मां की दूसरी शादी और संवेदना के गोकुल में बेटे का एप्रीसिएशन…

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अजय बोकिल

आए दिन बच्चियों से बलात्कार और उनकी निर्मम हत्या जैसे राक्षसी कृत्यों और समाज की बहरी होती संवेदनाओं के बीच यह पोस्ट एक अधेड़ मां का वयस्क बेटे द्वारा बहुत अलग ढंग किया गया एप्रीसिएशन है। यह कोई कविता या स्तुतिगान नहीं है, केवल एक मां का मां के अलावा दूसरे किरदारों में स्त्री का विराट मन से किया गया स्वीकार भी है। जिसके लिए साहस, उदात्तता और मानव मन की गहरी समझ चाहिए।

मामला केरल एक शख्स गोकुल श्रीधर का है। छपी तस्वीर के हिसाब से गोकुल की उम्र करीब 40 साल लगती है। उनकी मां ने जो लगभग 60 साल के आसपास की उम्र की होगी, हाल में दूसरी शादी कर ली। अमूमन ऐसी दूसरी शादियां समाज में सहज स्वीकार्य नहीं होतीं। खासकर एक बेटा अपने दूसरे बाप को इतनी आसानी से मंजूर नहीं करता। लेकिन गोकुल ने लीक से हटकर हकीकत के आईने में जज्बातों को तौलकर एक भावुक पोस्ट सोशल मीडिया पर डाली और अपनी मां को नए वैवाहिक जीवन की शुभकामनाएं दीं।

मलयालम में लिखी यह पोस्ट जमकर वायरल हुई और बकौल गोकुल उसकी आशंका के विपरीत हजारों लोगों ने इस पोस्ट की भावना को बेहद सकारात्मक अंदाज में लिया। गोकुल ने अपनी पोस्ट में लिखा कि उनकी मां ने अपनी पहली शादी में बहुत दुख झेले। उन्हें शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ा और यह सब अपने बेटे की परवरिश के लिए उन्होंने सहा। मां की दूसरी शादी पर खुशी जताते हुए गोकुल ने लिखा कि मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की बात कुछ और हो ही नहीं सकती है।

गोकुल के मुताबिक एक औरत, जिसने अपनी जिंदगी मेरे लिए कुर्बान कर दी। एक खराब शादी में उन्होंने बहुत कुछ सहा। कई बार मैंने उन्हें शारीरिक हिंसा के बाद माथे पर से खून गिरते देखा था। मैंने कई बार उनसे पूछा कि वह यह सब क्यों बर्दाश्त कर रही हैं। मां मुझसे कहती थीं कि वह सब कुछ मेरे लिए सह सकती हैं। मेरी मां ने अपनी पूरी जवानी मेरे लिए न्योछावर कर दी, अब उनके अपने बहुत सारे सपने हैं और उन्हें पूरा करने का अवसर। मेरे पास कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि यह कुछ ऐसा है जिसे मुझे किसी से छुपाने की जरूरत नहीं है। ‘मां ! आपकी शादी-शुदा जिंदगी बहुत खुशहाल रहे।’ यही नहीं गोकुल ने अपनी मां की दूसरे पति के साथ फोटो भी शेयर की। गोकुल ने यह भी कहा कि मुझे लगता था कि मेरे इस विचार को समाज के एक तबके में सही तरीके से नहीं लिया जाएगा।’ लेकिन बहुत जल्द मुझे ऐसा लगा कि मुझे किसी से कुछ छुपाने की जरूरत नहीं है और मैंने फैसला किया कि मैं सबसे अपनी यह खुशी शेयर करूंगा।

गोकुल की यह शुभकामनाएं मां को आम तौर पर दी जाने वाली शुभकामनाअों( वैसे मां के लिए कोई शुभकामना भी बहुत मामूली है ! ) से बिल्कुल अलहिदा और झरने के पानी की तरह पवित्र है। इसलिए भी कि गोकुल ने अपने जैविक पिता द्वारा उसकी मां के साथ किए अमानवीय व्यवहार व अत्याचारों को अपनी आंखों से देखा और महसूसा। और मां ने यह सब अपने बच्चों की खातिर चुपचाप सहा भी।

अपने सांसारिक कर्तव्यो से मुक्त होकर अगर वह अपनी गृहस्थी फिर से और इस आस में बसाना चाहती है कि कम से कम जीवन की सांझ में तो सुबह की नर्म धूप सा सुख मिले तो इसमें गैर क्या है? गोकुल की मां ने बेटे की इस शुभकामना को किस रूप में लिया, यह साफ नहीं है, लेकिन बेटे ने पिता की जगह मां के दूसरे पति को त्राता के रूप में स्वीकार किया यह तय है। गोकुल की यह पोस्ट बहुत अलग इस मायने में भी है कि भारतीय समाज में मां- बाप की कपड़े की तरह बदलना आज भी बहुत अनहोनी है। जहां मां और पिता को देव तुल्य माना गया हो, वहां इस बात का छुपा दुराग्रह भी है कि वो दोनो किसी भी स्थिति में गठबंधन सरकार की तरह गृहस्थी का बोझा ढोते रहें। खासकर मां से तो यही उम्मीद रहती है कि वह पति को परमेश्वर माने, चाहे पति उसे कुछ भी माने या कुछ भी न माने। बच्चों के लिए किसी भी कारण से जीते-जी माता-पिता का बदलना रेलवे की बर्थ एक्स्चेंज करने से कई गुना ज्यादा कठिन और यातना भरा होता है।

इसी संदर्भ में महान गायक भारत रत्न पं. भीमसेन जोशी की पहली पत्नी के सबसे बड़े पुत्र राघवेंद्र जोशी की अपने पिता पर लिखी किताब याद आती है। राघवेन्द्र सारी जिंदगी अपने पिता से पिता का अपेक्षित प्यार पाने को तरस गए, क्योंकि भीमसेन जोशी की दूसरी पत्नी और उनके परिजनों ने पंडितजी को इस तरह से फांस लिया था कि वे आखिर तक उस प्रपंच से बाहर नहीं निकल सके। पिता का प्यार राघवेन्द्र के हिस्से में सिर्फ इतना आया कि तमाम खुराफातों के बाद भी पंडितजी के अंतिम संस्कार का अधिकार उन्हें ही ‍िमला। राघवेन्द्र अपनी दूसरी मां और उनकी मां सुनंदा अपनी सौतन को सभी स्वीकार नहीं कर सके।

साफ है कि दूसरे पिता को सिर्फ इसलिए अपना पिता स्वीकार करना कि वो मां को वह सुख और संतोष दे सकेगा, जो पहले पिता से कभी नहीं मिला, असाधारण बात है। यह नारी सशक्तिकरण, उसे पूजने के सतही आग्रह और वक्त पड़े तो उसका नारीत्व निर्दयता से कुचलने की मानसिकता से बहुत अलग है। क्योंकि गोकुल ने मां को देवी की बजाए एक नारी की सहज परिभाषा में महसूस किया। ऐसी नारी, जिसकी अपनी भी कोई जिंदगी है, अपना भी कोई संसार है, अपनी भी कुछ आकांक्षाएं हैं, अपने भी कुछ दर्द और सपने हैं, जो मां के कर्तव्य तले दम तोड़ गए थे। तो क्या हमारा समाज सचमुच बदल रहा है?

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