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यह हैं महाभारत से जुड़े रहस्यमय श्राप, वचन और आशीर्वाद

Posted on: 27 Jun 2018 11:43 by shilpa
यह हैं महाभारत से जुड़े रहस्यमय श्राप, वचन और आशीर्वाद

नई दिल्ली : अभी तक हमने बर्बरीक और सहदेव के बारे में जाना आज हम सूतपुत्र संजय के बारे में जानेंगे। आज के दृष्टिकोण से वे टेलीपैथिक विद्या में पारंगत थे।

वैसे तो हम महाभारत के संजय के बारे में सभी जानते है।संजय के पिता बुनकर थे इसीलिए उन्हें सूतपुत्र कहा जाता था। उनके पिता का नाम गावल्यगण था। महर्षि वेदव्यास से संजय ने दीक्षा प्राप्त कर ब्राह्मणत्व ग्रहण किया था। वेदादि विद्याओं का अध्ययन करके वे धृतराष्ट्र की राजसभा के सम्मानित मंत्री बन गए थे।

संजय को दिव्यदृष्टि प्राप्त थी, अत: वे युद्धक्षेत्र का समस्त दृश्य महल में बैठे ही देख सकते थे। धृतराष्ट्र को युद्ध का सजीव वर्णन सुनाने के लिए ही व्यास मुनि ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी।नेत्रहीन धृतराष्ट्र ने महाभारत-युद्ध का प्रत्येक अंश उनकी वाणी से सुना।कहते हैं कि गीता का उपदेश दो लोगों ने सुना, एक अर्जुन और दूसरा संजय। यहीं नहीं, देवताओं के लिए दुर्लभ विश्वरूप तथा चतुर्भुज रूप का दर्शन भी सिर्फ इन दो लोगों ने ही किया था।

संजय स्पष्टवादी थे। वो धृतराष्ट्र को सही सलाह देते थे.एक ओर वे जहां शकुनि की कुटिलता के बारे में सजग करते थे तो दूसरी ओर वे दुर्योधन द्वारा पाण्डवों के साथ किए जाने वाले असहिष्णु व्यवहार के प्रति भी धृतराष्ट्र को अवगत कराकर चेताते रहते थे। वे धृतराष्ट्र के संदेशवाहक भी थे।

कौरवों के विनाश के पश्चात अनेक वर्षों तक संजय युधिष्ठिर के राज्य में रहे।इसके बात उन्होंने सन्यास ले लिया और हिमालय चले गये और फिर लौट के वापिस नही आये।

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