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‘मिलन टॉकीज’ के ‘फोटोग्राफ’ में दिखे ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ ‘My dear Prime Minister’ appeared in ‘Photograph of Milan Talkies’

Posted on: 17 Mar 2019 09:26 by Pawan Yadav
‘मिलन टॉकीज’ के ‘फोटोग्राफ’ में दिखे ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ ‘My dear Prime Minister’ appeared in ‘Photograph of Milan Talkies’

विनोद नागर
भारत में नई फिल्मों की रिलीज़ के व्यावसायिक हथकंडे और मनमर्जियाँ सिनेमा के कलात्मक परिदृश्य को बेतरतीब तो बनाते ही हैं; दर्शकों में भी अक्सर इससे खीझ उत्पन्न होने लगती है. साल के बावन हफ़्तों में कई मर्तबा दर्शक क्या देखें और क्या न देखें के अलावा कभी कभी एक साथ क्या क्या देखें की मनःस्थिति से भी गुजरते हैं. इस शुक्रवार भी छोटे और मध्यम बजट की तीन ऐसी फिल्में एक साथ प्रदर्शित हुईं जिन्होंने प्रचार के जरिये दर्शकों को भरमाने के बजाय कन्टेंट के आधार पर ध्यान खींचने की कोशिश की. लेकिन राजधानी भोपाल में पहले से चल रही ‘टोटल धमाल’, ‘लुका छुपी’, ‘बदला’, और हॉलीवुड की ‘कैप्टेन मार्वेल’ के प्रतिदिन एक सौ दस शो के मुकाबले राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ तिग्मांशु धूलिया की ‘मिलन टॉकीज’ और रितेश बत्रा की ‘फोटोग्राफ’ को रिलीज़ के दिन इसके कुल जमा आधे अर्थात पचास शो ही नसीब हुए. जाहिर है जब नवाचार की नई इबारतें लिखने के लिये बोर्ड पर पर्याप्त खाली स्थान ही नहीं मिलेगा तो डस्टर का औचित्य भला क्या रहा..!
सबसे पहले बात ‘रंग दे बसंती’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी सार्थक फिल्मों के रचयिता राकेश ओमप्रकाश मेहरा की नवीनतम कृति ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ की जो काफी समय से बनकर तैयार होने के बावजूद अपने प्रदर्शन की बाट जोह रही थी. इस बीच प्राइम मिनिस्टर शीर्षक से अनुपम खेर अभिनीत ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ जैसी राजनीतिक फिल्म ने भरपूर सुर्खियाँ बटोरने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं दिखाया. ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ को भी प्राइम मिनिस्टर जैसे भारी भरकम शब्द का कोई लाभ मिलेगा इसमें संदेह है. क्योंकि फिल्म में प्राइम मिनिस्टर तो दूर राजनीति का अक्स भी दूर दूर तक नज़र नहीं आता. दरअसल राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म का शीर्षक ही गफ़लत पैदा करता है.
फिल्म की कहानी प्राइम मिनिस्टर के बजाय मुंबई जैसे महानगर में धनाढ्य इलाकों के आसपास बसी तंग बस्तियों में संडास की दुरावस्था और खुले में शौच की मज़बूरी से जुड़े महिलाओं के संत्रास को उजागर करने का मार्मिक उपक्रम है. यदि टॉयलेट एक प्रेमकथा को हम देश के ग्रामीण और अर्धनगरीय क्षेत्रों में हर घर में शौचालय की अनिवार्यता के राष्ट्रीय मिशन का उत्प्रेरक माने तो यह फिल्म महानगरों की तंग बस्तियों के सड़ांध मारते बदबूदार यथार्थ को सरकार के समक्ष गंभीर पड़ताल और समाधान के लिये उलीचती है.
मुंबई के उपनगरीय क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि देश भर में रेलवे लाइन के किनारे हजारों छोटी बड़ी धारावी हमें नज़र आती हैं, मगर वोट बैंक और क्षुद्र राजनीति के चलते कोई सरकार इस नासूर बीमारी के फैलने का माकूल इलाज ढूंढ नहीं पाई है. संजीदा फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा साधुवाद के हकदार हैं कि उन्होंने मुख्यधारा के सिनेमा के बहाव में सामाजिक गन्दगी के तलछट को जस का तस दिखने का साहस किया है. कहने को फिल्म की कहानी मुंबई की तंग बस्ती में रहने वाले कन्नू (ओम कटारिया) द्वारा अपनी माँ सरगम (अंजलि पाटिल) के साथ शौच के दौरान हुए दुष्कर्म की त्रासद घटना के बारे में प्रधानमंत्री को मासूमियत से लिखी चिट्ठी के खोखले असर की अनुगूँज मालूम पड़ती है.
