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दो ‘ज’ की कसौटी पर भाजपा के टिकट

Posted on: 03 Nov 2018 08:58 by Ravindra Singh Rana
दो ‘ज’ की कसौटी पर भाजपा के टिकट

मुकेश तिवारी
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बड़ी जीत की उम्मीद से मिशन-2018 पर निकली भारतीय जनता पार्टी ने बड़े हिंदी भाषी राज्य मप्र में कल अपने उम्मीदवारों की बड़ी सूची जारी की। पार्टी ने ऐसा करते हुए दो ‘ज’ का खूब ख्याल रखा। एक – जीतने की क्षमता और दूसरा जातीय समीकरण। जो भी नेता, विधायक, मंत्री या बड़े नेता का सगा या दूर का रिश्तेदार इन दो ‘ज’ की हद या ज़द में आया वह टिकट पाने में सफल हो गया।

वैसे भी राजनीति में जीतने की क्षमता और योग्यता टिकट बांटने का सबसे बड़ा और तय-सा फार्मूला है। जो भी पार्टी इस फार्मूले को अपनाती-आजमाती है उसकी सफलता का चांस गुटबाजी के फेरे में फंसकर टिकट बांटने वाली पार्टी से कहीं ज्यादा होता है। फिर पिछले कुछ सालों से वह पार्टी भी अधिक सीट पाती आई है जिसने हर सीट के जातीय समीकरण का बेहतर आंकलन कर टिकट बांटे हैं। इसलिए भाजपा के इस टिकट वितरण में यह भी साफ नजर आ रहा है कि जातीय समीकरणों को भी उसने ठीक से समझा और पढ़ा है।

कुछ दिन पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के मप्र दौरे के दौरान बड़ी सर्जरी शब्द खूब गूंजा था। इसका अर्थ मंत्री-विधायकों के टिकट पर बेरहमी से कैंची चलना निकाला गया था। टिकट सूची देखकर लगता है भाजपा ने कैंची तो चलाई है पर बेरहमी से कतई नहीं। सोच-समझकर चलाई गई कैंची से वही टिकट काटे गये हैं जिनको काटना शायद बहुत जरूरी था। वैसे कुछ ऐसे मंत्री, विधायकों के टिकट फिर हो गये जिनके टिकट कटने की पूरी संभावना थी। इसके पीछे का कारण शायद उस सीट पर उनकी जाति का समीकरण बेहतर रहा होगा। यह भी हो सकता है वह बड़े संबंधों के चलते टिकट बचाने में सफल हो गये हों। खैर, पुरानों की जगह नये चेहरों को मौका देकर भाजपा चौथी बार मप्र की सत्ता में आना चाहती है। पुराने चेहरों का टिकट काटने का हमेशा यही राजनीतिक कारण गिनाया जाता है – जनता और कार्यकर्ताओं में उन्हें लेकर नाराजी थी। नये चेहरे को टिकट मिलने के कारण वही – जीतने की योग्यता और बेहतर जातीय समीकरण।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ghamasan.com के संपादक हैं।

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