, वहां से पुष्टि करा दी। बीमार आदमी से मुलाकात का भी बतंगड़ बना दिया। उसके ऑडियो टैप की रील निकालकर उसकी माला बना ली। उसे हवा में लहरा दिया। नाक में नली लगाकर कोई दावा करता रहा कि मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते, तुम उसे साबित करते रहे।

इन्हीं बातों के ढोल बज रहे हैं, बजते रहेंगे, लेकिन कोई जवाब नहीं दे रहा। जवाब में मिलते हैं चंद जुमले, बिचौलिए हम नहीं वे हैं। ये वैसा ही है, जैसे बचपन में स्कूल में कोई पेंसिल चोरी का आरोप लगा दे, तो जवाब में सामने वाला चार आरोप लगा देता था। तू चोर, तेरा बाप चोर, तेरा पूरा खानदान चोर। इतना कहते ही आरोप लगाने वाला या तो कॉलर पकड़ लेता था या मुंंह बिदका कर आगे बढ़ जाता था। यहां दोनों से ही काम नहीं चलना। क्योंकि कॉलर उसकी पकड़ी जाती है, जो खुद को जिम्मेदार माने, यहां तो हर कोई पल्ला झाडक़र चल देने पर आमादा है।

अच्छा यह है कि कोई एक आदमी कभी जवाब देने नहीं आता। कभी ये तो कभी वह। हर बार नया चेहरा देखकर पूछने वाला मजबूरी में शुरू से आता है और ये वही रटे-रटाए जवाब देकर आगे बढ़ जाते हैं। गोपनीयता की शपथ का असली इस्तेमाल यहीं हो रहा है। आप आरोप लगाते रहें हम कह देंगे कि ये गोपनीय मामला है, सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। अब बजाते रहो ढोल।

और फिर ये क्या सबूत-सबूत लगा रखा है। आपको क्या लगता है, आपके कहेंगे ये सबूत हैं और हम मान लेंगे। हमने भी कई ऑडियो-वीडियो टैप रखे थे। ठीक है कि अखबार ने कभी खूब अच्छी रिपोर्टिंग की थी। बड़े खुलासे किए थे, जरूरी है कि अब भी वह वैसा कर रहा हो। लोगों को ट्रेक छोड़ते कितनी देर लगती है। सबूत तो सिर्फ वही है, जो हम पेश करें। आप तो बस वही देखें, वही सुने और वही सोचे भीं। गांधी जी के तीन बंदर अब अप्रसांगिक हो गए हैं। हमने ये नए बंदर इम्पोर्ट किए हैं, इस्तेमाल कर देखिए, बड़े कमाल के हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। फेसबुक वॉल से साभार

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