‘विधायक जी की बेटी’

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sakshi mishra

वह बेटी कल मिश्रा जी की कतई नहीं लग रही थी,…कल वह ‘आजतक’ वालों की बेटी थी। अंजना उसके बाप को रगड़ रहीं थीं। बोलिए मिश्रा जी, बताइए विधायक जी, यह तो गलत है न विधायक जी…! अरे एक निरीह बाप से क्या क्या और कितने घंटे कहलवाओगी। उसने कह दिया कि बालिग है, जहाँ चाहे शादी करे जहां चाहे रहे ,मुझे अब कोई मतलब नहीं है। उसको बार बार यही कहते रह कर यह तक कह देना पड़ा कि एक ही बात को कितने बार कहलवाओगी। मैंने बोल दिया और लिख कर भी दे दिया है अब मुझे अपना काम करने दीजिए। लेकिन टीआरपी का पेट इतने से थोड़े भरता है। तो लगी रहीं …। लग रहा था कि अंजना की अदालत में मिश्रा जी की जान तब तक नहीं छूटने वाली जब तक कि वे यह न कह दें कि मेरी संपत्ति भी ले जाओ और बेटी को दे दो, मैं विधानसभा क्षेत्र छोड़ कर ,लंगोट पहन कर हिमालय चला जाता हूं। भावनात्मक दांव मिश्रा जी पर चला नहीं। वे मंजे हुए नेता की तरह एडामेंट थे। भावुक होकर दो आंसू टपका देते तो ‘आजतक’ निहाल हो जाता। पर इसका अर्थ यह नहीं कि मिश्रा जी अपनी पनीली आंखों को पीछे रो नहीं रहे होंगे। भीड़ का नेता एकांत में पिता के मौलिक स्वभाव में आया ही होगा।

कहावत है कि जुआरी और किसान की छाती सबसे पक्की होती है। लेकिन कल आजतक पर दिन भर चली मीडिया ट्रायल फेस कर रहे विधायक राजेश मिश्रा की हालत देख कर लगा कि जुआरी और किसान के साथ इसमें ‘बेटी के बाप’ को भी जोड़ देना चाहिए। मैंने गौर किया कि अंजना और भाग कर शादी करने वाले दंपत्ति का चेहरा तब यकायक बुझ गया जब बेटी के बाप ने कहा कि’ …जहां रहें खुश रहें, मुझे अब कोई मतलब नहीं है!’ पूरा विवाद जिस एक बुनियाद पर खड़ा था उस पर साफ जवाब दे कर भी मिश्रा जी को रगड़ा जाने लगा। सारे सवाल बाप से, भागवानों से नहीं। इतनी साफगोई कब आएगी कि लड़के लड़की से भी कुछ सवाल हों। मसलन लड़के से पूछा जाए कि क्या करते हो। यकीनन जबाब मिलेगा कि …प्यार। यही सबसे बड़ी पूंजी है। प्यार हो ही गया है तो सिर पर छत और पेट में रोटी का इंतजाम हो ही जाएगा। प्रेमियों को इससे ज्यादा क्या चाहिए। अकल ठिकाने तो तब आती है जब खुद की संतानोत्पत्ति होती है और पैदा हुए खुद के बच्चों को पालने, बढ़ाने,पढ़ाने की जिम्मेदारी सिर पर आती है। जब खुद इसी प्रक्रिया से गुजरेंगे तब समझ में आएगा कि मिश्रा जी भी अपनी जगह सही थे। उनका भी एक पक्ष था , धैर्य से सुन लेने में कोई बुराई नहीं थी।

