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मनमोहन भी नहीं मोह सके मतदाताओं का मन | Manmohan not even tempted voters

Posted on: 30 Mar 2019 11:41 by Surbhi Bhawsar
मनमोहन भी नहीं मोह सके मतदाताओं का मन | Manmohan not even tempted voters

कांग्रेस के प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव के मंत्रिमंडल में 1991से 1996 तक लगातार पांच साल वित्त मंत्री रहे और फिर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की दोनों सरकारों में दस साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहनसिंह तमाम शैक्षणिक व राजनीतिक उपलब्धियों के कभी मतदाताओं का मन नहीं मोह सके। उन्होंने जीवन में एक ही बार लोकसभा का चुनाव लड़ा। साल था 1999 और सीट थी दक्षिण दिल्ली। कांग्रेस ने उन्हें सुरक्षित सीट मानकर चुनाव मैदान में उतारा लेकिन वे भाजपा के विजय कुमार मल्होत्रा के सामने नहीं ठहर पाए।

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बहरहाल, न इससे पहले और न ही बाद में उन्होंने कोई चुनाव लड़ने की कोशिश की। वे लगातार असम से राज्यसभा में चुने जाते रहे। प्रधानमंत्री रहते भी उन्होंने असम का ही प्रतिनिधित्व किया। वैसे राजनीति से इतर बात की जाए तो डॉ. सिंह की उपलब्धियां कम नहीं। वे भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर (1982 से 1985) और योजना आयोग के उपाध्यक्ष (1985 से 1987) भी रह चुके हैं।

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प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार रहे और पद्मविभूषण से अलंकृत डॉ. सिंह ने अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियाई विकास बैंक में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है। वे देश-विदेश की अनेक यूनिवर्सिटीज में मानद प्रोफेसर भी हैं। बतौर वित्त मंत्री देश में आर्थिक खुलेपन की नीति या वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए द्वार खोलने का श्रेय उनके ही खाते में है। तमाम आलोचनाओं और राजनीतिक मतभेदों व आलोचनाओं के बाद भी कमोबेश उन्हीं नीतियों पर अगली सभी केंद्र सरकारों को भी चलना पड़ी, फिर भले ही उनका नेतृत्व अटलजी ने किया हो। डॉ. सिंह 1957 से 1976 तक पंजाब से लेकर दिल्ली तक विभिन्न विश्वविद्यालयों में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के तौर पर अध्यापन करते रहे हैं।

@जोग लिखी

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