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वॉच डॉग से पेट डॉग बना मीडिया… निष्पक्षता का भ्रम न पालें | Indian Media became Pet Dog from Watch Dog…

Posted on: 09 May 2019 16:05 by bharat prajapat
वॉच डॉग से पेट डॉग बना मीडिया… निष्पक्षता का भ्रम न पालें | Indian Media became Pet Dog from Watch Dog…

राजेश ज्वेल –

बिहार के बहुचर्चित अंखफोड़वा कांड पर बनी सफल फिल्म अजय देवगन की गंगाजल में एक ईमानदार पुलिस अफसर का यह संवाद कि समाज जैसा है उसे वैसी ही पुलिस मिलती हैमौजूदा लोकसभा चुनाव के परिपेक्ष में भारतीय मीडिया पर भी खरा उतरता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में जनता के अधिकारों की रक्षा तीन घोषित और एक अघोषित स्तंभ मीडिया पर टिकी है।  हालांकि इन चारों ही स्तंभों का क्षरण होता रहा है, बावजूद इसके जनमानस में कोर्ट के बाद मीडिया की विश्वसनीयता अभी भी कायम है।

मीडिया को वॉच डॉग की संज्ञा दी गई है, मगर इन दिनों उसकी हालत पेट डॉग यानी पालतू कुत्ते जैसी नजर आने लगी है। जिसके चलते ही अभी राजनीतिक और पत्रकारिता जगत में गोदी मीडिया शब्द चर्चा में आ गया है। अभी लोकसभा चुनाव पूरे शबाब पर है और भारतीय मीडिया भी चुनावी रण में सराबोर है, क्योंकि यही वह अवसर होता है जब वह अपना खजाना तो भरता ही है, वहीं सत्ता के नजदीक आने से लेकर उसमें भागीदारी की जुगत भी आसानी से बैठा ली जाती है। मौजूदा वक्त में मीडिया के तीन रूप हो गए हैं। परम्परागत प्रिंट मीडिया के अलावा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का वर्चस्व तो कुछ वर्ष पूर्व ही स्थापित हो गया था, अब तीसरा यानी सोशल मीडिया भी उफान पर है। अधिकांश दिक्कत इस सोशल मीडिया के कारण ही उत्पन्न हुई है, जिसके चलते फेक न्यूज का एक बड़ा कारोबार स्थापित हो गया।  इसकी शुरुआत पहले भाजपा ने की और 2014 का चुनाव सोशल मीडिया के दम पर लड़ा गया, जिसमें पहली बार भाजपा को स्पष्ट बहुमत भी मिला और प्रधानमंत्री से लेकर सारे नेताओं को सोशल मीडिया की ताकत समझ में आई। यही कारण है कि ट्वीटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम से लेकर व्हाट्सएप पर भाजपा सबसे आगे रही और उसके आईटी सेल ने गड़े मुर्दे भी खूब उखाड़े और यह सिलसिला लगातार जारी है, जिसके चलते मुगलों से लेकर अंग्रेजों और फिर नेहरू, इंदिरा और गांधी परिवारों के बारे में झूठे-सच्चे किस्से गढ़े जाते रहे।  कांग्रेस सहित अन्य दलों को भी हारने के बाद सोशल मीडिया की अहमियत समझ में आई और उसके आईटी सेल ने भी इन्हीं तिकड़मों पर काम करना शुरू किया।  हालांकि अभी भी सोशल मीडिया पर भाजपा भारी है।

