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क्या समाज पढ़ाएगा, इलाज कराएगा? माहेश्वरी समाज के ज्यादा बच्चे पैदा करने के फरमान पर वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की टिप्पणी

Posted on: 25 Jun 2018 11:48 by Surbhi Bhawsar
क्या समाज पढ़ाएगा, इलाज कराएगा? माहेश्वरी समाज के ज्यादा बच्चे पैदा करने के फरमान पर वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की टिप्पणी

जब भी ज्यादा बच्चे पैदा करने की बात कानों पर आती है तो संजय गांधी की बात याद आ जाती है, जिन्होंने कुछ 40 साल पहले कहा था कि इस देश को समस्याओं से बचाना है तो ‘हम दो हमारे दो’ का नारा सार्थक करना पड़ेगा। वो दौर गुजर गया, अब भारतीय संकृति के द्योतक और समाज के ठेकेदार कह रहे है कि दो नहीं चार बच्चे पैदा करो। तरस आता है ऐसे घोषणावीरों पर जो पढ़े-लिखे होने के बावजूद मूर्खता की बात करते है।

माहेश्वरी समाज के ठेकेदारों ने तय किया कि जो तीसरा बच्चा पैदा करेगा उस दंपत्ति को 50 हजार और चौथा बच्चा पैदा करने वालो को एक लाख का पुरूस्कार दिया जाएगा। अपने कुतर्क को तर्क में बदलने के लिए ये कहा गया कि समाज में लड़के-लड़कियों को समाज की जनसंख्या कम होने की चिंता भी सता रही है। आमतौर पर बनिया और पढ़ा-लिखा माहेश्वरी समाज कहलाता है।

अब जरा इन ठेकेदारों की घोषणा पर हम तर्क संगत सवाल उठाते है। बच्चा पैदा होने के बाद पचास हजार रूपये तो आजकल अस्पताल में ही खर्च हो जाते है। उसके बाद बच्चे की परवरिश, फिर स्कूल की महंगी फीस और उसके बाद बड़े होने वाले बच्चो की आंखो में दिखने वाले सपने पूरे करने के लिए कौन आएगा? क्या समाज इनके बच्चो की शिक्षा का पूरा खर्च उठाएगा? बच्चो के बीमार होने पर उनका इलाज कराएगा?

संजय गांधी ने भले ही नारा दिया हो, लेकिन आज कल की नई पीढ़ी ने इस नारे को अपनी आवश्यकता में बदल दिया है। लड़कियों  को पढ़ाने-लिखाने वाले माता-पिता नहीं चाहते कि उनकी बेटी ससुराल जाकर बर्तन-कपडे धोना तो दूर खाना भी बना ले। सबको अपनी लाड़ली बेटी को कमाऊ बेटा साबित करना है। जब बेटी कमाने जाएगी तो घर में काम कौन करेगा? पहले के संयुक्त परिवारों में तो शायद सास-ससुर बने ही इसलिए थे कि वो दिनभर पोते-पोतियों का ध्यान रखे।

अब कमाऊ बेटियां बहू बनते ही अलग होना चाहती है। ऐसे में जब दोनों पति-पत्नी एक ताले की दो चाबी बनाकर कमाने निकल जाते है तो अपनी निजी जीवन पर ठीक से ध्यान भी नहीं दे पाते। संजय गांधी ने दो बच्चो का नारा दिया था। आजकल के युवाओं ने ‘शेर का बच्चा एक ही अच्छा’ नारा दिया है। एक बच्चा होने के बाद दूसरा बच्चा भी पढ़े-लिखे नौकरी पेशा दम्पत्ति दूसरा बच्चा बिलकुल नहीं चाहते। उनको इस बात से बिलकुल फर्क नहीं पड़ता कि पहला बच्चा लड़का है या लडकी। सबसे बड़ी बात ये है कि पहले संयुक्त परिवार होते थे तो सास-ससुर से लेकर सारे रिश्तेदार बेटे की चाहत में चार-चार बेटियां पैदा करवा देते थे। उसके बाद हालत ये होती थी कि पहली बेटी और मां दोनों एक समय ही एक बच्चे को जन्म दिया करती थी। महेश्वरी समाज ने सरकार के नसबंदी अभियान की भी धज्जिय उदा दी। समाज के ठेकेदारों को देखकर लगता है कि अब ये भी फतवे जारी करने लग गये है। समाज के गरीबों की इनको कोई चिंता नहीं, समाज के बेरोजगारों को रोजगार दिलाने की चिंता नहीं।

प्रैक्टिकल फंडा ये कहता है कि समाज में यदि लड़के या लड़कियों की संख्या कम हो रही है तो चिंता की बात क्यों? क्या माँहेश्वरी समाज के बच्चे लव मैरिज नहीं करते?  मुझे तो लगता है कि जो ठेकेदार बयान दे रहे है उनके घर में ही अलग-अलग समाज के लड़के लडकियों से शादियां हो चुकी होगी। अब तो बनियों ने वैश्य समाज नाम का एक संगठन बना दिया जिसने पांच-पच्चीस समाज की खिचड़ी बन गई है। तो महेश्वरी समाज अपने बच्चो की शादियां वैश्य समाज में तो कर ही सकता है।

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