तैयारी तो वैसी नहीं दिखती फिर कैसे 200 पार

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मुकेश तिवारी
([email protected] com)

वर्ष 2003 का मप्र विधानसभा चुनाव नजदीक था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भाजपा में आई तिकड़ी पर जिम्मेदारी थी कि इस बार हर हाल में भाजपा की सरकार बनाना है।

प्रोफेसर कप्तानसिंह सोलंकी, स्व अनिल माधव दवे और अरविंदसिंह भदौरिया संघ की तर्ज पर एकदम जमीनी फीडबैक ले रहे थे। इससे कई नेताओं और विधायकों की जमीन सरक रही थी। क्या होने जा रहा है किसी को भनक तक नहीं लग रही थी। हालत यह थी कि कप्तान सिंह जैसे कड़क मिजाज संगठन महामंत्री से खुद के टिकट पर चर्चा करने से बड़े नेता और विधायक कतरा रहे थे। ऐसे में अरविंद सिंह को सहज-सरल पाकर भाजपा के नेता-विधायक उन्हें घेरे रहते थे। वह इंदौर आए हुए थे। भाजपा कार्यालय में ठहरे थे। मैं खबर निकालने की नीयत से वहां पहुंचा तो देखा मालवा-निमाड़ के कई नेता-विधायक उनसे मिलने वालों की कतार में थे। पहले से समय ले रखा था मुझे भीतर जाने का अवसर जल्द मिल गया। जैसे ही मैंने सवाल किया अरविंद सिंह की ओर से जवाब आया – हम मप्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रहे हैं। ऐसा कहते वक्त उनके चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास चमक रहा था। फिर उन्होंने सीटों का जो आंकड़ा बताया उससे मैं चौंक गया। इतने बड़े आंकड़े पर मुझे अविश्वास हुआ। वह आंकड़े भगवा लहर आने वाली है इसका साफ संकेत दे रहे थे। अरविंद सिंह इसे भांप गये और मुझसे यह कहते हुए वहां से उठ गये कि आप इसे नोट कर लीजिएगा। हम रिजल्ट वाले दिन बात करेंगे। यह वह तब कह रहे थे जबकि टिकट वितरण शुरू भी नहीं हुआ था।

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जब टिकट बंटे तो अनेक सीटों पर पुराने नेताओं की जगह नये चेहरे थे। ऐसे चेहरे जिनके बारे में पहली प्रतिक्रिया यह आई कि अरे यह क्या? कांग्रेस की फिर सरकार बनना तय है। खैर, चुनाव आगे बढ़ा, संघ, विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती और राष्ट्र सेविका समिति से भाजपा में आए जिन चेहरों को चुनाव मैदान में उतारा गया था उनकी स्थिति मजबूत होती चली गई। चुनाव का जब रिजल्ट आया तो शहर, गांव और सुदूर आदिवासी अंचलों की उन सीटों पर भी कमल खिला जहां कभी भाजपा इससे पहले जीत को तरसती आई थी या एक-दो बार ही जीती थी। प्रदेश के आंकड़े को जब मैंने अरविंद सिंह के पूर्व में दिए आंकड़े से मिलाया तो लगभग वही थे।

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अब सवाल यह है कि क्या आज पंद्रह साल बाद 2018 में मप्र की चुनावी रणभूमि पर भाजपा उसी आत्म विश्वास के साथ उतरी है जैसा 2003 में था। क्या वैसी ही तैयारी अब भी है? अगर इसका जवाब संगठन के कर्ता-धर्ता हां में देने की स्थिति में नहीं हैं तो अबकी बार 200 पार का नारा बहुत ही बेमानी है। क्योंकि 6 अप्रैल 1980 को मुंबई में जन्मी भाजपा की मप्र में 2003 की जीत सबसे बड़ी और ऐतिहासिक थी।

लेखक, वरिष्ठ पत्रकार और Ghamasan.com के संपादक

 

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