महिलाओं ने अब हल्ला बोल दिया है

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निर्मला भुराड़िया

‘हैशटेग मी टू” अभियान के तहत अपना यौन उत्पीड़न करने वाले पुरुष की हरकत सामने लाने वाली महिलाओं ने अब हल्ला बोल दिया है और कपाट खुलते ही टप्-टप् कई कंकाल टपकने लगे हैं। कुछ लोग उन महिलाओं से सहानुभूति रख रहे हैं जिन्हें ‘मी टू” की लहर ने वो अवसर और साहस दिया कि अपने साथ यौन-दुर्व्यवहार करने वाले का नाम होंठों पर ला सकें। मगर दुखद यह है कि ऐसे लोगों की संख्या कम है। इन लड़कियों पर अविश्वास करने वालों की संख्या ज्यादा है। इससे भी अधिक दुखद यह है कि सोशल मीडिया पर और सामान्य बातचीत में लोग इन स्त्रियों के लिए गंदे और अमर्यादित शब्दों का उपयोग कर रहे हैं, यह उनकी खुद की मानसिकता को बताता है।

यह सच है कि इस दौर में कई स्त्रियों ने अपने सशक्तिकरण के कानूनों जैसे दहेज, घरेलू हिंसा जैसे कानूनों का दुरुपयोग भी किया है। बात न बने तो अंगूर खट्टे वाली मानसिकता वाली स्त्रियां भी होती हैं जैसे-‘शादी के वादे के बहाने बलात्कार किया” का इल्जाम लगाने वाली स्त्रियां। अपना काम निकलवाने के लिए समर्पण कर देने वाली स्त्रियां। मगर हर किस्से को इसी एक लाठी से नहीं हांका जा सकता। अगर एक आदमी पर दस-दस लड़कियां इल्जाम लगा रही हैं तो दाल में कुछ काला है। यदि लड़की अपना दमकता हुआ करियर छोड़कर चली गई थी तो निश्चित ही वह बेहद डरी हुई थी। उसे खारिज नहीं किया जा सकता! कुछ कहते हैं यदि लड़की सच्ची थी और बात में दम था तो पहले क्यों नहीं कहा?

जनाब, यह लड़की पर इल्जाम नहीं यह तो वह प्रश्न होना चाहिए जो हम खुद से पूछें और सवाल ढूंढे। किसी भी लड़की ने पहले इसलिए नहीं कहा होता है कि उसकी औकात उस वक्त नहीं होती और शिकारी शक्तिशाली होता है। दरअसल, इसका उल्टा सही है शिकारी अपने शिकार के लिए उन्हीं वनरेबल लड़कियों को चुनता है जिनके बारे में उसे यह पता होता है कि उनके सिर पर छत नहीं। जो लड़कियां सामाजिक-आर्थिक रूप से निहत्थी होती हैं उन्हीं को निशाना बनाया जाता है क्योंकि शिकारी जानता है वे शिकायत नहीं कर पाएं, करेंगी तो मानेगा नहीं, फिर भी जिद करेंगी तो उन्हें दबाया जा सकेगा। यह करियर ही नहीं घर-परिवार में भी होता है कि शिकारी उन्हीं लड़कियों पर निशाना साधता है जो चुप रहने को विवश है।

आप देखिए शेल्टर होम्स में यौन-शोषण कितना बड़ा सच है, क्योंकि वे बच्चे-लड़के और लड़कियां दोनों ही अनाथ होते हैं। अत: अब जब ‘मी-टू” की लहर चली है, एक के बाद एक लड़कियों में बोलने का हौसला खुला है, समाज में वातावरण बना है, उनमें से कुछ सशक्त भी अब हुई हैं, तो अब नहीं तो कब बोलेंगी। अक्सर लड़कियां इसलिए भी नहीं बोलती हैं कि हमारा समाज उल्टे उनका ही चरित्रहनन करने लगता है। देखो ना! अब जो बोल रही हैं उन्हें क्या-क्या नहीं कहा जा रहा। प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? हम शिकारी के बजाए शिकार को बेइज्जत करते हैं? यह मानसिकता नारी-द्वेषी है।

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