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राष्ट्र संत का डेडबॉडी हो जाना ! कीर्ति राणा की कलम से….

Posted on: 14 Jun 2018 12:52 by krishnpal rathore
राष्ट्र संत का डेडबॉडी हो जाना ! कीर्ति राणा की कलम से….

उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला ….कबीर जैसा न किसी ने लिखा और न कुमार गंधर्व जैसा उनका लिखा किसी ने गाया। गोली मारने से लेकर अस्पताल लाए जाने तक जिन सब लोगों की ज़ुबान पर भय्यू महाराज नाम था, दोपहर ढाई बजे बाद वही नाम डेडबॉडी में बदल चुका था। जिन्हें भी अपने नाम पर घमंड हो उन्हें जान लेना चाहिए कि जब नाम डेडबॉडी हो जाता है तो उस प्रसिद्धि से घर-परिवार के लोग भी जल्दी से जल्दी मुक्ति पाना चाहते हैं। मंदिरों में लाखों का दान कर के फ़र्श पर अपने पूर्वजों के नाम लिखवाने वाले ख़ुश भले ही होते रहें लेकिन दर्शनार्थी तो दूर मंदिर में पोंछा लगाने वाला भी उन नामों को नहीं पढ़ता। श्मशानघाट के रास्ते पर विश्राम स्थल वाले चबूतरे पर भी चाहे जितने मोटे-काले अक्षर में नाम लिखे हों, लोगों की नजर घड़ी पर रहती है बहुत देर हो गई उठाते क्यों नहीं।
अस्पताल से लेकर घर, आश्रम तक सब जगह लोगों का हुजूम था लेकिन ज्यादातर की ज़ुबान पर रह रह कर डेड बॉडी ही आ रहा था। डेडबॉडी एमवायएच पीएम के लिए ले गए हैं, डेडबॉडी घर पहुँची है, गाड़ी से उतार रहे हैं, आश्रम ले गए हैं।महाराष्ट्र से चार्टर प्लेन में चार पांचमंत्री आ रहे हैं इसलिए रोक रखी है डेडबॉडी…..!

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आश्रम में अंतिम दर्शन वाली क़तार में लगे लोगों के लिए ज़रूर वे अब भी भय्यू महाराज थे या श्मशानस्थल पर श्रद्धांजलि देने वाले यही नाम दोहरा रहे थे। बाक़ी सब में तो वही खसरपुसर थी महाराज ने ऐसा क्यों किया? महाराज से हटकर यह चिंता-जिज्ञासा भी थी कि एमपी के सीएम आ रहे हैं क्या, मिनिस्टर वग़ैरह कितने आ रहे हैं।महाराष्ट्र के इन भक्तों को शायद यह अंदरूनी राजनीति पता नहीं होगी कि भय्यू महाराज पर दो नंबर का ठप्पा लगा होना मान लिए जाने के कारण सीएम ने कभी तवोज्ज ही नहीं दी, उल्टे इसी क्षेत्र के इंवेस्टर्स समिट वाले ब्रिलियंट कन्वेंशन हॉल में धर्म धम्म सम्मेलन करवाया तो जाने कहाँ कहाँ के संतों को निमंत्रित किया लेकिन बग़ल में रहने वाले राष्ट्र संत को पूछा तक नहीं। सीएम की इस हरकत का अपने अंदाज में उसी दौरान उन्होंने जवाब भी दिया और अभी जब नर्मदा यात्रा-पौधारोपण में हुए कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे उठने पर सीएम जब संतों के गले में राज्यमंत्री वाले गंजे-ताबीज़ बाँधने के लिए उतावले हुए जा रहे थे तब भय्यू महाराज ही थे जिन्होंने यह लॉलीपाल ठुकरा कर प्रदेश के सारे भाजपा कार्यकर्ताओं का दिल जीत लिया था। 

