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जानिए क्यों शुरू हो गए अब समानांतर लिटरेचर फेस्टिवल

Posted on: 14 Jan 2019 15:11 by Ravindra Singh Rana
जानिए क्यों शुरू हो गए अब समानांतर लिटरेचर फेस्टिवल

पत्रकार ऋषिकेश राजोरिया की कलम से

सर्दियों में साहित्य का काफी प्रचार होता है। करीब दस साल पहले जयपुर में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल शुरू हुआ था, जो अब काफी चर्चित हो गया है। दुनिया भर के लोग इस साहित्य महोत्सव में आते हैं। चार-पांच दिन के इस आयोजन में आधा दर्जन से ज्यादा मंच जगह-जगह लगाकर विभिन्न विषयों पर साहित्यिक चर्चा होती है। इस फेस्टिवल में ऐसे फिल्म स्टार भी दिखाई दे जाते हैं, जो बगैर पैसे लिए कहीं नहीं जाते। फेस्टिवल में दिनभर की तमाम बहसों के बाद शाम का माहौल रंगीन होता है। पासधारी लोगों को निशुल्क आचमन करने की सुविधा मिलती है। इस फेस्टिवल के मौके पर कई होटलों में कमरों की बुकिंग हो जाती है। यहां आने वाले लोग जयपुर में खर्च करते हैं, जिससे जयपुर का ही फायदा होता है।

जयपुर लिटरेचल फेस्टिवल में अंग्रेजी का बोलबाला रहता है। लोकभाषा संबंधी विषयों पर भी अंग्रेजी में चर्चा होती है। हिंदी की उपस्थिति नाममात्र की ही रहती है। पूरा तामझाम अमेरिकी शैली का होता है। स्टालों पर नाश्ते में पास्ता मिलता है। इस आयोजन से साहित्य का कितना लाभ होता है और आयोजकों को कितना लाभ होता है, यह बेहद जटिल गणित है। हर मंच पर होने वाली बहसों का विभिन्न कंपनियों की तरफ से प्रायोजन होता है। इनमें कई विवादग्रस्त कंपनियां भी होती है। समझा जा सकता है कि साहित्य को पुष्ट करने के लिए पैसा कहां से आता है?

पिछले साल से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की तर्ज पर समानांतर साहित्य महोत्सव शुरू हुआ है, जिसका डिजाइन जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की तरह ही है। इसमें हिंदी, उर्दू और स्थानीय भाषा के साहित्यकारों के चर्चा सत्र आयोजित होते हैं। पिछले साल यह ठीक रहा। इस साल भी इसके आयोजन की तैयारियां हो चुकी हैं। इसमें प्रगतिशील लेखक संघ की प्रमुख भूमिका बताई जाती है। इससे पहले इंदौर में भी लिटरेचर फेस्टिवल हुआ था, जिसमें कई साहित्यकारों ने शिरकत की थी और सोशल मीडिया पर इसकी बहुत चर्चा हुई थी।

समानांतर साहित्य महोत्सव का आयोजन करने वाले बाजार की विचारधारा से समझौता करते हुए मालूम पड़ते हैं। जहां भी बड़ा आयोजन होता है, वहां धन और संसाधन की आवश्यकता होती है। इसमें अपने आप बाजार की जगह बन जाती है। पहले इसके आयोजक हिंदी भक्त होते नहीं अघाते थे, लेकिन इस बार इनका साहित्य महोत्सव पैरेलल लिटरेचर फेस्टिवल (PLF) के नाम से प्रचारित हो रहा है।

शायद आयोजकों को लगता होगा कि वे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को टक्कर दे रहे हैं। जेएलएफ के मुकाबले पीएलएफ। यह अच्छी बात है, लेकिन इसके पीछे मुख्य लक्ष्य क्या है? जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का लक्ष्य स्पष्ट है। इसके माध्यम से साहित्य को बाजार की ताकतों का अनुयायी साबित किया जाता है। बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस आयोजन में प्रायोजक होती हैं। अखबार भी इसके बारे में खूब सामग्री छापते हैं। यह साबित करने की कोशिश होती है कि फेस्टिवल में लाखों लोग उमड़ रहे हैं। जगह पर जाकर देखने पर फेस्टिवल की गतिविधियां पिकनिक स्पॉट की तरह लगती हैं, जहां खास किस्म के लोग साहित्य के नाम पर बातें करने इकट्ठा होते हैं।

क्या पैरेलल लिटरेचर फेस्टिवल में भाग लेने वाले लोग इन खास किस्म के लोगों से अलग रहेंगे? जेएलएफ में राजनीतिक विमर्श बहुत कम होता है, लेकिन वह पूंजीवाद का प्रतीक है। पैरेलल लिटरेचर फेस्टिवल में राजनीतिक विमर्श की क्या स्थिति क्या होगी? वह किसका प्रतीक होगा? पूंजीवाद का या समाजवाद का? सुनने में आया है कि इसके आयोजक छद्म वामपंथी है और समयानुसार हिंदू विरोधी हो जाते हैं। इनमें से एक को मैं भी जानता हूं, जिनके साथ मेरा काफी समय गुजरा। वे लंबे समय से पत्रकार संगठनों की राजनीति करते आए हैं और अब एक लेखक संगठन की कुर्सी पर बैठ गए हैं।

करीब तीस साल से पत्रकारिता करने वाले के लिए इस तरह का आयोजन कठिन नहीं होता, जिसमें दोसौ ढाईसौ लोग जुट जाएं। वे खुद को साहित्यकार बताते हैं। कुछ न कुछ लिख भी लेते हैं। उनकी कुछ कहानियां छपी हैं। एक अखबार में उनका एक कॉलम रोजाना छपता था, जिसके संग्रह की उन्होंने किताब छपवा ली है, जिसकी वजह से वे व्यंग्यकारों की कतार में शामिल हो गए हैं।

हालांकि साहित्य से उनका ज्यादा लेना-देना नहीं है। फिर भी अगर वे कुछ कर रहे हैं तो अच्छी बात है। हिंदी साहित्य पर विचार-विमर्श के लिए मंच उपलब्ध होने चाहिए। अगर वे बाजारवादी ताकतों के असर से साहित्य को बचाते हुए सही रास्ता पकड़े रहे तो इससे हिंदी साहित्य का बहुत भला होगा। उनके कई पाप धुल जाएंगे।…. लेकिन यह कठिन मालूम पड़ता है क्योंकि समानांतर साहित्य महोत्सव दूसरे साल में ही पैरेलल हो गया है। यहां भी बाजारवादी ताकतों की आहट सुनाई देने लगी है।

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