लोकसभा चुनाव में मीडिया कितना निष्पक्ष है इसकी पड़ताल करते वक्त हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। इस बारे में दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका का उदाहरण बड़ा मौजूं है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने चुनावी कैम्पेन में थे, तभी उनकी अमेरिका मीडिया से भिड़ंत होती रही, जो बाद में भी बदस्तूर जारी है। मीडिया से जुड़े हर व्यक्ति को अमेरिकन प्रेस कॉर्प की ओर से राष्ट्रपति ट्रम्प को उनकी शपथ ग्रहण से पहले लिखे गए पत्र को अवश्य पढऩा चाहिए। इस पत्र में ट्रम्प को चेतावनी देते हुए कहा गया कि हम पहले से खुद को बेहतर बनाएंगे और आपको अपना एजेंडा जिस तरह तय करने का अधिकार है उसी तरह हमारा एजेंडा भी हम तय करेंगे। हम क्या छापें और कैसे छापें यह हमारा अधिकार है। आपने हमारी विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर एक तरह से अच्छा ही किया। अब हम ज्यादा सतर्क रहेंगे।  खुद के लिए ज्यादा कड़ी कसौटियां बनाएंगे और आप अधिक से अधिक 8 साल इस पद पर रहेंगे, लेकिन हम तब से हैं जब से यह गणतंत्र स्थापित हुआ है।  इस महान लोकतंत्र में हमारी भूमिका बार-बार रेखांकित हुई है। आपने हमें यह याद करने का अवसर दिया है कि हम क्या हैं और हमारा काम क्या है। इस पत्र में राष्ट्रपति ट्रम्प से यह भी कहा गया कि हम आपके वक्तव्यों को कवरेज जरूर देंगे, लेकिन आपके झूठे वायदों को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करेंगे और उनकी सच्चाई जनता को बताएंगे। आपके शपथ लेने से पहले हमने सोचा कि यह स्पष्ट कर दिया जाए कि हम आपके प्रशासन और अमेरिकी मीडिया के बीच संबंधों को कैसे देखते हैं। आप यानी ट्रम्प अपने प्रशासन को कवर करने की पत्रकारों को अनुमति नहीं देंगे, लेकिन यह हमारे लिए एक चुनौती है और सूचनाएं हासिल करने का कोई और तरीका हम ढूंढ लेंगे। मिस्टर ट्रम्प अगर आपको अपने नियम तय करने का हक है, तो मीडिया को भी ऐसा करने का अधिकार है। इस पत्र की दुनियाभर के मीडिया जगत् में खूब चर्चा हुई और भारत के मीडिया ने भी ट्रम्प के शपथ ग्रहण समारोह के वक्त इस पत्र की खूब चर्चा की, मगर इसके आधार पर उसने अपने गिरेबां में झांकने की हिम्मत नहीं दिखाई। क्या कल्पना की जा सकती है कि भारतीय मीडिया इस तरह का कड़ा पत्र भारत के प्रधानमंत्री के नाम लिख सकता है..? ऐसा नहीं है कि मीडिया के सामने पहले कभी चुनौती नहीं रही। जब देश में पंचायत से लेकर शीर्ष तक कांग्रेस की सत्ता थी तब भी मीडिया का अपने मन मुताबिक इस्तेमाल किया जाता था और आपातकाल के दौरान तो विपक्ष के साथ-साथ मीडिया भी सत्ता प्रतिष्ठान के प्रमुख निशाने पर रहा, लेकिन तब मीडिया की रीढ़ की हड्डी इतनी कमजोर नहीं हुई थी। लिहाजा उसने दमदारी से आपातकाल का विरोध किया और आज भी आपातकाल के काले प्रेत अघोषित रूप से मीडिया सहित अन्य संस्थानों पर मंडराते नजर आते हैं। मौजूदा वक्त में अघोषित आपातकाल दबे पांव प्रवेश कर भी चुका है। आज मीडिया स्पष्ट रूप से राजनीतिक दलों की तरह खेमों में बंट गया है। किसी भी अखबार या न्यूज चैनल को पढ़कर या देखते वक्त स्पष्ट समझ में आ जाता है कि इसका झुकाव किस दल के प्रति ज्यादा है। मौजूदा वक्त में आजाद भारत का सबसे महंगा चुनाव लड़ा जा रहा है, जिसमें भाजपा ने प्रचार-प्रसार से लेकर हर मोर्चे पर कांग्रेस सहित अन्य दलों को पछाड़ रखा है। प्रायोजित साक्षात्कारों से लेकर रात-दिन चलने वाली बहसों और रैलियों, रोड शो के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर दिखाई जाने वाली खबरें यह बताती है कि मीडिया किस तरह वॉच डॉग की अपनी भूमिका से पेट डॉग की भूमिका में परिवर्तित हो गया है। कुछ ही अखबार, चैनल और न्यूज पोर्टल ऐसे हैं जो सच्चाई दिखाने का साहस करते हैं, लेकिन उन्हें पहली फुर्सत में ही बिकाऊ से लेकर देशद्रोही और पाकिस्तान की मानसिकता वाला करार दे दिया जाता है। यह एक सामान्य बुद्धि की बात है कि मीडिया वही है और उसमें काम करने वाले पत्रकार भी वही है जो कल तक कांग्रेस के घोटाले उजागर कर रहे थे वे आज अगर भाजपा से जुड़े किसी घोटाले पर चर्चा करते हैं तो बिकाऊ कैसे हो जाते हैं..?

