नागनाथ गया सांपनाथ बैठ गए

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विधानसभा चुनावों के पहले इंदौर की जनता सबसे ज्यादा परेशान थी तो इंदौर की पुलिस से। इंदौर के इन कथित जनरक्षकों की हरकतें गुंडों के लिए तो दोस्ताना थी और आम जनता के लिए कातिलाना। इंदौर के अफसरों के आगे सारे जनप्रतिनिधि घूटनों के बल बैठे याचक के समान ही नजर आते थे। इसका गुस्सा भी विधानसभा चुनावों में जनता ने दिखाया। जनता ने कांग्रेस के नारे ”वक्त है बदलाव को मान ये सोचा की कुछ तो बदलाव इंदौर में भी होगा। शायद हम बैखोफ हो पाएंगे। हमें अपने घरों से निकलने में डर नहीं रहेगा। पुलिस जनता को बचाने और गुंडों को हटाने का काम करेगी। लेकिन अब शहर अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

शहर के हालात ये है कि नागनाथ गए तो सांपनाथ बैठ गए। जनता ने जिन्हें चुना वो चूजे बने दडबो में छुपे हैं। तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अफसरों ने इन जनप्रतिनिधियों को जरखरीज गुलाम बना दिया है। अफसरों के आगे नेता मिमयाते नजर आते हैं। इंदौर के नेता अब, पहले से ज्यादा दबे कुचले नजर आ रहे हैं। भाजपा के नेता घूटने टेके बैठे थे, तो कांग्रेसी साष्टांग दंडवत करते दिखते हैं। और अफसर इनके आगे उसी मुद्रा में होते हैं जो एक मालिक की होती है।

शहर के मालिक बना दिए गए इन अफसरों के आगे जनता को बलि के बकरे के समान पेश कर दिया है। जिसे अफसर जी भरकर काटें। शहर में ट्रैफिक बद से बदहाल होता जा रहा है। दवा बाजार से छावनी तक की सड़क हो, या फिर सुभाष चौक से लेकर जिला कोर्ट तक की सड़क, मालवा मिल से लेकर अनूप टॉकीज तक की सड़क इन पर गाड़ी ले जाने का मतलब ही होता है परेशानी। यहां पर दिन रात लगने वाले जाम को कई सड़कें ऐसी हैं जिन पर निकलना तो दूर उन पर जाना भी खुद को सजा देने के बराबर है।

कभी बल की कमी का रोना रोने वाले इन कथित निरीह मालिकों के पास आज पहले से 10 गुना ज्यादा बल मौजूद है। लेकिन इस बल के मिलने के बाद ये सारे और ज्यादा मदमस्त हो गए हैं। आज ये 10 गुना बल एक सूत्री मुहिम में जुटा है, वो है शहर के ट्रैफिक सुधार के नाम पर वसूली में। इंदौर में क्राइम रेट बढ़ता जा रहा है, लेकिन इन्हें कोई मतलब नहीं है। पुलिस के ढेरों जवान फूटीकोठी चौराहे पर और उसके आसपास अपनी दुकान लगाए रहते हैं, लेकिन पीछे की ओर मौजूद द्वारकापुरी मुख्य सड़क पर खुलेआम कत्ल होते हैं, लेकिन पुलिस के ये कथित सूरमा कातिलों को पकड़ने में नाकाम हो जाते हैं।

क्राइम की हालत ये है कि लगातार अपराध हो रहे हैं और अपराधी सेटिंग से थाने में पेश होते हैं और ये सूरमा हिंदी फिल्मों की पटकथा जनता के बीच पेश करते रहते हैं। मरीमाता चौराहा जहां दिनभर गाडियां एक दूसरे में उलझती हैं, वहां पर ट्रैफिक सुधारने के बजाए खड़ी गैंग वसूली पर ज्यादा ध्यान देती है। और उसके कारण एक्सीडेंट भी हो रहे हों तो इन्हें कोई मतलब नहीं है। ये ही हालात एसएसपी दफ्तर के पीछे हैं। यहां रीगल पुल के नीच के बोगदे के कारण सड़क पर अंधा मोड बनता है, और उसी अंधे मोड से बसें भी आती जाती रहती हैं ठीक उसी जगह पर गैंग की वसूली टपरी लगती है। फिर अचानक गाड़ी रोके जाने के कारण पीछे से आ रहे वाहन भले ही उसे टक्कर मार दे। कुछ ऐसे ही हालत मधुमिलन चौराहे पर और जवाहर मार्ग पर झंडा चौक पर होते हैं।

इन हालत को सुधारने के बजाए वसूली टोली केवल पैसा उगाने में जुटी रहती है। जो हालत दिख रही है उसके बाद एक बात तो तय है कि मुंबई की डी कंपनी भी इन से ही वसूली करने के गुर सीखती होगी। दाउद के गुर्गे एक ही आडी तेडे कपड़े पहनें दिखते हैं, लेकिन ये तो एक ही वर्दी में दिखते हैं। क्योंकि जो हालात हैं उसमें तो ये दाउद के गुर्गों से जितना मुंबई नहीं डरता दिखता उससे ज्यादा तो इंदौर इन चैंकिग के नाम पर वसूलीखोरों से डरता दिख रहा है। जीत के जश्न में बौराए और अफसरों के आगे दंडवत करने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए की अभी दो बार जनता के हाथ में जो हथियार आने वाला है वो इन नेताओँ के सारे मुगालते ठंडे करने के लिए काफी होगा।

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