संविधान ने बालिगों को शादी का अधिकार दिया है तो किसी बाप को भी इतना अधिकार तो दिया ही है कि वह सक्षम होकर अपना विवाह खुद कर लेने वाली संतान से नाता तोड़ सके। विधिक रूप से बाप को अधिकार है कि वह स्वअर्जित संपत्ति से संतान को वंचित कर सके। सिर्फ पुश्तैनी जायदाद पर हक रह जाता है जिसके लिए संतान दावा कर सकती है। लेकिन यहां तो लग रहा था कि अंजना इस दंपत्ति को बेटी के बाप के गले लटका कर घर भेजना चाहती थी। मनोवैज्ञानिक दबाव कि मिश्रा जी आप यह रिश्ता स्वीकार क्यों नहीं कर लेते। करने के पहले पूछा नहीं और अब कहा जा रहा है, ‘…बताइए मिश्रा जी! सारा देश आपसे सुनना चाह रहा है।’ मिश्रा जी को राजनीति में रहते सामाजिक ताने बाने से बरतना और झटके सहन करने का माद्दा आ गया है ,उनकी जगह कोई साधारण पिता होता तो इतनी मीडिया ट्रायल के बाद उसे दिल का दौरा पड़ सकता था या वह आत्महत्या को मजबूर हो सकता था।

बालिग होने का अर्थ सिर्फ मनचाही शादी करने का अधिकार मिल जाना भर नहीं है। बालिग हो जाने का तात्पर्य यह भी है कि अब आप अपने बाकी सभी निर्णय लेने के लिए भी परिपक्व हो चुके हैं। सीधे शब्दों में शादी करने के बाद अपनी घर गृहस्थी के खर्चे और संचालन भी आप ही को देखना है। बालिग होने के बाद इस सब के लिए आप अपने बाप पर निर्भर नहीं रह सकते।…यो यह कहानी बाप की सार्वजनिक घोषणा के बाद खत्म हो जाना चाहिए थी। पुलिस अधीक्षक ने भी पूरी सुरक्षा देने की गारंटी दे दी।

लेकिन बाप ने बेटी पैदा करने के साथ राजनीति में आने की भी जुर्रत की थी इसलिए वह मीडिया की अदालत में खड़ा होकर अपने खानदानी इतिहास का चीरहरण करवा रहा था। एक बाप के कपड़े उतार कर चैनल वाले अपनी रोटी का जुगाड़ करने में जुटे थे। उनके सामने यही विश्व की सबसे बड़ी समस्या थी। बारिश हो नहीं रही, कर्नाटक मंगलवार तक के लिए टल गया है कोई खबर न थी। कांग्रेस और पाकिस्तान को कितना गरियाएं। मौलानाओं, काश्मीरियों को बुलाकर कितना खदेड़ें। क्रिकेट भी खामोश हो गई। ऐसे में एक भागी हुई बेटी का बाप मिल गया दिन भर की टीआरपी का खेवइया बन कर। गांव, गरीब, खेती किसानी, मजदूर की दिहाड़ी, भटकते युवा तुम्हारे विषय नहीं हैं। इसके लिए तुम्हें स्टूडियो से बाहर जाने की जहमत करना पड़ सकती है। तुम्हें तो आन द टेबल सब चाहिए है। तो तुम चैनल वालों के भाग से एक विधायक की लड़की भाग गई, वह भी दलित के साथ। बहुत बड़ी क्रांति हुई है ! अब वह दलित नहीं है संविधान का मानसपुत्र है। और लड़की अब विधायक जी की पुत्री नहीं है। आजतक, एनडीटीवी, वायर और क्विंट की बेटी है।

जाति मसाला बन गई , जीवन के बुनियादी सवाल पीछे छूट गए। जो परिवर्तन संविधान के सहयोग से अपनी शांत प्रकृति से समाज में प्रवाहित हो रहा है उसे पराजित और विजेता की तरह प्रस्तुत कर देने के अपने खतरे हैं। इससे परिवर्तन के प्रवाह की गति तेज न होकर प्रतिक्रियात्मता से बाधित ही होगी। फिर जरूरी है कि कोई शर्मा दुबे तिवारी का लड़का होता तो मिश्रा जी सिर्फ जाति देखते और कुछ न देखते। भगवान करे ऐसा न हो लेकिन यदि हो तो उस 23 साला भगिनी को यदि 38 साला पतिदेव भविष्य में परेशानी पैदा करें तो उसे वापस इन चैनलों के दफ्तरों में जाना चाहिए। अब वे ही श्रेष्ठ अभिभावक हैं। मिश्रा जी बाप थे, अब तो सिर्फ विधायक हैं। नेताओं का क्या भरोसा ?

रजनीश

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