सभी राजनीतिक दलों और सत्ता प्रतिष्ठानों को मीडिया से निकटता चाहिए। ऐसे में किसी भी मीडिया संस्थान या पत्रकार के लिए बड़ा आसान है सत्ता प्रतिष्ठान के गले में हाथ डालकर मलाई सूतना। किसी पत्रकार को 25-30 या उससे भी अधिक साल काम करते हुए हो गए और आज अगर वह किसी मुद्दे पर कुर्सी पर बैठे व्यक्ति से सवाल पूछता है तो सोशल मीडिया पर मौजूद कोई भी भक्त बिरादरी वाला उसे विरोधी पार्टी का पेड वर्कर बता देता है। यानी किसी भी वरिष्ठ पत्रकार की काबिलियत सोशल मीडिया के जरिए कोई भी नौसिखिया धुल-धुसरित कर देता है। उदाहरण के लिए द हिन्दु के एडिटर एन. राम ने राफेल को लेकर कई बड़े चौंकाने वाले खुलासे किए। लेकिन उन्हें भी इस तरह की आलोचनाओं का सामना सोशल मीडिया के साथ-साथ प्रिंंट और न्यूज चैनलों के माध्यम से करना पड़ा। जबकि ये वही एन. राम हैं, जिन्होंने कांग्रेस कार्यकाल में बोफोर्स घोटाले को तो इससे ज्यादा धारदार तरीके से उजागर किया था, लेकिन तब उन्हें किसी ने देशद्रोही नहीं कहा..? आजाद भारत के इतिहास में जितना कवरेज बोफोर्स घोटाले को मिला उतना आज तक किसी भी अन्य घोटाले को नहीं मिला और यह सच्चाई न सिर्फ जगजाहिर है, बल्कि गूगल सर्च कर आज भी देखी जा सकती है।

