मीडिया पर कसता शिकंजा और माफिया की ‘मीडियागिरी’

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अजय बोकिल

करीब ग्यारह साल पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में एक लेख छपा था। इसमें कहा गया था कि जैसे देश में तेल और रेत माफिया है, उसी तरह ‘मीडिया माफिया’ भी है। ‘सामना’ ने यह टिप्पणी राज्य के तत्कालीन ( और अब भी) उपमुख्यमंत्री अजीत पवार द्वारा मीडिया को दी गई, उस नसीहत को लेकर की थी, जिसमें पवार ने नांदेड में एक रैली में कहा था कि आप लोग अभी भी सुधर जाअो, क्योंकि मीडिया उद्दयोग बंद होने की कगार पर है। लेख में यह भी कहा गया था कि पहले पत्र कार लोकतंत्र के लिए लिखते थे, अब विज्ञापनों के लिए लिखते हैं। पत्र ने यह सवाल भी उठाया कि क्या मीडिया भी अब माफिया नहीं है? अगर है तो इसे ‘कंट्रोल’ कौन करेगा?

यूं ‘सामना’ एक राजनीतिक पार्टी का मुखपत्र है। पत्रकारिता की दृष्टि से उसकी विश्वसनीयता बहुत कम है। लेकिन जो इशारा उस लेख में किया गया था, वह मध्य प्रदेश जैसे राज्य में फलीभूत होता दीख रहा है। मप्र सहित समूचे देश का मीडिया इन दिनो आर्थिक संकट के साथ-साथ अपनी विश्वसनीयता, सत्ता के दबाव, प्रताड़ना, आत्ममंथन और आत्मग्लानि से भी गुजर रहा है। एक तरफ सत्ता के आचरण पर शक करना भी मीडिया के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रहा है, दूसरी तरफ मीडिया का एक वर्ग खुद ही माफिया की शक्ल में पूरी व्यवस्थाख को चुनौती दे रहा है। जहां एक तरफ पारंपरिक मीडिया से अपेक्षा जयजयकार की है और इंकार पर प्रताड़ना झेलने का अभिशाप है। वहीं दूसरी तरफ माफिया के रूप में मीडिया के जो चेहरे उजागर हो रहे हैं, उनसे और उनके कारनामों से खुद मीडिया की नजरें शर्मसार हैं। इन आपराधिक हरकतों ने मूल्यों को लेकर मीडिया की लड़ाई को कजमोर ही किया है।

इसी दौरान एक खबर जिसका चीन कोरोना और राजस्थान में कुर्सी की लड़ाई के हल्ले में ज्यादा जिक्र न हुआ, वो ये कि केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) को एक नोटिस भेजकर 84.48 करोड़ रुपये का जुर्माना भरने को कहा है। पीटीआई पर आरोप है कि उसने आवंटित जमीन का अवैध तरीके से उपयोग किया। उसके कार्यालय ने नियमों का उल्लंघन किया है। एजेंसी से कहा गया है कि वह गैर न्यायिक स्टांप पेपर पर हलफनामा दे कि 1 अप्रैल 2016 से पूर्व प्रभावी संशोधित जमीन दरों के हिसाब से जमीन के गलत इस्तेमाल/नुकसान शुल्क की अदायगी करेगी। साथ ही जहां भी नियमों का उल्लंघन किया गया है, उसे ठीक किया जाएगा। ‘लैंड एंड डेवलपमेंट’ ऑफिस ने कहा कि अगर एजेंसी ने जुर्माना राशि तय समय सीमा में नहीं भरी तो उस पर 10 फीसदी अतिरिक्त जुर्माना भी जोडा जाएगा। अगर पीटीआई ने शर्तों का पालन नहीं किया तो उसे दी गई रियायत वापस ले ली जाएंगी।

पहली नजर में नोटिस इसलिए ठीक लगता है कि नियमों के उल्लंघन का ‍‍अधिकार तो किसी को नहीं है, मीडिया को भी नहीं। लेकिन नोटिस‍ सिर्फ इस कारण से नहीं दिया गया है। उसके पीछे असली कहानी पीटीआई द्वारा चीन में भारतीय राजदूत का इंटरव्यू कर उसे प्रसारित करने की है। इस इंटरव्यू ने मोदी सरकार को ही मुश्किल में डाल दिया था। प्रसार भारती ने इसे ‘देशद्रोह’ की संज्ञा देते हुए, पीटीआई को कड़ी चेतावनी दी और नोटिस भी भेजा। पीटीआई ने इसका क्या जवाब दिया, पता नहीं चला, लेकिन अब उसे 84 करोड़ रू. जुर्माना भरने का नोटिस भी थमा दिया गया है। इसके पीछे सरकार की मंशा पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

