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“सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है”

शशिकांत गुप्ते

यह एक कहावत है,लेकिन यह कहावत पढ़ सुन कर प्रश्न उपस्थित होते हैं? vyangसावन में कोई अलग किस्म के अंधे होते हैं क्या?सावन के अंधे को ही हरा हरा क्यो दिखता है?इस धरा पर बहुत सी ऐसी जगह हैं,जहाँ बारह महीने ही हरियाली ही रहती है,क्या वहां के बाशिंदों के लिए बारह महीने ही सावन होता है? ऐसे अनेक व्यावहारिक प्रश्न मन मे उपस्थित होते हैं। उक्त कहावत में “सावन के अंधे”कहा गया है।अंधे तो अंधे ही होते हैं, सावन के ही क्यों? मैं अंधत्व पर सोच रहा था।कुछ लोग जन्मांध होते है,कुछ दुर्घटना से हो जाते है,कुछ चिकित्सकों के गलत उपचार रूपी योगदान से पूर्व जन्म के संचित पापों का प्रायश्चित करने के लिए अंधे हो जाते हैं।

संत सूरदासजी के जीवन की दो कथाएं प्रचलित है एक वह जन्म से अंधे थे,दूसरा उन्होंने अपनी स्त्री आसक्ति से मुक्ति पाने के लिए बबूल के कांटो से अपनी आँख फोड़ ली थी। इतना सब पढ़ने लिखने के बाद भी मुझे “सावन के अंधे” होने का कोई संतोषजनक जवाब नही मिला। मैं एक व्यंग्यकार मित्र के पास गया,उसके समक्ष अपनी जिज्ञासा प्रकट की,उसने अपानी व्यंग्य की शैली में ही मुझे समझाया।सर्वप्रथम इस कहावत को व्यंग्य ही समझना चाहिए।

उदाहरण के लिए उसने मुझे एक कहानी सुनाई,जो बचपन में उसने सुनी थी,एक कुम्हार था।उसके पास एक गधा था।यह गधा सिर्फ और सिर्फ हरी घांस ही खाता था।गर्मी के दिनों में जब घास सुख गई,तब गधे ने घांस खाना छोड़दिया,कुम्हार को चिंता हो गई।कुम्हार का एक सलाहकार मित्र था,वह कुम्हार को जब भी कोई भी समस्या आती थी,वह हर एक समस्या के लिए सलाह देता था।इस सलाहकार ने सलाह दी,गधे को हरे रंग का चश्मा पहना दो,हरे रंग का चश्मा पहनने से गधे को सुखी हुई घांस भी हरी दिखाई देगी।यह सलाह काम कर गई गधा घांस खाने लग गया, गधे इस कहानी से मुझे समझ मे आ गया सावन के अंधे कौन होते हैं। इन दिनों भक्तों में भी अंधभक्तों का प्रतिशत दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है।इन सभी को सावन के अंधे तो नहीं कह सकते लेकिन इन्होंने एक व्यक्तिपूजक चश्मा जरूर लगा रखा है।

इस चश्मे के कारण व्यक्ति के द्वारा लिए जा रहे हरएक निर्णय में इन लोगों को सिर्फ और सिर्फ अच्छाई ही दिखाई देती है।निर्णय के क्रियान्वयन की प्रतिक्षा किए बगैर ही उत्साहित हो जाते हैं।इस किस्म के भक्त संमोहन तो नही,नजरबंदी के शिकार हो जाते हैं।मैने सड़क पर करिश्मे दिखाते हुए जादूगरों को देखा है,यह सड़कछाप जादूगर भी कुछ अचंभित करने वाले करिश्मे दिखाते हैं।मुह से भारी भरकम लोहे का गोला निकाल कर दिखा देते हैं,इस तरह लोहे का गोला मुह से निकालना,कभी किसी के लिए संभव ही नहीं है।

ऐसे ही करिश्मे इन अंध भक्तों को इनका पूज्यनीय व्यक्ति दिखाता है।यह भक्त स्तुति करने लग जाते हैं। मेरे मित्र ने एक और किस्सा सुनाकर मुझे समझाने की कोशिश की। मित्र बोला, सड़क पर मंजन बेचने वाले को देखो,यह व्यक्ति दंत मंजन तो बेचता है सड़क पर, लेकिन अपने दन्त मंजन की गुणवत्ता का बखान करने के लिए यह बड़े बड़े चिकित्सको,हकीमों,वैद्यो को भी चुनोती देते हुए, दंत मंजन बेचता है। लोग खरीदते भी है। व्यक्तिपूजक अंधे और सावन के अंधों में यही साम्यता होती है। एक अपवाद को छोड़ कर इन लोगों को हरे रंग से नफरत होती है।