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मालवा-निमाड़ में तो ढहता नजर आ रहा है किला !

Posted on: 30 Nov 2018 21:04 by mangleshwar singh
मालवा-निमाड़ में तो ढहता नजर आ रहा है किला !

कीर्ति राणा
इन्हें और उन्हें भी इतने मतदान की उम्मीद तो नहीं थी। और शायद यही वजह है कि मतदान के प्रतिशत में आए उछाल से आम आदमी से ज्यादा दोनों दलों में राजनीति के दिग्गज हैरान हैं।बंपर फसल की तरह शहर और गांव दोनों जगह टपाटप वोट गिरे हैं इवीएम में । मालवा निमाड़ में तो भाजपा का किला ढहता सा लग रहा है, 66 में से करीब 30 सीटें कांग्रेस झपट रही है जबकि 2013 में 9 और 08 में 25 सीटों से ही उसकी लाज बच पाई थी। मालवा निमाड़ हांडी का वह चांवल है जिसे देखकर अंदाज लगा सकते हैं खिचड़ी किस दल की पकेगी। कांग्रेस यदि पूर्ण बहुमत भी ले जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

जाने कितने चुनाव देख लिए आप-हम सुनते तो यही आए हैं कि विधानसभा चुनाव में अधिक वोटिंग होने का मतलब सत्तारूढ़ दल के खिलाफ लोगों का गुस्सा वोटअंगार बन के बरसता है।तो क्या मान लिया जाए कि अच्छी भली शक्लोसूरत वाले शिवराज के माथे राज्य गंवाने का ठीकरा फोड़ने के लिए मोटाभाई की टीम आतुर बैठी है। चुनाव की शुरूआत से पहले लगभग दहाड़ते हुए अब की बार दो सौ पार के जो नारे लगाए जा रहे थे वो मतदान की शाम तक दो डिजिट में सिमट जाने की चर्चा में क्यों आ गए, यह मतगणना वाले दिन ही स्पष्ट होगा।

बात कर लें अपने मालवा-निमाड़ क्षेत्र के 66 विधानसभा क्षेत्रों की। मैं पहले भी लिख चुका हूं जिसने ‘मालवा निमाड़ को रिछाया, उस दल ने ही सत्ता सिंहासन पाया’ तो इस चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रों में हुए मतदान को भाजपा भले ही अति उत्साह की नजर से देख रही हो लेकिन यह उसके खिलाफ असंतोष के गुस्से का इजहार या मौके का इंतजार कहा जाना चाहिए। किसानों ने कांग्रेस के पक्ष में ही वोट डाले हैं अपने इस दावे के कारण गिनाते हुए भारतीय किसान यूनियन के इंदौर जिला अध्यक्ष बबलू जाधव का कहना था कांग्रेस के घोषणा पत्र का कैसा असर है इससे ही समझ जाइए कि इंदौर-उज्जैन संभाग के किसानों ने सोयाबीन फसल काट कर रख ली है लेकिन मंडी में ले जाएंगे 11 दिसंबर के बाद क्योंकि कांग्रेस ने दो लाख तक के कर्ज माफी की घोषणा कर रखी है।सिंचाई का बिजली बिल 3500 को आधा 1500 रु साल करेंगे, दूध पर (दुग्ध संघ) प्रति लीटर 5 रु बोनस देगा। कांग्रेस को किसानों से किए ये वादे इसलिए भी पूरे करना पड़ेंगे क्योंकि छह महीने बाद लोकसभा चुनाव में भी उसे फिर गांव गांव आना है।

