Breaking News

इंदौर सीट को लेकर भाजपा को मुगालते या घबराहट | Nervousness on Indore Seat for BJP

Posted on: 20 Apr 2019 14:11 by Surbhi Bhawsar
इंदौर सीट को लेकर भाजपा को मुगालते या घबराहट | Nervousness on Indore Seat for BJP

प्रमोद दाभाड़े

इंदौर लोकसभा सीट को लेकर अब तक घोषणा नहीं होने से जहां भाजपा चुनावी अभियान में पिछड़ी हुई है, वहीं सांसद की दौड़ में शामिल नेताओं की दिल की धड़कन बढ़ी हुई है। इंदौर सीट पर उम्मीदवार तय होना सीधे-सीधे यह दर्शा रहा है कि भाजपा इस सीट को लेकर या तो मुगालते में या घबराहट के कारण उम्मीदवार तय नहीं कर पा रही है। वैसे ताई ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला अपनी पराजय के गणित को लेकर किया है। वे स्वयं इस बात को स्वीकार कर चुकी है कि इस पर चुनाव में उनके खिलाफ रिपोर्ट कोई अच्छी नहीं थी।

सूत्र बताते हैं कि लोकसभा चुनाव में ताई के खिलाफ रिपोर्ट अच्छी नहीं थी। इंदौर की सीट भाजपा और सुमित्रा महाजन के लिए प्रतिष्ठा का विषय थी, क्योंकि अगर इस सीट पर ताई चुनाव लड़कर हार जाती को एक लोकसभा स्पीकर की हार होती और ताई की प्रतिष्ठा पर विपरीत असर होता। बताते हैं कि ताई के खिलाफ माहौल बनाने में उनके विरोधी गुट ने चाल चली थी, ताई की छवि पर आज तक किसी ने अंगुली नहीं उठाई थी और उनकी राजनीति बेदाग रही है। उन्होंने कभी संगठन के सामने हटधर्मिता दिखाकर अपनी मांग नहीं मनवाई। इसी का नतीजा यह रहा कि भाजपा में ताई का उत्तराधिकारी घोषित नहीं हो सका। उन्होंने परिवार की राजनीति भी नहीं की, इसलिए पुत्र को चुनावी मैदान में उतरने के लिए संगठन के आगे अपनी प्रतिष्ठा को कभी दांव पर नहीं लगाया।

लगातार इंदौर सीट पर सांसद बनकर भाजपा का परचम लहराने वाली ताई के खिलाफ आखिर ऐसी कौन सी रिपोर्ट दिल्ली पहुंच गई कि ताई आसमान से सीधे जमीन पर आ गई। खैर अगर रिपोर्ट निगेटिव थी तो उस पर पाजेटिव के रूप में दो नम्बरियों का नाम कैसे चला। पहले कैलाश विजयवर्गीय और फिर रमेश मेन्दोला के चुनाव लड़ने की बातें सामने आई। इसके बाद महापौर मालिनी गौड़ और उसके बाद अनेक नाम चले, दौड़े लेकिन पन्नों में ही रह गए। कांग्रेस से पंकज संघवी की घोषणा होने के बाद कैलाश विजवर्गीय और रमेश मेन्दोला का चुनाव लड़ना नामुमकिन है, क्योंकि संघवी परिवार से इन रिश्ते काफी नजदीकी है। इसकी पुष्टि स्वयं कैलाश विजयवर्गीय ने संघवी का नाम घोषित होते ही चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा से कर दी।

भाजपा में घबराहट की वजह

कांग्रेस से टिकट मिलना और खरीदकर लाना यह मायने नहीं रखता, बल्कि कांग्रेस के लिए संघवी का चुनावी मैदान में उतरना मायने रखता है। पंकज ने महापौर चुनाव में भाजपा को बराबरी की टक्कर दी थी। 1998 के लोकसभा चुनाव में पंकज का मुकाबला सुमित्रा महाजन से हुआ था। इस चुनाव में सुमित्रा महाजन को 440047 तथा पंकज संघवी को 390195 वोट मिले। यानी 1998 के चुनाव में सुमित्रा महाजन ने पंकज संघवी को मात्र 49852 मतों से पराजित किया था। जबकि सुमित्रा महाजन तीन बार लगातार विजयी होने के बाद चौथी बार पंकज संघवी के सामने चुनाव लड़ी थी। इस चुनाव में पंकज ने सुमित्रा महाजन से कड़ा मुकाबला किया था। इसकी हकीकत हम इस बात से लगा सकते हैं, कि अगले चुनाव 1999 में कांग्रेस ने पंकज के स्थान पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेश जोशी को टिकट देकर मैदान में उतारा था और वह ताई के सामने 131315 मतों से पराजित हुए थे। यानी की महेश जोशी 131315 मतों के पराजय का आंकड़ा और पंकज के 49852 के आंकड़े की तुलना करें तो सीधे-सीधे महेश जोशी और ताई पर पंकज संघवी भारी पड़े थे। अगर 131315 में से 49852 को घटा दिया जाए तो 81463 मतों से महेश जोशी को पंकज से अधिक मतों से मात खानी पड़ी।

चुनाव लड़ने के लिए कोई आगे नहीं

इधर भाजपा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ताई के बाद चुनाव लड़ने से इनकार और पंकज के मैदान में उतरने के बाद भाजपा की ओर से चुनाव लड़ने के लिए कोई आगे आकर यह कहने वाला नहीं है कि मुझे टिकट दो मैं चुनाव में जीतकर दिखाऊंगा। कागजों और अखबार के पन्नों पर तो नए-नए नाम और नए-नए समीकरण सामने आ रहे हैं, लेकिन आगे आकर चुनाव लड़ने की कोई हिमाकत दिखाने वाला नहीं है। महापौर से पूछने पर उन्होंने संगठन पर पूरा ठिकरा फोड़ते हुए कहा था कि संगठन कहेगा तो चुनाव लड़ेगी, लेकिन स्वयं ने यह नहीं कहा कि मैं चुनाव लड़ूंगी। दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि पिछले 7 चुनाव में यह सीट भाजपा से कांग्रेस जीत नहीं पाई तो अब क्या जीत पाएगी ।

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com