यही स्थिति कोयला घोटाला, 2जी स्पैक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेलों में हुए हजारों करोड़ के कांग्रेसी राज के घोटालों को उजागर करने वाले मीडिया संस्थानों और उनसे जुड़़े पत्रकारों की है। यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जब लोकपाल आंदोलन को लेकर अन्ना हजारे ने अनशन किया तो देश के सारे मीडिया ने जबरदस्त उसका प्रचार-प्रसार किया।  प्रिंट मीडिया के साथ-साथ देश के सभी न्यूज चैनलों ने 24 ही घंटे अन्ना के आंदोलन का लाइव टेलीकास्ट किया और इसमें अधिकांश अवसरों पर तो विज्ञापनों की भी अनदेखी की गई। उस वक्त कांग्रेस से जुड़े लोगों ने ये आरोप लगाए थे कि इस आंदोलन के पीछे भाजपा और संघ का हाथ है और मीडिया को भी खरीद लिया गया। वो ही मीडिया आज मोदी सरकार से सवाल पूछने पर पाकिस्तान परस्त और कांग्रेसी से लेकर बिकाऊ बड़ी आसानी से करार दे दिया जाता है। जबकि एक हकीकत यह भी है कि मीडिया का एक बड़ा तबका सत्ता प्रतिष्ठान की गोदी में जा बैठा है। यही कारण है कि जनता से जुड़े मूलभूत सवाल और मुद्दे गायब कर दिए गए और उनकी जगह पाकिस्तान, कश्मीर, मंदिर-मस्जिद, श्मशान-कब्रिस्तान जैसे फिजुल के मुद्दों ने ले ली और सोशल मीडिया के जरिए भी जनता के दिमाग में साम्प्रदायिकता का जहर भर दिया गया। गरीबी, किसानी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से लेकर जनहित से जुड़े सारे मुद्दे बड़ी चतुराई से हाशिए पर फेंक दिए गए। इसमें अंतत: नुकसान किसका है..? मीडिया को तो इसलिए परेशानी नहीं है क्योंकि हर सत्ता उसे अपने कब्जे में रखना चाहती है। अब मीडिया पर कार्पोरेट का कब्जा हो गया है और रामनाथ गोयनका जैसे मालिक-सम्पादक भी नहीं रहे जो अपना सब कुछ दाव पर लगाकर खोजी पत्रकारिता करते रहे। हालांकि अभी भी उम्मीद खत्म नहीं हुई है और देश में कई अखबार और उनके पत्रकार ये काम बखूबी कर भी रहे हैं।  लेकिन उन्हें देश विरोधी, वामपंथी और डिजाइनर पत्रकार कहकर सत्ता प्रतिष्ठान के साथ-साथ सोशल मीडिया के जरिए बदनाम किया जाता है।

आज नहीं तो कल यह बात समझ में भी आएगी कि जनता के अधिकारों की रक्षा में जिस तरह स्वतंत्र न्याय पालिका की जरूरत है, उसी तरह मीडिया की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। मीडिया को बिकाऊ करार देने वालों को यह बात भी नहीं भूलना चाहिए कि जो निष्पक्ष हैं अगर वे भी बिक गए तो जरूरत पडऩे पर उनकी लड़ाई कौन लड़ेगा..? पाठकों को अगर स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया देश और समाज के लिए चाहिए तो उसे उसकी कीमत भी चुकाना पड़ेगी… सबसे पहले तो सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा परोसे जाने वाले झूठ पर आंख बंद कर भरोसा करना बंद करना होगा और इसके लिए ऐसे मीडिया को चिन्हित कर उनकी अनदेखी करने के अलावा सोशल मीडिया पर भी अपना दिमाग लगाना पड़ेगा। क्योंकि सुबह से रात तक राजनीतिक दलों की पेड आईटी गैंग जो भी सच्ची-झूठी पोस्ट तैयार करती है उसे जनता बिना सोचे-समझे कॉपी-पेस्ट कर देती है। आज 25 रुपए का अखबार पाठक को मात्र 2 रुपए में चाहिए और वह उम्मीद करता है कि उसे विज्ञापन से ज्यादा सच्ची खबरें पढऩे को मिले। यही स्थिति न्यूज चैनलों की है  5-10 रुपए प्रतिमाह या लगभग नि:शुल्क ही ये न्यूज चैनल चलते हैं, जिनका पूरा दारोमदार विज्ञापन और सत्ता प्रतिष्ठान से मिलने वाली कमाई पर ही निर्भर रहता है और उस पर सोशल मीडिया तो लगभग मुफ्त ही है। मीडिया को पेट डॉग से फिर वॉच डॉग बनाने की जिम्मेदारी जनता पर ही है… वरना वह मैनेज खबरें ही देखती और पढ़ती रहेगी। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है।
मीडिया में इतना बवाल क्यों है… जो बातें निराधार है, उनका उबाल क्यों है?

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