यदि गांवों में मतदान के प्रति अति उत्साह को इस नजर से देखा जाए तो समझा जा सकता है इंदौर जिले के सांवेर विधानसभा क्षेत्र के बालोदा टाकुन गांव के कुल 1150 मतदाताओं में से 1050 ने मतदान किया है। किसान आंदोलन-गोलीकांड आदि के कारण चर्चा में आए मंदसौर जिले में इस चुनाव में सर्वाधिक 81.27 % मतदान हुआ है जो 2013 में 80.66 और 2008 74.27 प्रतिशत रहा था। गांवों में अधिक मतदान का कारण यदि शिवराज की किसान हित वाली योजनाएं, दो सौ रु बिजली बिल, उज्जवला (कुकिंग गैस) योजना आदि को मान लिया जाए तो शहरी क्षेत्र में महिलाओं द्वारा किए अधिक मतदान का कारण गैस के बढ़ते दाम, बिजली के अनापशनाप बिल, पेट्रोल-डीजल के दाम में रह रह कर भड़कती आग, महंगाई पर अंकुश न होना क्यों नहीं माना जाना चाहिए।

हर चुनाव से पहले राम मंदिर की ध्वजा फहराने ही लगती है यह राजनीति ना समझने वाला भी समझने लगा है। राम मंदिर निर्माण के मोह में भी यदि शहरी क्षेत्रों में अधिक मतदान हुआ है तो ऐसा सोचने से पहले यह भी समझ लेना चाहिए कि मुस्लिम बहुल बस्तियों में क्यों मतदान के प्रति अधिक उत्साह था। भाजपा द्वारा मतदान वाले दिन 90प्रतिशत मतदान की अपील भले ही कमलनाथ के मुस्लिम नेताओं से वॉयरल हुए वीडियो की याद दिलाने के लिए की गई हो या प्रधानमंत्री मोदी की सुप्रीम कोर्ट के जजों से चौंकाने वाली मुलाकात रही हो-इन सब का असर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं पर कैसा पड़ा होगा इसे विस्तार से लिखना भी जरूरी नहीं है।

मालवा-निमाड़ क्षेत्र का चुनावी दौरा कर चुके पत्रकार-मित्र अरविंद तिवारी यदि दावा करें कि कांग्रेस 66 में से कम से कम 30 सीटें जीत रही हैं तो इसलिए भी विश्वास किया जा सकता है कि यह क्षेत्र किसान आंदोलन के दौरान सर्वाधिक मुखर रहा है। इन 66 में से उज्जैन क्षेत्र की 29 सीटों की बात करे तो उज्जैन जिलें में पिछले चुनाव में 7 में से किसी सीट पर कांग्रेस का खाता नहीं खुला था लेकिन इस बार 4 ( अधिकतम 5) दक्षिण, नागदा-खाचरौद, तराना, घटिया और बड़नगर या महिदपुर तथा भाजपा उत्तर, बड़नगर और महिदपुर 3 सीटों पर सिमट रही है। मंदसौर जिले की 4 में से कम से कम 2 सीटें कांग्रेस 2 भाजपा को मिल सकती हैं, अभी कांग्रेस की एक सीट है। नीमच में तीनों सीट भाजपा के पास थी, एक सीट कांग्रेस को मिल सकती है।इसी तरह देवास जिले की 5 में से 2 (अधिकतम 3) सीटें कांग्रेस को, 3 भाजपा को मिल सकती हैं, पिछले चुनाव में पांचों पर भाजपा जीती थी। शाजापुर-आगर की 5 में से 2 (अधिकतम 3) कांग्रेस और 2 पर भाजपा जीत सकती है। रतलाम की 5 सीटों में शहर सहित 3 सीट भाजपा को और 2 सीट कांग्रेस को जा सकती है।

