B’day Specl: जब ट्रेन में टॉयलेट के पास सोने को मजबूर थे धोनी

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mahendra singh dhoni

नई दिल्ली: भारतीय टीम के पूर्व कप्तान और ‘रांची के राजकुमार’ के नाम से मशहूर महेंद्र सिंह धोनी आज अपना 38वां जन्मदिन मना रहे है। क्रिकेट में सबका दिल जीतने के बाद धोनी सिनेमाई पर्दे पर भी दर्शकों के दिलों में खास जगह बना चुके हैं। क्रिकेट के मैदान पर तो सभी लोग धोनी को जानते है लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए उनके संघर्ष को कोई नहीं जानता। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि स्टेशन पर टिकट चेक करने वाला लड़का क्रिकेट के ग्राउंड पर अपने चौके-छक्के से सबको दीवाना बना लेगा।

एक कमरे में रहता था परिवार

महेंद्र सिंह धोनी ने इस मुकाम तक पहुँचने के लिए बहुत मेहनत की है। उनके परिवार की जड़ें उत्तराखंड में हैं। रांची स्थित मेकॉन में पिता पान सिंह की 1964 में नौकरी लगने के बाद वे यही के होकर रह गए। बताया जाता है कि धोनी के जन्म के समय उनके पिता पम्प ऑपरेटर के तौर पर काम करते थे। उनका परिवार एक बेडरूम वाले घर में रहता था। धोनी उस समय टेनिस गेंद से क्रिकेट खेला करते थे. धोनी बताते हैं कि वो उस समय छोटे और दुबले-पतले दिखते थे, इसलिए बाकी लड़कों ने उन्हें विकेटकीपर बना दिया।

स्कूल के दिनों में धोनी को फुटबॉल और बैडमिंटन खेलना पसन् था। इसके साथ ही वह दौड़ने में माहिर थे। यही कारण है कि कम उम्र में ही उनके पैरों में खूब ताकत आ गई।

बचपन से ही छक्के लगाने में है माहिर

माही के स्पोर्ट्स टीचर ने बताया कि वह बचपन से ही छक्के मारने में माहिर थे. वो स्कूल खत्म होने के बाद मैदान में पहुंच जाते थे और करीब 3 घंटे अभ्यास करते थे। अभ्यास के दौरान वे कई पास आसपास के घरों की खिड़कियों के कांच तोड़ देते थे पूछने पर किसी के पत्थर फेंकने की बात कह देते थे।

16 साल की उम्र में ही धोनी ने डबल सेंचुरी मार दी थी। यह कारनामा धोनी ने 1997 में एक स्कूल टूर्नामेंट किया था। इसके बाद धोनी को मेकॉन क्रिकेट क्लब में एंट्री मिल गई और उन्हें लोग पहचानने लगे।

धोनी की पहली कमाई

मेकॉन क्रिकेट क्लब के बाद धोनी ने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड की लोकल टीम में शामिल हो गए। यहां उनकी पहली कमाई हुई और उन्हें वेतन के रूप में 625 रुपये मिले। इसके बाद धोनी सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड क्लब से जुड़े। यहां उनकी कमाई दो हजार रुपये हो गई। धोनी को यहां 200 रुपये बोनस भी मिलता था, क्योंकि वो एक मैच विनर खिलाड़ी थे।

रणजी की नहीं मिली जानकारी

सीसीएल और बिहार के लिए अंडर-19 में किए अच्छे परफॉर्मेंस का इनाम धोनी को साल 2000 में मिला, जब उन्हें रणजी ट्रॉफी में जगह मिली, लेकिन रांची जैसे शहर का होने के कारण यह जानकारी धोनी तक नहीं पहुंच सकी।

धोनी को जब इस बात का पता लगा जब तक बहुत देर हो चुकी थी। धोनी जब कोलकाता एयरपोर्ट पहुंचे तो टीम अगरतला के लिए निकल चुकी थी और धोनी ने ईस्ट जोन के लिए पहला मैच मिस कर दिया। हालांकि, धोनी इसके बाद वहां पहुंचे और टीम से जुड़े।

रेलवे की नौकरी और पगार 3000 हजार रुपये

2001 में धोनी को बंगाल के खड़गपुर में स्पोर्ट्स कोटा से दक्षिण-पूर्व रेलवे में नौकरी मिली। यहां धोनी क्लास-3 की टिकट चेक करते थे और उनका वेतन तीन हजार रुपये था। इसके बाद धोनी की किस्मत पलती और तीन महीने के अंदर ही पोर्ट्स डिपार्टमेंट में शामिल हो गए। 2003 में धोनी ने रेलवे की नौकरी छोड़ दी।

मोरे हुए धोनी के मुरीद, ए टीम में हुआ चयन

इसके बाद बंगाल के पूर्व कप्तान प्रकाश पोद्दार को ईस्ट जोन के लिए नए टैलेंट को खोजने की जिम्मेदारी मिली। इस दौरान उन्होंने धोनी के खेल को देखा और रिपोर्ट चयनकर्ता कमेटी के चेयरमैन किरण मोरे को बताया। किरण मोरे भी धोनी के खेल को देखकर उनके मुरीद हो गए। इस समय भारतीय टीम के पास विशेषज्ञ विकेटकीपर नहीं था और राहुल द्रविड़ को पार्ट टाइम विकेटकीपिंग करनी पड़ रही थी।

2004 में मोहाली में नॉर्थ और ईस्ट जोन के बीच मुकाबला हुए मुकाबले में धोनी ने विकेटकीपिंग की। यहां धोनी ने 5 कैच लपके और चौथे दिन 47 गेंदों में 8 चौके और 1 छक्के की मदद से 60 रन बनाए। यहां उन्होंने आशीष नेहरा की गेंद को हुक कर चौका मारा और चयनकर्ताओं का दिल जीत लिया। इसके बाद उन्हें इंडिया-ए टीम के लिए चुन लिया गया।

टॉयलेट के पास सोकर गुजारी रात

2016-17 रणजी सीजन में धोनी ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। जूनियर क्रिकेट होने की वजह से वे कई बार लोकल डिब्बों में सफ़र करते थे। इस दौरान कई बार उन्हें टॉयलेट के आसपास वाली जगहों में सोना पड़ता था। अब वो उस जगह पहुंच गए थे जहां उन्हें एसी के फर्स्ट क्लास डब्बे में सीट दी जा रही थी और साथ ही फैंस से बचने के लिए सिक्योरिटी भी मुहैया करवाई गई थी।

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