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‘मोदी मंत्र’ और कांग्रेस के नारायण भाई पकौड़े वाले…!

Posted on: 23 Jun 2018 10:01 by krishnpal rathore
‘मोदी मंत्र’ और कांग्रेस के नारायण भाई पकौड़े वाले…!

वडोदरा के कांग्रेसी नारायण भाई राजपूत यकीनन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘पकौड़ा बिजनेस’ के पोस्टर ब्वाॅय हो सकते हैं। कारण उन्होने ने मोदी के छह माह पहले एक टीवी चैनल को दिए एक खास इंटरव्यू में सुझाए ‘रोजगार मंत्र’ को पूरी संजीदगी से आत्मसात किया। प्रधानमंत्री ने कहा था कि इस देश में पकौड़ा तलकर दो सौ रूपए कमाना भी एक व्यवसाय है और ऐसे असंगठित रोजगारों की संख्या देश में लगातार बढ़ रही है। पीएम के इस बयान पर खूब राजनीति हुई। कई ने इसका मजाक भी उड़ाया। लेकिन नारायण भाई ने इस बयान में अपना आर्थिक भविष्य देखा। उन्होंने ज्यादा समय न गंवाते हुए शहर में पकौड़े की दुकान खोल ली। उनकी दुकान का नाम श्री दाल वड़ा सेंटर है। गुजराती में पकौड़े को दाल वडा कहते हैं। बकौल नारायण भाई मात्र छह माह में ही उनका का कारोबार इतना बढ़ गया कि वे आज 9 लाख रू. महीना कमा रहे हैं। नारायण भाई ने शहर में पकौड़े की 35 फ्रेंचाइजी भी दे रखी हैं। वे रोजाना 10 रू. प्रति 100 ग्राम के भाव से पकौड़े बेचते हैं और हर दिन करीब 600 किलो माल उठ जाता है।जबकि शुरूआत उन्होंने रोज 10 किलो पकौड़े बेचने से की थी। यह साफ नहीं है कि नारायण भाई के पकौड़े में ऐसा क्या है, जो वडोदरा के लोग उनके दीवाने हैं और दूसरा यह कि मात्र छह माह में पकौड़े का व्यवसाय राॅकेट की रफ्तार से कैसे बढ़ सकता है?

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फिर भी नारायण भाई की बात पर भरोसा कर लें। मोदी के जिस इंटरव्यू से वो प्रेरित हुए उसमें प्रधानमंत्री ने जो कहा था, उसके पीछे आशय यही था कि संगठित क्षेत्र के रोजगार को ही रोजगार न माना जाए, बल्कि असंगठित क्षेत्र का रोजगार भी पेट पालने के लिए कम नहीं है। उन्होने कहा था कि इस हिसाब से पकौड़े वाला 200 रू. रोज कमा कर आजीविका तो चला ही लेता है। हालांकि मोदी के इस बयान को देश में बढ़ती बेरोजगारी को कम करने में केन्द्र सरकार की नाकामी को ढंकने और पढ़े-लिखों को भी पकौड़े बेचने के जले पर नमक छिड़कने वाले सुझाव के रूप में पेश किया गया। विपक्षी कांग्रेस ने तो कई शहरों में ‘पकौड़ा प्रदर्शन’ भी किए। छत्तीसगढ़ में पार्टी ने ‘शिक्षित बेरोजगार पकौड़ा सेंटर’ खोला। बगैर यह जाने कि उनका ही एक बंदा पकौड़े बेचकर खुद पार्टी को चंदा देने लायक हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदम्बरम ने तो तंज किया कि अगर पकौड़े बेचना ही रोजगार है तो भीख मांगना भी वैकल्पिक रोजगार है। इस पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जमकर खफा हुए। उन्होने कहा कि पकौड़े बेचना और भीख मांगने की कोई तुलना नहीं है। ( दोनो में कोई समान बिंदु है तो वह यह कि ज्यादातर भिखारी पकौड़े खाकर ही गुजर बसर करते हैं।) मोदी विरोधी हार्दिक पटेल ने कटाक्ष किया था कि बेरोजगार युवा को पकौड़े का ठेला लगाने का सुझाव एक ‘चायवाला’ ही दे सकता है, अर्थशास्त्री ऐसा सुझाव नहीं देता!’ इसका आशय यह था कि चाय बनाने की अगली स्टेज पकौड़े तलना है, जो पीएम ने सुझा दी है। उधर समाजवादी पार्टी ने तो यूपी में ‘पीएम पकौड़ा ट्रेनिंग सेंटर’ भी खोला था।