इसी तरह इंदौर (निमाड़ क्षेत्र) संभाग की 37 सीटों में खंडवा-बुरहानपुर की 6 में से 5 भाजपा, एक कांग्रेस को, यहां बागियों की खास भूमिका रहेगी, पहले कांग्रेस की एक सीट भी नहीं थी। खरगोन में 6 में से कांग्रेस 4 (अभी 3) भाजपा 2 पर रह सकती है। बड़वानी जिले में 4 में से दोनों को 2-2, धार जिले में 7 में से 4 कांग्रेस (अभी 2) और 3 भाजपा को जा सकती हैं। मनावर में कोई चमत्कार ही जयस के डॉ हीरालाल अलावा की जीत का कारण बन सकता है।झाबुआ में 5 सीटें हैं पिछले चुनाव में 1 पर निर्दलीय (बाद में भाजपा में शामिल) और 4 पर भाजपा जीती थी, इस बार 3 कांग्रेस, 2 पर भाजपा के आसार हैं। जेवियर मैढ़ा का सुनियोजित तरीके से चुनाव लड़ना विक्रांत भूरिया के लिए परेशानी का कारण रहा है, परिणाम चौंका सकता है।

इंदौर में महू सहित 9 सीटों में से अभी 8 पर भाजपा और 1 (राऊ) सीट कांग्रेस के पास है। कांग्रेस की सीटों में यहां भी अधिकतम 5 सीटों का इजाफा हो रहा है। देपालपुर, सांवेर, महू के साथ ही राऊ में भी कांग्रेस के जीतने की संभावना है। इसी तरह इंदौर के शहरी क्षेत्रों में से विधानसभा क्रमांक एक में संजय शुक्ला और तीन नंबर में अश्विन जोशी जीत कर चौंका सकते हैं। इसी तरह दो नंबर में यदि रमेश मेंदोला पिछले चुनाव में मिली लीड (91हजार17) को यथावत नहीं रख पाते हैं तो मोहन सेंगर हार कर भी कांग्रेस में जीते जितना ही सम्मान पाएंगे। वैसे मेंदोला मंडली ने इस क्षेत्र में जीत का नारा ‘अबकी बार दो लाख पार का’ का लगा रखा था लेकिन जिस दमखम से कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और मतदान का प्रतिशत कम रहा वह कांग्रेस की सरकार बनने पर मोहन सेंगर का कद बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।

इस बार के चुनाव में निर्वाचन आयोग की सख्ती और कांग्रेस की लगातार शिकायतों के बाद मतदाता सूचियों के राज्यव्यापी पुनरीक्षण का ही परिणाम है कि लाखों की संख्या में नाम कम हुए हैं। पिछले दो चुनाव में इनमें से कुछ प्रतिशत अदृश्य मतदाता निश्चित ही मददगार रहे होंगे।बुधनी विधानसभा क्षेत्र जहां से शिवराज सिंह और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव आमने-सामने हैं वहां आश्चर्यजनक रूप से पिछली बार की अपेक्षा मतदान का प्रतिशत 75 प्रतिशत ही रहा है, जबकि 2013 में 80.24 % रहा था। तब कुल 229400 में से 184081 ने मतदान किया था(80.24)। इस बार मतदाताओं की संख्या बढ़कर 244871 हो गई, 184926 ने मतदान किया लेकिन मतदान 75 प्रतिशत ही हुआ।
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*जीते तो संघ की मेहनत, हारे तो संघ नाराज*
भाजपा ने टिकट तय करते वक्त संघ की हिदायतों, सर्वे आदि को भले ही तवज्जो नहीं दी हो लेकिन जिस तरह मोटाभाई मप्र में संघम शरणम गच्छामि होते रहे, शिवराज आधी रात में दौड़ दौड़ कर जाते रहे वह यह संकेत भी तो था कि अबकि पार नहीं दो सौ पार। मोटाभाई भन्नाए हुए नजर आए तो इसलिए कि आंकलन के बाद सौ का आंकड़ा भी पूरा नहीं हो रहा था। वैसे भी भाजपा नेताओं के कुछ वक्तव्य तो अमरवाणी जैसे हैं ही हार गए तो दमखम से कहते हैं हमारा वोट प्रतिशत बढ़ा है।आम कार्यकर्ता मेहनत करे परिणाम विपरीत आए तो आसानी से कहा जाता है संघ की नाराजी थी, जीत मिल जाए तो श्रेय संघ को संघ ने अंतिम समय में सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिए थे।

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