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माना कि सरकारी नियमों की बाध्यता के कारण सीएम, मंत्री नहीं आए, बहुत संभव है उठावने-शोकसभा वाली भीड़ को चुनावी एंगल से भुनाने के लिए आ जाए, अपनी चिर परिचित शैली में राष्ट्रसंत का गुणगान भी कर दें लेकिन, आज तो मौक़ा चूक गए। कम से कम महाराष्ट्र के अपनी ही पार्टी के सीएम देवेंद्र फड़नवीस के काम से ही सबक़ ले लिए होते।तमाम विरोध के स्वरों के बीच फड़नवीस ने स्व विवेक से श्रीदेवी को गार्ड ऑफ़ आनर का निर्णय लेकर कलाकारों के प्रति सरकार के संवेदनशील होने का परिचय दिया था।यह जानते हुए भी कि भय्यू महाराज के मोहन भागवत से लेकर नरेंद्र मोदी तक से प्रगाढ़ रिश्ते हैं, सीएम अहंकार के आसन से नीचे न देख पाए तो संवेदनशील सरकार का ढिंढोरा पीटने का किस काम का। उनकी सलाहकार मंडली में शामिल अधिकारी भी शायद अपने विवेक से अधिक राग जय जयवंती में गला ठीक करते रहते हैं। सरकार को ऊँच नीच समझाने का दायित्व यूँ तो हर जिले में कलेक्टरों का भी रहता है इंदौर का जो आलम है वह कहाँ छुपा है किसी से।अवसाद में तो भय्यू महाराज थे, उन्सहें तो राहत के लिये आत्महत्या ही हल नजर आया, सरकार क्या अभी से कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव वाले अवसाद में है, दोनंबर वालों से खुन्भनस भूल कर यही देख लेते कि भय्यू महाराज के भक्त भी विधानसभा चुनाव में मतदान करते हैं।via
महाराज की हत्या जैसी घटना हो जाती या उनकी सहज मौत होती तो सरकार दौड़े चली आती, फिर तो शायद स्थानीय लोग भी वैसे ही उमड़ते जैसे उनके यहाँ भोजन-भंडारे में अपना नंबर आने का इंतज़ार करते रहते थे।
पहली बात तो आज के युवा संतों में अपने घर के बड़े-बूढ़ों जैसी आस्था रखते नहीं और उनकी संतों में दिलचस्पी जगे भी तो फाईवस्टार कल्चर वाले संतों को पसंद करते हैं फिर चाहे अवधेशानंदजी हों, श्री श्री रविशंकर हों या भय्यू महाराज। ऐसे आधुनिक संतों में भी भय्यू महाराज सोच और शौक़ में इन सब से दस कदम आगे थे । उन्हें गिटार बजाना पसंद था तो टीप टॉप रहना भी सुहाता था, क़व्वाली सुनने का नशा था तो कविता भी लिखते थे।गादी पर कुर्ता-पाजामा तो शादी समारोह में सूट पहनने भी हिचकते नहीं थे।डंके की चोट अभिनेताओं से अपनी मित्रता स्वीकारने और राज्यों से लेकर केंद्र सरकार तक के संकटमोचन के रूप में किए काम बताने में भी तत्परता दिखाते थे वह मीडिया से चर्चा में कहने से भी नहीं हिचकते थे कोई और संत है क्या जो अपने जीवन, कार्य, व्यवहार को इतना पारदर्शी रखता हो। उम्र-ज्ञान में छोटों को भी इतना स्नेह और सम्मान की अगला मन ही मन सोचता रहे कि मुझ में इतनी ख़ूबियाँ भी हैं क्या? गादी पर बैठने से पहले कॉलेज लाईफ़ में जो कुछ भी किया लेकिन बाद में बीयर से लेकर सिगरेट सब से तौबा कर ली।भले ही कॉलेज में प्रोफेसर ने पढ़ाया हो लेकिन ऐसे तमाम गुरु से चरणवंदना कराने जैसी भूल पर इस युवा संत को कभी मलाल भी नहीं हुआ।दिग्विजय सिंह के लिए इमेज परिणाम

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राजनीति में जैसे दिग्विजय सिंह ने अपनी दूसरी शादी को नहीं छुपाया, वैसा साहस भय्यू महाराज ने भी दिखाया जबकि ऐसा कदम उठाना किसी संत के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। साहस का यह बीज ही समाज की विपरीत प्रतिक्रिया के कारण कुंठा के कैक्टस में तब्दील होता गया। पहली पत्नी की पुत्री अपनी इस दूसरी माँ में माँ जैसा स्पर्श महसूस कर सकी और न ही दूसरी माँ ने भी पति की प्यारी बेटी की नफ़रत को ममता में बदलने की उदारता ही दिखाई।

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