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कर्नाटक की 224 विधान सभा सीटों के चुनाव में, यह थे प्रमुख मुद्दें

Posted on: 14 May 2018 14:25 by Lokandra sharma
कर्नाटक की 224 विधान सभा सीटों के चुनाव में, यह थे प्रमुख मुद्दें

#किसका_कर्नाटक

225 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा के लिए 224 सीटों पर एक ही चरण में मतदान 12 मई को हो चूका है. इस चुनाव के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही राजनितिक दल ने अपना सम्पूर्ण दमखम लगा दिया था. यह पहला चुनाव था जहाँ कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही मुख्‍य पार्टियां हिंदूत्‍व एजेंडे को ले कर चुनाव में आगे बढ़ी हैं, कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ कुछ क्षेत्रीय दल भी 224 विधानसभा सीटों के लिए होने वाली इस चुनावी दौड़ में शामिल हो रही है. 15 मई मंगलवार को कर्नाटक के चुनावी परिश्रम के परिणाम घोषित हो जाएंगे और साथ ही इस सवाल का भी पता लग जाएगा कि आखिर कर्नाटक किसका होगा. आइये जानते हैं कर्नाटक एक अहम मुद्दे क्या थे, जिन पर जीत और हार का फैसला होना था.

भ्रष्टाचार

हालांकि आजकल चुनावों में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से ज़्यादा धार्मिक मुद्दे चलते हैं मगर इस बार कर्नाटक चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा काफी हावी रहा. दोनों ही प्रमुख राजनितिक दल एक दुसरे के नेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं. कांग्रेस की तरफ से बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उमीदवार येदियुरप्पा के पिछले शासन पर हर तरह के सवाल खड़े करे. वहीं बीजेपी ने भी 3000 किसानों की आत्महत्या, चाय का करोड़ो रुपय का बिल जैसे मामले को ले कर सिद्धरामैय्या सरकार को घेरे रखा. किसी भी दल ने एक दुसरे पर आरोपों का कीचड़ उछालने में कोई कमी नहीं रखी.

कन्नड़ भाषा एक अहम मुद्दा

कर्नाटक में अक्सर स्थानीय कन्नड़ भाषा को बढ़ावा देने की मांग को लेकर  आंदोलन चलता रहता है. कांग्रेस ने इस मुद्दे का काफी फायदा उठाया पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा हिंदी को अनिवार्य करने पर बेंगलुरु में बड़ी बहस छिड़ी थी. इसे इस चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर जिंदा कर दिया है. बता दें एक बार ट्वीटर पर #StopHindiImposition ट्रेंडिंग हैशटैग में से एक रहा था. मुन्नोटा, बनसवी बालागा, कन्नड़ ग्राहक कूट जैसे संगठन के युवा सोशल मीडिया पर इन दिनों ज्यादा सक्रिय हैं. इन्हीं लोगों ने बेंगलुरु मेट्रो रेल स्टेशन से हिंदी भाषा के बोर्ड हटाने का आंदोलन भी किया था.

लिंगायत दर्ज करवाएंगे अपनी उपस्थिति 

इस बार कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में लिंगायत समाज कर्नाटक की राजनीति का अहम फैक्टर बनकर सामने आई है, इसकी शुरुआत की कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने दरअसल राज्य की करीब 21 फीसदी आबादी वाले लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देकर उन्होंने केंद्र की बीजेपी सरकार को मुश्किल में डाल दिया है. बीजेपी के पाले में गेंद डाल कर कांग्रेस ने पहली बाज़ी तो मार ली थी. बता दें कर्नाटक विधानसभा की करीब 100 सीटों का निर्णय लिंगायत समूह के हाथ में हो सकता है. वहीं बीएस येदियुरप्पा खुद भी लिंगायत समुदाय से हैं. लिंगायत समूह अक्सर बीजेपी के समर्थन में रहता है किन्तु इस बार कांग्रेस ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश कर दी है.

महादयी जल विवाद

कर्नाटक अभी भी जल संकट की समस्या से जूझ रहा है. हालांकि पिछली बार की अपेक्षा इस बार यह संकट कम है. मगर किसानों की खुदखुशी का मामला आज भी ताजा है. वहीं महादयी जल विवाद को लेकर अक्सर कर्नाटक बंद जैसै आयोजन होते रहते हैं मगर ये विवाद अभी भी अनसुलझा है, जिसे हर पार्टी ने अपने हिसाब से अपना चुनावी मुद्दा बनाया. किसान और सामान्य नागरिक महादयी नदी के पानी का लंबे समय से इंतजार करते हुए बहुत आक्रोश में हैं.

मठ का भी रहेगा ख़ास स्थान

कर्नाटक के इस विधानसभा चुनाव में मठ राजनीति का एक प्रमुख केंद्र बन कर रहा है. इसके पीछे कारण यह है कि कर्नाटक में हमेशा से लोगों पर मठों का खासा प्रभाव रहा है और उनका समय-समय पर राजनीतिक इस्तेमाल होता आया है. इसीलिए उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कर्नाटक बुलाया गया था. उदाहरण के लिए लिंगायत समुदाय के करीब 400 मठ हैं, वहीं वोकालिंगा समुदाय से जुड़े करीब 150 मठ हैं. यही कारण है कि अमित शाह से ले कर राहुल गांधी तक सभी नेता मठों में माथा टेकते हुए नज़र आए.

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