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सियासत को अलग रखें तो बेशक पकौड़े बेचना एक बिजनेस है। खवय्ये तो इसी में जीवन की सार्थकता देखते हैं। लेकिन यह काम कितने लोगों को रास आ सकता है, यह सवाल है। प्रश्न यह भी है कि लोग ऊंची डिग्रियां लेकर पकौड़े ही बेचें तो डिग्रियां लें ही क्यों ? हालांकि खुद नारायण भाई भी पोस्ट ग्रेजुएट हैं। लेकिन उनके पकौड़े उनकी अपनी डिग्री पर ही भारी पड़ रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि पकौड़े बनाना ही देश में बढ़ती बेरोजगारी का रामबाण उपाय है। बेकारी के मोर्चे पर देश की स्थिति बेहद चिंताजनक है। अगर भारत सरकार के लेबर ब्यूरो के आंकड़े को देखें तो देश में बेरोजगारी 7.1 फीसदी की दर से बढ़ रही है। आज देश में 3 करोड़ से अधिक बेरोजगार हैं। अगर ये सभी सचमुच पकौड़े ही बनाने लगे तो पकौड़े खाने वाले मिलना मुश्किल होंगे। उधर केन्द्र सरकार ईपीएफअो के आंकड़े के हवाले से दावा कर रही है कि बीते फरवरी के पहले की छमाही में 31 लाख लोगों को रोजगार मिला। इसे सही भी मानें तो रोजगार निर्माण की दर जरूरत का केवल दस फीसदी ही है। बाकी नब्बे फीसदी का क्या ?
फिर भी नारायण भाई ने एक रास्ता तो दिखाया है। उन्हें चाहें तो ‘लाखों में एक’ भी कह लें। ठीक उसी तरह कि टाटा, बिडला या अंबानी भी एक ही होते हैं। वे अपवाद हैं। नारायण भाई के पकौड़े की क्वालिटी के साथ उनकी कुछ करने की जिद भी इसके पीछे बड़ा कारण है। बजाए सरकार के भरोसे बैठने के या फिर बेरोजगारी की राजनीतिक माला जपने के। वे चाहते तो केवल नारेबाजी करके भी अपनी राजनीतिक लाइन ठीक रख सकते थे। लेकिन उन्होने पकौड़े बेचकर अपना आर्थिक फ्रंट सुरक्षित किया। नारायण भाई का ह पकौड़ा बिजनेस उन पकौड़ा रोजगार विरोधियों के मुंह पर तमाचा है, जो इसे एक ‘घटिया रोजगार’ के रूप में देख रहे थे। नारायण भाई ने ‘मोदी मंत्र’ को हकीकत में बदला हो, लेकिन खुद अपनी पार्टी को मुश्किल में डाल दिया है। क्योंकि कांग्रेस के लिए पकौड़े का अर्थ मोदी सरकार की नाकामी है। बताया जाता है कि पार्टी ने नारायण भाई को फटकार लगाई और कहा कि उन्होने अपने पकौड़ा बिजनेस के बारे में मीडिया को जो बयान दिया है, उसे बदलें। वरना उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

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कारण पार्टी मानती है कि पोस्ट ग्रेजुएट नारायण भाई भी अगर पकौड़े बेच रहे हैं तो यह मोदी सरकार की आर्थिक विफलता है। ठंडे दिमाग से सोचें तो यह न तो अकेले मोदी की आर्थिक सफलता है और न ही कांग्रेस की सियासी विफलता है। यह नारायण भाई के रूप में महज बतोलेबाजी से हटकर खुद कर गुजरने की इच्छाशक्ति की सफलता है, जिसका श्रेय मोदी भी ले सकते हैं। कांग्रेस को तो खुश होना चाहिए कि उसके पास जुमले बेचने के बजाए वाकई में पकौड़े बेचने वाले लोग हैं।

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