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ले जा सिम सिम

Posted on: 02 Jun 2018 10:48 by Ravindra Singh Rana
ले जा सिम सिम

जब से बाबा ने अलीबाबा के ‘खुल जा सिम सिम’ की तर्ज पर अपने मुरीदों से ‘ले जा सिम सिम’ कहना शुरू किया है तभी से मन यही सोच सोचकर अनुलोम विलोम कर रहा है कि ‘संसार से भागे फिरने वालों’ के लिए इन ‘मोह मोह के धागों’ का क्या काम? अब जिन सज्जनों और देवियों की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में भ्रामरी प्राणायाम कर गिलोय का रसपान करने में, दोपहर लौकी के कद्दूकस सलाद के संग रूखी सूखी निगलने में, शाम पवित्र तुलसी के पत्ते जिव्हा के नीचे रख योगासन करने में और रात पुष्टाहार दलिया ग्रहण कर शीघ्र से शीघ्र शैया तक पहुँच जाने में बीत जाती हो, वे बेचारे इस सिम का क्या करेंगे? सिनेमा देखते नहीं, बुकिंग किसकी करेंगे? क्रिकेट का शौक फरमाते नहीं, भारतीय टीम के इंग्लैंड दौरे के संग संग अपना टूर पैकेज क्यूँ बनवाएंगे? पेटीएम एटीएम भी कैसे खेलें, पैसा तो हो? बच गया टीवी, तो भई जिन्हें सीरियल से आए कंटाला वे काहे लगाएँ झिंगालाला?

फिर सिम ले भी ली, तो पुरानी वाली सिम निकालेंगे कैसे? इसके लिए तो बड़े-बड़े नाखून चाहिए? वे बेचारे तो बाल उगाने के चक्कर में पहले ही घिस घिस के मधुशाला में वापरे हुए गन्ने की तरह रंगहीन-धारहीन हो चुके हैं. ऐसे थके हुए नाखूनों की मदद से यदि कचकची खाके मोबाइल खोलने की कोशिश की भी तो ‘दंत’ की ‘कांति’ वीरेंदर सहवाग के बालों की तरह ‘उजड़ा चमन’ हो सकती है. जैसे-तैसे विदेशी मोबाइल में यह सिम लग भी गई, तो स्वदेशी सिम की क्या औकात कि नेटवर्क पकड़ ले? अव्वल तो नेटवर्क मिलता नहीं, मिल भी जाए तो सामने वाला कवरेज एरिये से बाहर होता है. सामनेवाला कवरेज एरिये में हो, तो फोन एंगेज मिलता है.

फोन एंगेज न मिले तो वो उठाए नहीं, उठा ले तो आवाज़ साफ आए नहीं, आवाज़ साफ आए तो बात क्या करेंगे? वही पेट्रोल का उठना, सेन्सेक्स का गिरना; मौसम की गर्मी, बाजार की नरमी; कर्जे का बढ़ना, इज्जत का घटना; रिश्तों का बुझना, दोस्तों का भड़कना. क्या बात कीजिएगा ? ले दे के बचा व्हाट्सएप्प. वह इंस्टाल करो तो हर पल ‘टिचुंग टिचुंग’! कभी गुड मॉर्निंग, कभी गुड इवनिंग; कभी हैप्पी संडे, कभी मंडे के फंडे; किसी का बेटा पास हुआ, तो किसी की बेटी ब्याही; कहीं शादी की दूसरी वर्षग्रंथि तो कहीं अमुकजी की तीसरी पुण्यतिथि; कहीं फलों की टोकरी तो कहीं फूलों का हार; कहीं राजनीति के चप्पू तो कहीं फुरसतिये पप्पू! कहाँ बचें, किससे बचें? इससे तो अच्छा है, बाबा की दुकान पे जाओ, घानी के कच्चे तेल का पाउच उठाओ, घर जाकर इसे अचार की बरनी में उँड़ेलो, बरनी में एक चम्मच डालो, अचार पर तर्जनी उंगली टच कर ज़बान पर रखो और फिर गहरा चटखारा लो. कोई पूछे कि क्या हो रहा है, तो कहना, ‘कुछ नहीं जी चलते फिरते शीतली प्राणायाम कर रहे हैं’.

शशांक दुबे

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