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चुनावी मुद्दे 2019

Posted on: 03 May 2019 10:31 by Surbhi Bhawsar
चुनावी मुद्दे  2019

एन के त्रिपाठी

लोक सभा चुनाव धीरे धीरे अपनी परिणिति की ओर बढ़ रहा है, यद्यपि अभी अत्यधिक महत्वपूर्ण एक तिहाई सीटें बची हुई हैं। पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने पुराने इतिहास और भविष्य के वादों के साथ जनता के हृदय में भावनाएँ भड़काकर उन्हें वोटों में तब्दील करना चाहते हैं।सभी राजनैतिक पार्टियों के घोषणा पत्र जारी हो चुके हैं और अब बासी भी हो चले हैं। राजनीतिक विश्लेषकों को सभी आम चुनावों में देश के और अधिक परिपक्व होने की आशा रहती है और इसके लिए उनकी निगाहें चुनावी मुद्दों पर होती है।

चुनाव प्रारंभ होने के पूर्व सभी पार्टियां विकास या विकास से जुड़े मुद्दों जैसे बेरोज़गारी आदि की बातें करती हैं। चुनाव के पास आते आते विकास पीछे चला जाता है। 2014 के चुनाव में मोदी ने देश के जनमानस को उनकी प्रगति की आशाओं के लिये जागृत किया था। इस बार उनके द्वारा उन आशाओं के स्थान पर सरकार की कुछ योजनाओं की सफलता को थोड़ा बहुत गिनाया जा रहा है। उनका सारा ज़ोर राष्ट्रवाद , सुरक्षा और आतंकवाद के इर्द गिर्द घूम रहा है।

राहुल गांधी ने राफाल घोटाले की चोरी को मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश की लेकिन घोषणा पत्र जारी होने के बाद से 5 करोड़ ग़रीब भारतीयों को बहत्तर हज़ार रुपया प्रतिवर्ष का न्याय देने का वादा किया है।फ़िलहाल दोनों ही पक्षों के मुद्दे जनता के हृदयों में न जाकर केवल प्रचार का रूप ले रहे हैं। भारत के विशाल भूखंड पर फैले क्षेत्रीय दल अपने एजेंडे के अनुसार प्रचार में लगे हैं। TV चैनलें जब जनता के सदस्यों से मुद्दों पर बात करती हैं तो मुद्दों की एक लंबी फ़ेहरिस्त सामने आती है। जनता के द्वारा इंटरव्यू में दिए गए मुद्दे केवल अच्छे विचार हो सकते हैं क्योंकि मतदाता शायद ही उन मुद्दों के आधार पर वोट देता है।

ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे यह चुनाव लगभग मुद्दा विहीन है। हम सब जानते हैं कि भारतीय मतदाताओं का विशालतम भाग केवल धर्म या जाति के आधार पर वोट देता है।फिर भी एक छोटा वर्ग ऐसा है जो इससे स्वतंत्र होकर मतदान करता है और सौभाग्यवश इसी वर्ग के वोट निर्णायक सिद्ध होते हैं। यही थोड़े से मतदाता चुनाव में मुद्दा ढूंढते हैं और इस बार दुर्भाग्यवश मुद्दे न मिलने के कारण हताश हैं। ऐसी स्थिति में यह निर्णायक वर्ग व्यक्तित्व और चेहरों के आधार पर वोट डालने के लिए विवश हो जाता है। मुद्दे विहीन वातावरण में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाइयां समाचार पत्रों की सुर्खियां बटोर रही हैं। संभवतया मुद्दों के अभाव में लगभग सभी चुनावी नेता अपनी भाषा और मर्यादा में नीचे उतरने का कीर्तिमान स्थापित कर रहें हैं।

विगत पाँच वर्षों में सोशल मीडिया ने अनेक बुद्धिजीवियों एवं विचारशील लोगों को कांक्रीट के दो ढेरों में बदल दिया है। चाहे कोई घटना हो या कोई समस्या हो ये कांक्रीट मष्तिष्क के बने हुए वर्ग केवल एक दिशा में ही सोच सकते हैं।यदि एक वर्ग कहता है कि बालाकोट में भारतीय वायुसेना ने अचूक हमला करके ढाई सौ आतंकवादियों को मार डाला है तो दूसरा वर्ग इसको सिरे से नकार देता है।

EVM को एक पक्ष पूरी तरह से सुरक्षित पाता है जबकि दूसरा पक्ष इसे पूरी तरह अविश्वसनीय बताता है। इसी प्रकार हर छोटी बड़ी बहस पर इनके मत सफ़ेद और काले रंग की तरह विपरीत ध्रुवों पर होते हैं। क्या सोशल मीडिया का वर्ग ओपिनियन मेकर का काम भी करता है इसकी झलक 2019 के चुनाव परिणामों में देखने को मिल जायेगी।

फ़िलहाल इस चुनाव में कोई मुद्दे हैं या नहीं,कोई लहर है या नहीं ,कोई विचित्र बात अंदर ही अंदर चल रही है या नहीं ये सब अभी स्पष्ट दिखाई नहीं देगा।चुनाव नतीजे आनेके बाद सभी राजनीतिक विश्लेषक अपने अपने तरीक़े से पश्चाद्दर्शी विचार रखेंगे। तब तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना ही बुद्धिमत्ता होगी।

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