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क्या यह भाजपा संगठन का सरेंडर है?

Posted on: 08 Nov 2018 18:27 by Surbhi Bhawsar
क्या यह भाजपा संगठन का सरेंडर है?

मुकेश तिवारी
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भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की जो सूची अब तक जारी की है उसे देखकर लगता है कि संगठन पर ‘सरकार’ बहुत भारी पड़ी है। संगठन तो बड़ी सर्जरी का पक्षधर बताया जा रहा था लेकिन ‘सरकार’ के दखल ने सर्जरी को बड़ा होने से शायद रोक दिया। रही-सही कसर बड़े नेताओं ने पूरी कर दी उन्होंने अपनी जिद के आगे भाजपा संगठन को झुका-सा दिया है। भाजपा की पहली सूची हो दूसरी या फिर आज घोषित हुई तीसरी सूची। कहीं भी ऐसा नजर नहीं आया कि संगठन की मर्जी से या कार्यकर्ताओं की राय के आधार पर ही पूरे टिकट बांटे गए हैं।

जब पहली और दूसरी सूची आई तभी यह कह दिया गया था कि भाजपा संगठन ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यानी ‘सरकार’ द्वारा कराए गए सर्वे को तवज्जो देते हुए ही ज्यादातर टिकट दिए हैं आज तीसरी सूची में भी ऐसा ही नजर आया। इंदौर जैसे बड़े शहर और यहां की ग्रामीण सीटों के टिकटों का फैसला करते वक्त भाजपा का संगठन शायद शिवराज के सर्वे के दबाव में नजर आया। कहा भी जाता है ना जब ‘सरकार’ आ जाती है तो भाजपा में संगठन की कम ही चलती है फिर सरकार तीन बार की हो तो क्या कहना। बातें बहुत हुईं रायशुमारी खूब की गई लेकिन इंदौर में एक भी विधायक का टिकट काटने में संगठन सफल नहीं हो पाया। सभी विधायकों को फिर टिकट मिल गया क्योंकि वह या तो सरकार की पसंद हैं या फिर किसी ना किसी बड़े नेता के खास समर्थक। केवल उषा ठाकुर का क्षेत्र बदला जाना ही इंदौर के हिसाब से एकमात्र बड़ा बदलाव है। महू से चुनाव न लड़ने वाले विधायक कैलाश विजवर्गीय के बेटे आकाश को टिकट देकर पार्टी ने उनकी इच्छा पर सहमति की मानो मुहर लगाई है। अब तक बार- बार यह कहा जा रहा था कि जिन विधायकों की ग्राउंड रिपोर्ट ठीक नहीं मिल रही है उनके टिकटों पर भाजपा संगठन बेरहमी से कैंची चलाएगा लेकिन ऐसी कोई कैंची इंदौर के मामले में चलती नजर नहीं आई है।

BJP-Flags

सत्तारूढ़ दल का विधायक ताकतवर होता है। वह अपनी ताकत और ऊपरी पकड़ के बल पर एक बार फिर अपने ही पसंदीदा विधानसभा क्षेत्र से टिकट ले आता है। उसका टिकट काटना आसान नहीं होता। तमाम रायशुमारी, सर्वे या कहें भाजपा संगठन को ठेंगा दिखाते हुए वह विधायक टिकट ले ही आता है। नए चेहरे के नाम पर आकाश विजयवर्गीय का टिकट आया है क्योंकि कैलाश विजयवर्गीय के चुनाव लड़ने से इंकार करने के बाद आना ही था, दूसरा टिकट मधु वर्मा का है जो पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन उन्हें इंदौर शहर में कोई भी नया चेहरा मानने को तैयार नहीं होगा क्योंकि वर्मा पार्टी के बहुत पुराने नेता हैं।

इंदौर ही नहीं राजधानी भोपाल में गोविंदपुरा के टिकट को लेकर भी भारतीय जनता पार्टी संगठन पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर की जीत के आगे घुटने टेकता नजर आया। वह पार्टी संगठन को इस बात के लिए मनाने या कहें संगठन पर दबाव बनाने में सफल हो गए कि उनकी जगह कोई और नहीं बहू कृष्णा गौर ही गोविंदपुरा से चुनाव लड़ेंगी। मध्यप्रदेश में भाजपा ने जिस तरह टिकट बांटे हैं उसे देखते हुए कोई भी यह नहीं कहेगा कि आम कार्यकर्ताओं से पार्टी ने जो रायशुमारी की थी, संघ से जो जमीनी हकीकत पूछी थी उसको ध्यान में रखकर ही टिकट बांटे गए हैं । ऐसी टिकट सूची देखकर भारतीय जनता पार्टी का आम कार्यकर्ता शायद कई विधानसभा क्षेत्रों में खुद को ठगा सा महसूस कर रहा होगा। उसे लग रहा होगा कि जब टिकट अपने ही मन से देना था तो हमारा मन टटोलने की रस्म अदायगी आखिर क्यों की गई। जहां तक सवाल राजनीति में वंशवाद का है तो अब भाजपा, कांग्रेस पर यह आरोप लगाने की स्थिति में कतई नहीं बची है कि वह वंशवाद की पोषक है। चलते-चलते यह भी कहना पड़ेगा कि सब को टिकट दे ही रहे थे तो सरजात सिंह को भी दे देते, उन्हें नाराज करके आखिर क्या मिला?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और Ghamasan.com के संपादक हैं।

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