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इतिहास में दर्ज हो गई यह ‘जीजा-साले’ की कहानी

Posted on: 04 Nov 2018 13:03 by krishnpal rathore
इतिहास में दर्ज हो गई यह ‘जीजा-साले’ की कहानी

हर चुनाव में नेताओं के इंपोर्ट-एक्सपोर्ट होने का सिलसिला चलता रहता है। यह आम बात है। पर 3 नवंबर का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता में बच्चों के ‘मामा’ शिवराज सिंह चौहान को उनका खास ‘साला’ संजय सिंह मसानी ही मामू बनाकर कांग्रेस के कैंप में चला गया। अब जब भी विधानसभा चुनाव होंगे, तब प्रदेश में ‘जीजा-साले’ की यह कहानी राजनीति में चटखारे के साथ बखान की जाएगी। यह वही संजय सिंह मसानी हैं, जिनकी पहचान मध्यप्रदेश में बहन साधना सिंह के पति शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद स्थापित हुई। मध्यप्रदेश के नौकरशाह, राजनेता, व्यवसायी, ठेकेदार और लायजनर कोई भी हो, संजय सिंह मसानी के नाम से और काम से इन पंद्रह सालों में ज्यादातर परिचित हो गए होंगे। यहां तक कि इन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक विशिष्टजन भी भले व्यक्ति की माफिक जानते होंगे और संजय इनका आशीर्वाद भी पा चुके होंगे। पर शिवराज सिंह चौहान ने इस दिन की कल्पना नहीं की होगी कि उनके मुख्यमंत्री रहते उनका साला ही उन्हें नाकाबिल साबित करते हुए कांग्रेस नेता और अखाड़े में उन्हें चुनौती दे रहे पहलवान कमलनाथ को काबिल ठहराने पर तुल जाएगा।
वैसे इस पूरे एपीसोड में कुछ गलत नहीं है।

पिछले पंद्रह साल में पहली बार संजय सिंह मसानी ने योजनाबद्ध तरीके से चुनाव लडऩे की तैयारी की थी। पर जीजा शिवराज उन्हें ही टिकट दिलाने में नाकामयाब रहे तो फिर साले संजय का मन कैसे स्वीकार कर ले कि जीजा ‘काबिल’ हैं? संजय सिंह की फेसबुक प्रोफाइल उनकी महत्वाकांक्षा की साक्षी है। फिल्म पैडमैन में अक्षय कुमार के साले की भूमिका निभा चुके संजय सिंह मूल रूप से भले ही गोंदिया के हों लेकिन उनकी नजर बालाघाट जिले की बारासिवनी विधानसभा पर टिक गई थी। इसकी तैयारी भी उन्होंने शुरू कर दी थी। बुजुर्गों का सम्मान, नवरात्रि में झांकियों के दर्शन, युवाओं को प्रोत्साहन सहित क्षेत्रीय गतिविधियों में संजय इसीलिए रमे थे कि जीजाजी उन्हें सुपर पावर बनकर एक अदना सा विधानसभा टिकट तो दिलवा ही देंगे। भले ही इसके लिए उन्हें अपने सुपर वीटो पावर का इस्तेमाल करना पड़े। पर उनकी उम्मीदों पर तब वज्रपात हो गया, जब पहली सूची में ही बारासिवनी से विधायक योगेंद्र कुमार निर्मल को पार्टी ने हरी झंडी दे दी। और कमलनाथ भी कहां चूकने वाले। मध्यप्रदेश की जनता के सारथी के बतौर उन्होंने दुखती रग पर हाथ रखकर संजय को नाथ का मुरीद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि कहीं यह साधना-शिवराज की साजिश तो नहीं कि सत्ता हस्तांतरण होने पर कांग्रेस से सुरक्षित करने के लिए संजय को ढाल बनाया जा रहा हो। पर यह तो भविष्य ही बताएगा कि संजय किस भूमिका के बतौर याद किए जाएंगे। फिलहाल तो उनकी भूमिका महत्वाकांक्षी संजय की ही सामने आ रही है। जो महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए जीजा शिवराज को अकर्मण्य, सरकार को भ्रष्टाचारी और नामदारों के चक्कर में पडक़र कामदारों की उपेक्षा करने वाला ठहरा रहा है।

