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बाबा डीके द्वारा अनुवादित मयूर नाटक ने गजब ढा दिया | Mayur Natak by ‘Baba DK’

Posted on: 05 May 2019 17:27 by Mohit Devkar
बाबा डीके द्वारा अनुवादित मयूर नाटक ने गजब ढा दिया | Mayur Natak by ‘Baba DK’

चंद्रशेखर बिरथरे

बनार्ड शा ने नाटक पिगमेलीयन एक ग्रीक पौराणिक चरित्र पर लिखा था । ग्रीक पौराणिक कथा के अनुसार पीगमेलियन को स्वयं के द्वारा बनाई कलाकृति से प्यार हो जाता है और वह कलाकृति जीवित हो जाती है पिगमालियन नाटक की संगीतमय प्रस्तुति माय फेयर लेडी के रूप में की गई थी । इस नाटक पर विश्व में कई देशों में कई फिल्में बनाई गई है ।

विख्यात रंग मनीषी बाबा साहब डी. के . की जन्मशती प्रसंग पर उन्हीं के द्वारा स्थापित नाट्य संस्था नाट्य भारती इंदौर द्वारा बाबा साहब द्वारा रूपांतरित नाटक “मयूरी “दिनांक 4/ 5 /19 की संध्या को आनंद मोहन माथुर सभागृह में खेला गया ।

हमारे शास्त्रों में लिखा है मनुष्य जन्म से शुद्र होता है और कर्म से अपना भाग्य लिखता है और समाज में अपनी भूमिका निश्चित करता है । नाटक की कथावस्तु यह है कि मयूरी एक अशिक्षित हरिजन कन्या ( श्रुतिका जोग कलमकर )को किस तरह एक सेवानिवृत्त अध्यापक (श्री राम जोग) सुमानवी बना पाता है और फिर स्वयं को कन्या का भाग्य विधाता मान बैठता है । इसी बीच एक कर्म कांडी एवं सनातनी ब्राह्मण व्हाई . आर . जोशी (संजय जैन )का सामना एक अशिक्षित हरिजन कन्या से होता है और फिर अध्यापक द्वारा काया कल्प किए जाने के बाद आशा लता पुजारी से मिलकर वाई. आर. जोशी इसे अपनी बहू बनाना चाहता है ।
अभिनय के मामले में डा. संजय जैन सबसे बाजी मार ले जाते हैं उनका मेकअप – गैट अप / वेषभूषा ( आहार्य अभिनय) उनके चरित्र को सजीव करता है । उन्होंने वाय .आर.जोशी के चरित्र के साथ पूरी तरह आत्मसात करके गजब का अभिनय किया है । श्रुतिका ( मयूरी) अतिरेक अभिनय का शिकार रही , हालांकि नाटक के उत्तरार्ध में उन्होंने शिक्षित मयूरी को जीने की कोशिश की । वे अति उत्सुकता के साथ अभिनय करती नजर आती हैं । भले ही चरित्र की मांग लाऊड हो परंतु फिर भी पात्र में ठहराव आवश्यक है । श्री राम जोग अपने पात्र के साथ खेलते हैं । वे बहुत बहुआयामी , प्रतिभावान कलाकार है उनकी मंझी हुई एवं सटीक संवाद अदायगी में व्यंग्य , सहज सरल स्वाभाविक प्रकार से अभिव्यक्त होते हैं ।
श्री राम जोग अपने पात्र के साथ खेलते हैं । वे बहुत बहुआयामी , प्रतिभावान कलाकार है उनकी मंझी हुई एवं सटीक संवाद अदायगी में व्यंग्य , सहज सरल स्वाभाविक प्रकार से अभिव्यक्त होते हैं । अंतिम दृश्य में वाय. आर. जोशी को वे जिस प्रकार प्रताड़ित करते हैं वह उनके अद्भुत अभिनय की बानगी है ।
मंच सज्जा भी अत्यंत कल्पनाशीलता का परिचय देती है ज्ञ से ज्ञान ग से गणेश और गणना , क से कलम और कर्म का संकेत है । समयोचित कविताओं , उध्दरणों का प्रयोग नाटक को आनंददायी बनाता है । कुछ संवाद तो बेहद प्रभाव पैदा करते हैं ।
अनिरुद्ध किरकिरे का संगीत सुमधुर और कर्णप्रिय है शशिकांत किरकिरे का संगीत संयोजन भी बढ़िया है । जय हार्डिया( नामदेव )अपनी छोटी सी भूमिका में छाप छोड़ते हैं

नाटक का अंतिम दृश्य जिसमे गुरु एवं शिष्य का मधुर मिलन होता है नाटक के पाश्चात्य-मूल का होना दर्शाता है ।अभिजीत कलमकर ही प्रकाश योजना दृश्यानुरुप होने के साथ-साथ दृश्य को उभारने में मदद करती है । निर्देशक श्री राम जोग का निर्देशन बेहद परिपक्व और परिमार्जित है ।
नाट्य भारती की पूरी टीम को dc ढेरोंh बधाइयां । बाबा साहब को यह उनकी सच्ची श्रद्धांजलि है ।

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