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कानून के रखवाले वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी की टिप्पणी

Posted on: 01 May 2018 08:23 by Ravindra Singh Rana
कानून के रखवाले वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी की टिप्पणी

नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (एनएलआईयू) कानून की ऊंची तालीम का राष्ट्रीय स्तर का सबसे प्रतिष्ठित संस्थान है। एलएलबी के लिए 23 सौ सीटों के लिए हर साल करीब 45-50 हजार विद्यार्थी इसकी प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं। देश की 16 सरकारी यूनिवर्सिटी में भोपाल के एनएलआईयू की गिनती टॉप फाइव में है। क्या कोई सोच सकता है कि कानून की पढ़ाई के इतने अहम संस्थान में फर्जी डिग्रियों का भी कोई खेल हो सकता है? इन दिनों भोपाल एनएलआईयू में बांटी गई फर्जी डिग्रियों का केस देश भर में चर्चित है।

जनवरी 2017 में पहला मामला सामने आया तो सबके कान खड़े हो गए थे। दीक्षांत समारोह में एक विद्यार्थी को प्रोविजनल डिग्री दी गई। इन महाशय का दाखिला वर्ष 2011 में हुआ था। डिग्री प्राप्त करने के बाद प्रसन्नतापूर्वक ये लॉ ग्रेजुएट साहब मुंबई की एक जानी-मानी लॉ फर्म में लग गए थे सालाना 20 लाख रुपए के पैकेज पर। जिंदगी अपनी पटरी पर आ गई थी। बड़े विश्वविद्यालय में शानदार पढ़ाई, डिग्री पूरी करके देश के एक बड़े शहर की नामी लॉ फर्म मं ऊंचे पैकेज से शुरुआत इस बात के लिए काफी थी उनके लिए ऊंचे घराने की कई कन्याओं से शादी के विकल्प दरवाजे पर कतार लगाए मौजूद रहते। मां-बाप के लिए भी बड़े गर्व की बात थी। शाश्वत शेखर नाम के इस विद्यार्थी की खुशहाल जिंदगी शुरू हो गई थी।

कहीं से एक शिकायती कागज आया कि इन महाशय को फर्जी तरीके से डिग्री दी गई है। इसकी जांच होनी चाहिए। पहली बार किसी ने ऐसी शिकायत की थी। बाकायदा जांच हुई। शिकायत सही पाई गई। संस्थान की इज्जत को बट्‌टा लगना तय था। रायता ज्यादा फैलाने की बजाए तय किया गया कि घर की बात घर में रहे। कोई कार्रवाई नहीं की गई। मुंबई में नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरू कर रहे शाश्वत को यह मौका दिया गया कि वे सही ढंग से डिग्री हासिल करने के लिए फिर से इम्तहान में बैठें। उन्हंे एक मौका दिया गया कि वे उन विषयों काे फिर से पास करें, जिनमें फेल हैं और इसके बावजूद डिग्री ले चुके हैं। खेल बिगड़ता देख वे महाशय भी बैक टू पवेलियन होकर चुपचाप पढ़ाई में लग गए।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने राहत की सांस ली ही थी कि 17 और विद्यार्थियों की शिकायत आई। यह शिकायत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस तक को गई। एक तीन सदस्यीय इंटरनल कमेटी बनानी पड़ी ताकि मामले की सही-सही जांच हो। किसे यकीन आएगा कि इन 17 शूरवीरों में से 16 की डिग्रियां भी फर्जी पाई गईं। ये सभी भविष्य में कानून के रखवाले अलग-अलग बैचों के थे। वर्ष 2012 से 2015 के बीच के पास आउट। ये कई जगह बार कौंसिल में रजिस्टर्ड हो चुके थे। कुछ तो बाकायदा जज बन चुके थे। इनकी जिंदगी भी शानदार ढंग से शुरू हो चुकी थी, जहां शादी के लिए तैयार एक से बढ़कर एक ओहदेदार और मालदार घरानों की कन्याएं थीं, दौलत, इज्जत, शोहरत यानी आलीशान भविष्य का सब सामान और वह सब कुछ जो कभी सोचा भी नहीं।

सेवानिवृत्त जज जस्टिस अभय गोहिल ने भी यूनिवर्सिटी की साख को बरबाद करने वाले इस चर्चित केस की जांच की। पता चला कि जिन्हें फर्जी तरीके से डिग्री दी गई, उनमें से कई के कई विषय रुके हुए थे, वे फेल थे या वे परीक्षा में ही नहीं बैठे थे। परीक्षा के रिकॉर्ड में वाइटनर का इस्तेमाल कर कूट दस्तावेज रचे गए थे। इनकी मार्कशीट गलत ढंग से बना दी गई थीं। रिकॉर्ड बाद में करिअर चौपट न कर दें इस आखिरी सावधानी के लिए परीक्षा के रिकॉर्ड भी गायब कर दिए गए थे। अब आप कल्पना कीजिए कि यह सब किसी व्यापमं, राज्य शिक्षा बोर्ड या सीबीएसई के दफ्तर मंे नहीं हो रहा था। परीक्षा प्रणाली की हर पायदान पर सुनियोजित तरीके से यह गैरकानूनी नेटवर्क कहां काम कर रहा था और किनके लिए काम कर रहा था? ये सभी कानून के रखवाले हैं, जो ऐसा कर या करा रहे थे।