दूसरी तस्वीर खुद मीडिया के काले दामन की है। हालां‍कि मीडिया का बड़ा वर्ग इस दामन से दूर है, लेकिन यह भी सच है कि नियम-कानून को धता बताने वाले प्रदेश के चार मीडिया मालिक इन दिनो जेल की हवा खा रहे हैं। इनका आगे क्या होगा, कुछ होगा भी या नहीं, इन सवालों के जवाब अभी मिलना बाकी हैं। जो कहानियां सामने आ रही हैं, उससे इतना तो साफ है कि यहां मीडिया की भूमिका नगरवधू की तरह हो गई थी। उसकी आंखों की जुबान कुछ और थी तथा घुंघरूअों की भाषा कुछ और। यहां मीडिया का इस्तेमाल कभी ढाल तो कभी खंजर के रूप में किया जा रहा था। मीडिया का मुखौटा लगाकर ये माफिया अरबों की टैक्स चोरी कर रहे थे या फिर लोगों को हनी ट्रैप में फंसा रहे थे। एक माफिया ने तो बाकी तीनों को इस मायने में पीछे छोड़ दिया कि वह खुद यौनाचार के भी उस घृणित मुकाम तक जा पहुंचा, जहां केवल शर्म से सिर झुक जाता है।

जो कहानियां अब उजागर हो रही हैं, उनका संकेत यही है कि इन माफिया के लिए मीडिया का मतलब केवल अपने अवैध व्यावसायिक हितों की मजबूत ढाल बनाना और अपने दुराचार को अभिव्यक्ति की आजादी के तिरपाल से ढंकते रहना है। दरअसल ये बेशर्मी के वो मुखौटे हैं, जो अभी भी साबित करने में जुटे हैं कि वो ही सही हैं, बाकी सब गलत हैं। जो हो रहा है, वह महज बदले की कार्रवाई है और भ्रष्ट व्यवस्था की पोल न खुलने देने के लिए की जा रही सरकारी तुरपाई है।

इन बातों में कितनी सच्चाई है, कितनी अफवाह और कितने क्षेपक हैं, यह तो बाद में उजागर होगा। लेकिन जिस मध्यप्रदेश की जमीन यह घट रहा है, उसे अपनी पत्रकारीय उपलब्धियों के पुनरावलोकन की आवश्यकता है। ये पुनरावलोकन पत्रकारीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, उसकी सोद्देश्यता, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता को लेकर होना जरूरी है। खासकर इसलिए कि जिस मप्र की माटी ने कई शीर्ष पत्रकार हिंदी पत्रकारिता को दिए हैं, वही मध्यप्रदेश अब पत्रकारों के मुखौटों में उन चेहरों को चीन्ह रहा है, जिनमें डाॅन, दलाल, शोषक, चोर और दबंग सब एकाकार हो गए हैं।

दुर्भाग्य से इनमें से कुछ का दावा यह है कि वे अपने स्वार्थ और सुविधा के साथ पत्रकारिता के चीर को हरण होने से बचाए हुए हैं। इनमें से कुछ का यहां तक कहना है ‍कि व्यवस्था के लूप होल बेनकाब करने के कारण उनकी मुश्कें कसी जा रही हैं। इसमें आंशिक सचाई हो सकती है। लेकिन जिस मकसद से इस माफिया की ‘मीडियागिरी’ चल रही थी, वह समूचे मीडिया को आत्मावलोकन पर विवश कर रहा है। माफिया की इस मीडियागिरी ने पत्रकारिता के लाल कालीन को जमीन के काले धंधे, गुटखे, शराब व शबाब के कारोबार तथा बेखौफ टैक्सचोरी की शक्ल में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छो़ड़ी।

कुलमिलाकर मीडिया पर यह दोहरी मार है। एक बाहर से तो दूसरी भीतर से। पत्रकारिता मिशन से कमीशन तो कब की हो चुकी थी, लेकिन माफिया ने उसे फुल करप्शन में तब्दील कर दिया है। जाहिर है ‍कि माफिया ये खेल अकेले नहीं खेल सकता। इसमें वो सारे तत्व भी शामिल हैं, जो आज मीडिया को माफिया मुक्त करने का दावा कर रहे हैं। मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह मीडियागिरी और माफियागिरी की मिटती लक्ष्मण रेखाअों को फिर कैसे खींच कर गहरा करे। इस महाभारत का एक सिरा पीटीआई को मिला नोटिस है तो दूसरा सिरा अखबार के आड़ में तमाम धतकर्मों का ‘लायसेंस’ है। असली मीडिया पर कसते इस सरकारी शिंकजे और माफिया मीडिया के बखौफ होने से वो पत्रकार या मीडियाकर्मी हैरान हैं, जो खबरें लेने-देने, सूंघने और ‘ब्रेक’ करने के फर्जी ‘नशे’ में ही बाल सफेद किए जाते हैं।