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बेखबर रहने का सुकून | Lok Sabha Elections 2019 Summary

Posted on: 18 May 2019 07:31 by Pawan Yadav
बेखबर रहने का सुकून | Lok Sabha Elections 2019 Summary

सुरेंद्र बंसल
यह पहला आम चुनाव है जब अपन ने कोई योग, जोड़, आकलन, समीक्षा न लिखी न कोई प्रसारित की। बीते सभी महत्वपूर्ण आम चुनाव में अपनी उत्साहपूर्ण दखलन्दाजी रही है, इंदौर की निवर्तमान सांसद सुमित्रा महाजन के अश्मेघई जीत के सूक्ष्माकलनकर्ता भी रहे हैं, लेकिन इस दफा कोई रुचि नहीं रही, यह सोच लिया इस बार जो होगा सो होगा इसलिए न कुछ देखा, न कुछ जांचा, न कुछ परखा। अपनी कलम में अपन ने न स्याही भरी और न लोगों के साथ खुरपेंची की। बुध्दु बक्से को घर का बुढऊ समझ एक तरफ बिन बैटरी सा पटक रखा।

इसलिए अपने को नहीं मालूम नरेंद्र मोदी का पांच साल तक इंटरव्यू करने को तरसते लोगों का चुनावी इंटरव्यू से कैसे सीना 56 का हो गया, वाॅट्सअप पर कुछ क्लिप्स आई, इंटरव्यूकर्ता बता रहे थे कैसे और किस परिस्थितियों में उन्होंने मोदी से बात की और प्रधानमंत्री ने किस सहजता से उनके कथित तीक्ष्ण सवालों के उत्तर दिए, अलबत्ता यही कुछ राहुल गांधी के साथ हुआ, उनके इंटरव्यू कर्ताओं ने बताया कैसे अचानक ही दिल्ली से 1000 किमी दूर प्रचार के दौरान राहुल गांधी से भेंट हो गई जो इंटरव्यू में तब्दील हो गई, उन्होंने भी बताया सवाल अब तक जो नहीं पूछे गए वे सब सवाल उनसे पूछ लिए गए और राहुल गांधी ने संभल कर ही नहीं बड़े संबल से उनके ऊंचे किस्म के सवालों के अनुभवी राजनेता की तरह जवाब दिए, लेकिन जो ‘हुआ सो हुआ‘ अपन ने ध्यान नहीं दिया।


भाई अपन इसीलिए तो चुप थे, इस बड़े चुनाव में बड़े-बड़े लोग लगे हुए थे। अपना अदना कद किसी भी अंतरउंचाई को पकड़ ही नहीं सकता था। चुनाव प्रचार के पूरे समय बहुत ही सुकून रहा। नहीं तो एक समय था अपन जनसत्ता के लिए कवरेज करते हुए माचीसी गाड़ी मारुति से मालवा निमाड़ की खाक छान लेते थे, निमाड़ घूमते हुए जब रिपॉर्ट दिल्ली करते तो जनसत्ता में बैठे हमारे चुनाव डेस्क प्रभारी आदरणीय रामबहादुर राय साब उज्जैन, रतलाम, नीमच की खाक छानने का आदेश दे देते थे और हम पालनार्थ निकल जाते थे ठेठ राजस्थान बॉर्डर निम्बाहेड़ा तक। बड़ी मुश्किल कवरेज होती थी जो आजकल सर्वे में बदल गई है उस तरह की मसलन गांव, चैपाल, बस्ती और दुरआंचल की फलियों तक। कोई मोबाइल नहीं और कोई सुविधा नहीं।

अखबार जो एडवांस भेज देने की बात करते थे अभी तक पता नहीं उसका। रपट सब दूरसंचार के फैक्स पर निर्भर होती थी। दिन तो उपवास में ही गुजरते थे, किसी नेता के पास बैठकर कुछ खाते नहीं थे अलबत्ता महिदपुर में एक बार बाबूलाल जैन बीजेपी डिनर के वक्त मिल गए, तब बमुश्किल कचोरी समोसे और खोपरा पाक किसी तरह खा लिया। बीते 30-35 साल में किसी राजनेता का कुछ खाया सो आपको बतला दिया( ताई के भाई दूज आमंत्रण को छोड़कर) वहीं एक बार निमाड़ी नेता सुभाष यादव खरगोन से नर्मदा पार कसरावद तक ढूंढते रहे अपन उन्हें नहीं मिले, हमारे मित्र प्रेस क्लब अध्यक्ष अरविंद तिवारी उस वक्त खरगोन में थे उन्होंने बाद में वृतांत सुनाया।
खैर दो दिन बचे हैं अपनी चुप्पी के 19 मई से अपनी कलम फिर जबान खोलेगी और खुलकर खोलेगी। सबकी बात करेंगे और सबकी खबर देंगे अपने श्रध्देय प्रभाष दा ने संगत में यही दिया है। तब तक सत्ता की तैयारी मशीन के भीतर हो चुकी होगी। बहुत कुछ और भी चलिए तब तक मतदान का हिस्सा बनिये , अंतिम चरण के वोट में अपना कर्तव्य निभाते हैं।

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