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मामा रे मामा! वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की टिप्पणी

Posted on: 04 Nov 2018 12:58 by krishnpal rathore
मामा रे मामा! वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की टिप्पणी

मप्र में शिवराज के रथ के पीछे बच्चे मामा मामा कहते दौड़ लगाते रहे और इधर कार्तिकेय का मामा कब शिव-साधना के स्नेह बंधन तोड़ माया मोह के जादुई कालीन पर बैठकर कांग्रेस के कमल में खदान, टेंडर, मोहमाया के रिश्ते तलाशने लग गए इसकी भनक जीजी और जीयाजी तक को नहीं लगी। ऐसा संभव तो नहीं कि घर में बन रहे देशी घी के पराठे से पूरी ग्वाड़ी (चाल) महकने लगे और घर के सदस्य कहें कि हमें तो खुशबू ही नहीं आई…!
कैलाश विजयवर्गीय ने एक दिन पहले प्रेम-पुचकार से जिन बाप-बेटे के गले में भगवा दुपट्टा डाला था, उस धमाके पर कमलनाथ ने मसानी वाला गीला कंबल डाल दिया।

देखा जाए तो संजय को साथ लाकर कमलनाथ ने कई निशाने साधे हैं। महाकौशल में कांग्रेस को कितनी मजबूती मिलेगी यह वक्त तय करेगा लेकिन बालाघाट के बारासिवनी से संजय को चुनाव जितवा कर अब शिवराज परिवार से चुनाव पूर्व के हिसाब चुकते करने में मदद मिलेगी। प्रेमचंद गुड्डू के पैर में बंधे काले डोरे की गठान दिग्विजय सिंह ही खोल सकते हैं, इसके जबाव में संजय मसानी को कांग्रेस में लाकर कमलनाथ ने कैलाश-दिग्गी की अदृश्य प्रेम कथा में संजय मसानी के किरदार को शामिल कर स्टोरी में बीस साल बाद जैसा ट्विस्ट दे दिया है जिसमें हर किरदार पर शक होता कि खूनी पंजे वाला यही होगा। संजय मसानी नामक शख्स का भाजपा की राजनीति में कार्यालय के प्रेस नोट लगाने वाले भृत्य जितना भी योगदान नहीं है, इससे जान सकते हैं कि उनके भाजपा छोड़ने से भूचाल नहीं आने वाला है। मसानी पार्टी के प्रति लायल रहे भी होंगे तो अपने स्वार्थों की पूर्ति होने तक। हां उनके इस कदम से बहन साधना के विश्वास के धागे टूट गए हैं, शिवराज जीजा और भांजे कार्तिकेय के लिए ये मामा महाभारत के पात्र समान हो गया है।अभिनेता अक्षय कुमार के मप्र में इवेंट कराने से लेकर टॉयलेट एक प्रेमकथा और पेडमेन के लिए फायनेंसर के रूप में यदि सारी खुदाई एक तरफ वाले हालात बनते रहे तो उसके पीछे शिवराज मंडली की सदाशयता भी रही है। दस बारह साल पहले तक गोंदिया निवासी इस युवक ने दिलीप बिल्डकॉन के मुकाबले अपना साम्राज्य खड़ा किया तो (कथित) सख्त अफसर कहे जाने वाले (प्रमुख सचिव) इकबाल सिंह बैंस की सदाशयता दर्शाना भी है। आज तक लोग अपने काम कराने के लिए बैंस का तोड़ नहीं तलाश सकें और संजय आंख कान बन जाए तो यह सीएम हाउस के प्रति आदरभाव का ही तो प्रतीक है।

गोंदिया का यह साधारण सा युवक देखते देखते माइंस मालिक हो जाए, प्रशासनिक अधिकारियों वाले अरेरा क्लब की महफिलों में बड़े बड़े अधिकारी कुर्सी ऑफर करने लगें तो यह सीएम हाउस की अदृश्य शक्ति बिना संभव नहीं है। दिल्ली से भोपाल तक जो पंच लाईन ‘ना खाऊंगा न खाने दूंगा’ अब व्यंग्य मानी जाने लगी है तो मसानी या कहीं अंबानी ही मूल में रहे हैं। भोपाल में तो पार्टी के लोग ही मजाक में कहा करते थे सीएम लेबल का कोई अटक रहा हो तो संजय भैया से पहचान निकाल लो।पर ये भैया इस तरह कमलनाथ से पहचान बढ़ा लेंगे और पूरे परिवार को उन बड़े नेताओं की नजरों में और छोटा कर देंगे यह तो सपने में नहीं सोचा होगा। एक तो पहले ही पीएमजी से लेकर मोटाभाई तक एमपी में आते ही मुंह फुलाने वाले पोज में गुलदस्ता स्वीकारने की रस्म पूरी करते हैं, रही सही कसर मसानी ने पूरी कर दी। कमलनाथ खुद बड़े उद्योगपति हैं इसलिए संजय मसानी के इतिहास और भविष्य की उनकी महत्वाकांक्षाओं का आंकलन नहीं किया हो यह संभव नहीं पर उन्हें हाथोंहाथ कैलाश के प्रेमचंद दांव का जवाब देना था और रावण की हार में विभीषण की भूमिका वाला रामायण का चर्चित प्रसंग रामानुरागी भाजपा को भी याद दिलाना था, दिग्गी राजा को भी बताना था कि जब वे राजनीति में अर्जुन सिंह की अंगुली पकड़ कर आगे बढ़ रहे थे उसके पहले से केंद्र में इंदिराजी के साथ ही संजय गांधी की कथित चौकड़ी में उनकी (कमलनाथ की) भी खास जगह थी। यही नहीं ज्योतिरादित्य को भी संदेश दिया है कि चॉकलेटी हीरो होना अलग बात है लेकिन राजनीति के मैदान में हर तरह के दांव-पेंच आना जरूरी है।

संजय मसानी के कांग्रेस प्रवेश से भाजपा की अपेक्षा शिवराज को अधिक नुकसान होना है।शिवराज की प्रशंसा इसलिए भी की जानी चाहिए की साले साब तो पिछले विधानसभा चुनाव से ही चुनाव लड़ने के लिए मचल रहे थे लेकिन इस जिद पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। जो आदमी खुद को भविष्य का सीएम मानने लगे और उसे इस बार भी शिवराज बारा सिवनी से टिकट नहीं लेने दें तो जीजा से खुन्नस निकालने का इससे बढ़िया तरीका तो हो भी नहीं सकता।
और हां जो धर्मालुजन कार्तिक अमावस पर गंगा-नर्मदा-क्षिप्रा आदि में स्नान-पुण्य का मन बना रहे हों, अभी रुक जाएं, विभिन्न दलों के दावेदारों में डुबकी लगाने की दौड़ चल रही है। इन सारी नदियों का बहाव मार्ग अभी भाजपा-कांग्रेस मुख्यालयों की तरफ हैं जहां कांग्रेस से भाजपा में आने वालों को रगड़ मसल के नहलाया जा रहा है तो भाजपा से कांग्रेस में आने वालों के चेहरों और कपड़ों पर लगा भगवा रंग साफ किया जा रहा है।चुनाव निपटने तक इन नदियों का पवित्र जल भरकर भी न लाएं क्योंकि एक दूसरे की पार्टी के खिलाफ जो अंगार उगलते बयान दिए, जो वीडियो क्लिपिंग हमले के लिए संभाल रखी थी वह सब दल और दिमाग बदल जाने के कारण इन्हीं नदियों में प्रवाहित की जा रही है।

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