मगर इस यथार्थवादी घटनाक्रम को गंभीर मार्मिक फिल्म में तब्दील करने में कई जगह राकेश चूक गए हैं. बेहतरीन फिल्मांकन और कलाकारों के सहज अभिनय के बावजूद कसी हुई पटकथा के अभाव में फिल्म रास्ते से भटक जाती है. सुग्राह्य समाधानपरक अंत की आस लगाए दर्शक सिनेमाघर से बोझिल मन से बाहर निकलते है. हालाँकि फिल्म का अधिकाँश हिस्सा और कथानक के अनुरूप संवाद मन को झकझोरते हैं.
इधर ‘पानसिंह तोमर’ जैसी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त फिल्म बनानेवाले तिग्मांशु धूलिया की ताज़ा पेशकश ‘मिलन टॉकीज’ भी उनकी शान में और कशीदे नहीं पढ़ती. फिल्म की कहानी में कोई नयापन नहीं है और हाल के वर्षों में हर दसवीं फिल्म में उत्तर प्रदेश का परिवेश देख देख कर दर्शक अघा चुके हैं. तिग्मांशु धूलिया की यह फिल्म टुकड़ों टुकड़ों में ही आपका दिल बहला सकती है पर समग्र रूप से कोई विशेष प्रभाव छोड़ने में असफल है.
इलाहाबाद निवासी अनिरुद्ध उर्फ़ अन्नू (अली फैजल) बॉलीवुड में निर्देशक बन कर नाम कमाना चाहता है इसके लिये वह छात्रों को परीक्षा में पास कराने की जुगत भिड़ाकर पैसे इकट्ठे करने में लगा रहता है. रुढ़िवादी परिवार की मैथिली (श्रद्धा श्रीनाथ) को पास कराने के चक्कर में दोनों एक दूजे को दिल दे बैठते है. शादी के लिये परिजनों के कड़े विरोध के चलते घर से भागने के प्रयास में पकड़े जाते हैं. अन्नू भागकर मुंबई पहुँच जाता है और इधर मैथिली का विवाह किसी और से हो जाता है. वर्षों बाद फिल्म निर्देशक बनकर अन्नू जब इलाहाबाद (प्रयागराज) आता है तो उसे सारा परिवेश बदला हुआ मिलता है. यहाँ से आगे की कहानी में नए मोड़ आते हैं. फिल्म में नवागत श्रद्धा श्रीनाथ और अली फैजल सहित सभी कलाकारों- आशुतोष राणा, संजय मिश्रा, सिकंदर खेर आदि का काम औसत दर्जे का है. अभिनेता के बतौर तिग्मांशु भी खुद को दोहराते भर हैं. फिल्म की कथा, पटकथा, संवाद, गीत संगीत समेत अन्य सृजनात्मक पक्ष साधारण हैं.
करीब छह साल पहले युवा निर्देशक रितेश बत्रा की पहली फिल्म ‘लंच बॉक्स’ को सुधि दर्शकों ने काफी पसंद किया था. लंच बॉक्स के बहाने प्रौढ़ किरदारों में पनपे प्रेम को रितेश ने बहुत ही सलीके से उभारा था. पहली फिल्म से ही अपार संभावनाएं जगाने वाले फिल्मकार से दर्शकों की उम्मीदें बढ़ना स्वाभाविक है. पर सफलता का सर चढ़कर बोलना भारी पड़ जाता है. लगता है रितेश बत्रा के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है क्योंकि उनकी नई फिल्म ‘फोटोग्राफ’ देखते हुए दर्शक सीट पर बार बार पहलू बदलते हैं.
गति और रिदम के अभाव में फोटोग्राफर रफ़ी (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) और गुजराती छात्रा मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) की रोमांटिक कहानी पार्श्व में बजते मोहम्मद रफ़ी के लाजवाब गीतों के माधुर्य के बावजूद दिल को नहीं छूती. सतही ट्रीटमेंट धीरे धीरे पूरी फिल्म को उबाऊ बना देता है. ऐसे में नवाजुद्दीन जैसे समर्थ कलाकार ही फिल्म को टेका नहीं लगा पाते तो सान्य मल्होत्रा की क्या बिसात. अन्य सह कलाकार विजय राज, फारुख ज़फर, जिम आदि काम चलाऊ हैं. भले ही इस फिल्म को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराहना मिली हो, पर भारत में बॉक्स ऑफिस पर लागत निकाल पाना मुश्किल होगा.
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म समीक्षक हैं।

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