अब हाईकोर्ट के होश उड़े, क्योंकि इनमें से कुछ हाेनहार जजों की कुर्सियों तक जगह बना चुके थे और कानून के रखवाले बन चुके थे। हाईकोर्ट ने 43 और विद्यार्थियों की एक सूची यूनिवर्सिटी को भेजी ताकि इनकी कुंडली भी ढंग से देख ली जाए। जाने कौन किस ढंग से डिग्री लेने में कामयाब हो गया हो। इस घोटाले में सबसे ताजा अपडेट यही है कि इन 43 में से भी 10 प्रतिभाशाली बंदे ऐसे मिल गए, जिन्हें कायदे से डिग्री नहीं मिलनी चाहिए थी लेकिन वे चोर दरवाजों से अपनी ताकतवर हैसियत के बूते पर डिग्री पा गए थे। इससे भी बड़ी बात यह है कि ये सभी 10 युवा न्यायिक सेवाओं में भी जा पहुंचे थे। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता ने 5 मई को इस मसले पर बैठक के निर्देश दिए हैं। दो मई तक कौंसिल सदस्यों से मेल पर ही जवाब मांगा है। डिग्री वापस लेने की नीति बनाई जा रही है। सीजे की चिंता वाजिब है कि यह सार्वजनिक महत्व का बहुत बड़ा मामला है।

इतने बड़े पैमाने पर यह सब चल रहा था तो हवा में तो नहीं ही चल रहा होगा। जाहिर है कोई तो दोषी होगा। तो रंजीतसिंह नाम के असिस्टेंट रजिस्ट्रार निशाने पर आ गए। हर चीज सिर्फ इस एक आदमी पर केंद्रित कर दी गई। इनसे पूछताछ हुई। जस्टिस गोहिल को इन्होंने 200 पेज का जवाब दिया है। अपने आकाओं के प्रति वफादार इस शख्स ने किसी का नाम भी उजागर नहीं किया। इन्हें बर्खास्त कर दिया गया है।

मामला तूल पकड़ा तो पहले से ही विवादों में रहे डायरेक्टर एसएस सिंह से भी इस्तीफा धरवा लिया गया। प्रो. सिंह भी मामूली हस्ती नहीं थे। जबलपुर से एलएलएम के बाद 25 साल आईआईपीए में प्रोफेसर रहे और भोपाल के एनएलआईयू में डायरेक्टर बनने के पीछे उनके एक वरिष्ठ बीजेपी नेता से रिश्ते भी बड़ी वजह थे। यूपी और बिहार नकल-वकल के लिए बाकी राज्यों की तुलना में बेहद बदनाम रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था का हर संभव कबाड़ा हर स्तर पर वहां है। क्या संयोग है कि प्रो. सिंह उत्तरप्रदेश मूल के हैं और रंजीत सिंह बिहार से आए थे।

भोपाल से फर्जी तौर पर डिग्री हासिल करने वाले अब तक कुल 12 नाम ऐसे सामने आ चुके हैं, जो न्यायिक सेवाओं में हैं। यह संभव ही नहीं है कि दो सिंह अकेले बैठकर ये डिग्रियां बांट रहे थे। न ही उन्हें नौकरी से निकाल देना कोई सजा है। कार्रवाई के नाम पर यह तो लीपापोती है। अब तक किसी के खिलाफ एफआईआर भी नहीं हुई है। और यह सब वहां हो रहा है, जिससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सीधे कई बड़े जज जुड़े हैं और जहां से निकलने वाले युवाओं को भी आखिरकार काले कोट पहनकर अदालतों में ही प्रकट होना है। वे जज बनें या वकील।

इस केस ने सिर्फ कानून की पढ़ाई के ही सबसे ऊंचे संस्थान की इज्जत को मिट्‌टी में नहीं मिलाया है, यह उन हजारों मेहनतकश विद्यार्थियों के साथ भी धोखा है जो साल भर किताबों में खुद को झाेंककर रखते हैं। वे नहीं जानते कि उनकी प्रतिभा और मेहनत एक सीमा तक ही काम आएगी और जब कोई ताकतवर जज, वकील, नेता या कारोबारी का नाकाबिल बेटा बराबर में बैठा होगा तो पलड़ा उसका ही भारी होगा। वह फेल भी होगा तो डिग्री पाएगा। वह इम्तहान में नहीं भी बैठेगा तो भी दीक्षांत समारोह में सबसे आगे होगा। यहां से डिग्री हासिल कर लेने के बाद न्यायिक सेवाओं में भी इम्तहान होते हैं और वहां भी कोई सिंह ही विराजमान होगा या लॉ फर्म में भी दाखिले के लिए रसूख काम आएगा।

नौकरियों के बेहद सीमित अवसरों में शिक्षा और परीक्षा संस्थानों में घुन की तरह लगे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद ने हमारे समाज के प्रतिभाशाली युवाओं को सिर्फ कुंठित होने का आत्मघाती विकल्प छोड़ा है। सबसे ज्यादा मार उन पर है और वे ही सबसे ज्यादा घिरे हुए हैं, जिन्हें कम्बख्त किसी आरक्षण का भी आसरा नहीं है। कुछ अवसर आरक्षण के नाम पर कट हैं, कुछ पर रसूखदार बेईमानों की गिद्ध दृष्टि है ताकि उनकी नाकाबिल औलादों का भविष्य संवर जाए। इनके बीच से निकलकर कितने बच्चे अपनी मेहनत और प्रतिभा की असल कमाई हासिल कर पाते होंगे, कौन जानता है!

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