फिलहाल मध्यप्रदेश के चुनावी महाभारत में शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। युद्धभूमि के दोनों तरफ सेनाएं सजी हुई हैं। एक सेना के सेनापति कमलनाथ है तो दूसरे के शिवराज सिंह चौहान। पर संजय यहां एक नहीं दो-दो हैं और दोनों ही संजय शिवराज का साथ छोडक़र कमलनाथ के पाले में चले गए हैं। इन कलियुगी संजय की तुलना यदि महाभारतकालीन संजय से की जाए तो शायद इन्हें दूर का दर्शन इन्हें हो रहा है। पर इनमें फर्क यह है कि वह संजय मात्र दृष्टा था और कांग्रेस में पहुंचे दोनों ही संजय अपने-अपने क्षेत्र में सेनापति बनकर अपने शौर्य और पराक्रम का परचम फहराने को आतुर हैं। एक और संजय हैं जो कांग्रेस को लात मारकर कमल की पार्टी में गए और मंत्री भी बन गए। हो सकता है कि वक्त ने इन दोनों संजय के लिए भी कुछ तय कर रखा हो और बदलाव का वक्त कमल को छोड़ नाथ का हाथ थाम चुके इन संजयद्वय के साथ हो। हालांकि यह संजय वह काबिलियत नहीं रखते कि सत्ता के मद में धृतराष्ट्र न बनने की नसीहत दे सकें। इनकी काबिलियत तो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति तक ही आंकी जा सकती है।

साम,दाम, दंड और भेद की इस लड़ाई में चक्रव्यूह कुछ भी रचा गया हो लेकिन सेनापति शिवराज सिंह के लिए इस संजय का विषबमन करना जिंदगी में कसैलापन तो लाएगा ही। शिवराज सिंह चौहान को पिछले पांच साल में प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इतना त्रास नहीं दिया होगा, जितना पत्नी के रक्तसंबंधी सगे भाई संजय ने एक झटके में दे दिया। मोदी ने मध्यप्रदेश आकर एक बार भी शिवराज की तरफ मुस्करा कर नहीं देखा। पर शिवराज हैं कि हंसते ही रहे। विरोधी हैं कि उन्हें नौटंकीबाज ठहराने की पूरी कोशिश करते रहे लेकिन वे सम-विषम सभी परिस्थितियों में धैर्य बनाए रहे और सफलताएं दर्ज कराते रहे। मोदी भी मुस्कराए भले ही न हों लेकिन जुबां से तो उन्हें शिवराज की तारीफ करने पर मजबूर रहना ही पड़ा। यह बात अलग है कि वे अपने राजनैतिक धर्म का पालन कर रहे हों। पत्नी साधना सिंह मोदी के मंच पर पति शिवराज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी नहीं हो पाईं, अगर यह टीस कहीं शिवराज के मन में होगी तो इससे हजार गुना ज्यादा टीस साले के कांग्रेस में जाने और उन्हें नाकाबिल बताने की रहेगी। यदि संजय सुनियोजित तरीके से भी कांग्रेस में गए होंगे तब भी ये पल शिवराज को झूठा और फरेबी ही साबित करने के गवाह बनेंगे।

संकट के समय संजय का संशय करना ?
कहते हैं कि जब संकट के बादल छाते हैं तो सभी तरफ से एक साथ आते हैं। अब टिकट वितरण के बाद पूरे प्रदेश में भाजपा के खिलाफ असंतोष के स्वर फूट रहे हैं और डैमेज कंट्रोल के रास्ते चौतरफा बंद दिख रहे हैं। कार्यकर्ताओं का भरोसा पार्टी के वरिष्ठ स्वयंभू बन चुके पदाधिकारियों से उठ रहा है। इसके बाद भी भाजपा दो सौ पार का राग अलाप रही है। परिवारवाद, भाई-भतीजावाद, पैसे लेकर टिकटों की बंदरबाट, बदला लेने की प्रवृत्ति की सोच जैसे आरोप विधायक रह चुके नेता लगा रहे हैं। शुचिता की बात करने वाली पार्टी कांग्रेस के बाहुबली नेता रहे प्रेमचंद्र गुड्डू को अपने पाले में लाई है। तो पैराशूट लैंडिंग करने वाले नेताओं को टिकट देकर उपकृत कर रही है। बुंदेलखंड हो या बघेलखंड, महाकौशल हो या मालवा-निमाड़, मध्यभारत हो या फिर चंबल सभी जगह बगावत के सुर फूट रहे हैं। ऐसे संकट में संजय का उन पर संशय करना निश्चित तौर से शिवराज के दिल को छलनी-छलनी करेगा। इसका साया भी विधानसभा चुनाव पर साफ तौर पर दिखाई देगा। जिस तरह सीता के लंका से लौटने पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी उस धोबी का मुंह बंद नहीं कर पाए थे, जिसने सीता के चरित्र पर संदेह किया था। ठीक उसी तरह इस जनता का मुंह अब शिवराज और उनकी पार्टी बंद नहीं कर पाएगी, जब वह यह संदेह प्रकट करेगी कि जब साला ही शिवराज पर भरोसा नहीं कर पा रहा है तो फिर जनता और मतदाता, मजदूर और अन्नदाता कैसे भरोसा करें ? 3 नवंबर को दर्ज संजय और शिव का यह प्रसंग अब राजनीति का इतिहास बन गया है, जो हमेशा शिवराज की मुख्यमंत्री के बतौर कथित उपलब्धियों पर कालिख पोतने के लिए याद किया जाएगा।

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