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नर्मदा यात्रा की पुण्याई और बरी होना साध्वी का | BJP Candidate Sadhvi Pragya Acquitted

Posted on: 18 Apr 2019 15:43 by shivani Rathore
नर्मदा यात्रा की पुण्याई और बरी होना साध्वी का | BJP Candidate Sadhvi Pragya Acquitted

भोपाल लोकसभा सीट पर मुकाबला दिलचस्प बन पड़ा है। यह सीट औऱ इससे लड़ने वालों का अपना-अपना इतिहास है और इसमें बहुत सारे दिलचस्प तथ्य भी हैं। मसलन 1993 से 2003 तक दस साल मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री पद संभालने वाले दिग्विजयसिंह ने उसके बाद दस साल तक कोई चुनाव नहीं लड़ा। वैसे लोकसभा का चुनाव लड़े तो उन्हें लगभग तीन दशक ही हो चले हैं। वे 1984 में राजगढ़ से जीते  1989 में हारे और 1991 में फिर जीते थे। उसके बाद लोकसभा का चुनाव(loksabha election) नहीं लड़े।

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उनके विरोध में हिंदूवादी चेहरे के बतौर उतारी गई साध्वी प्रज्ञा भले ही पहली बार चुनाव लड़ रही हों, लेकिन भोपाल के लिए वे दूसरी साध्वी हैं। इससे पहले 1999 में साध्वी उमाश्री भारती भोपाल लोकसभा सीट से निर्वाचित होकर संसद में पहुंची थी। अब बात करें मौजूदूा मुकाबले की तो प्रज्ञा ठाकुर को भले ही कट्टर हिंदूवादी चेहरा माना जाए, लेकिन दिग्विजयसिंह के सामने वे हिंदू मतों का स्पष्ट ध्रुवीकरण कर पाएंगी इसमें संदेह है।

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कारण, बीते साल ही दिग्विजयसिंह ने छह महृीने से ज्यादा समय तक (192 दिन) नमर्द नदी की पैदल परिक्रमा की। 70 वर्ष की आयु में 3300 किलोमीटर पदयात्रा करने वाले को हिंदू विरोधी तो निरुपित नहीं किया जा सकता। हालांकि वे कथित हिंदूवादी नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कट्टर विरोधी रहे हैं और इसी कारण उनसे मुकाबले के लिए संघ भी सारी शक्ति भोपाल में झोंक देगा। इधर, दिग्विजयसिंह के खाते में मां नर्मदा की पुण्याई है तो विधानसभा चुनाव जीतने व सरकार बनवाने का श्रेय भी।

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उन्होंने नर्मदा परिक्रमा के दौरान भी 110 विधानसभा सीटों में संपर्क किया था। भले ही वह यात्रा पूरी तरह से गैर राजनीतिक रही हो। वहीं साध्वी प्रज्ञा का मनोबल भी इन दिनों काफी ऊंचा है। इन पर 2007 में देवास में संघ प्रचारक सुनील जोशी की हत्या का आरोप लगा था, हालांकि उसमें वे बरी हो गई थीं। उसके बाद 29 सितंबर 2008 में मालेगांव (महाराष्ट्र) मस्जिद में हुए ब्लास्ट में वे स्वामी असीमानंद के साथ आरोपी बनाई गईं। उस मुकदमे से उन्हें हाल ही में मुक्ति मिली है। इसके चलते उन्हें नौ साल तक जेल में ही रहना पड़ा। अब वे चुनावी मुकाबले को तैयार हैं। इस मुकाबले में राजनीति के कितने दांवपेंच खेले जाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा और नतीजे पर तो सारे देश की निगाहें लगी ही रहेंगी।

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