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जानिए जहर याने विष की पूरी कहानी

Posted on: 07 Jan 2019 18:17 by mangleshwar singh
जानिए जहर याने विष की पूरी कहानी

ममता भारती

कहते हैं कि सागर के निचले चौदह रत्नों में एक विष भी था, जिसे कंठ से उतारकर शिव महादेव हो गये थे। इसके अलावा विष की उत्पत्ति के संबंध में एक कथा यह भी है कि जब ब्रह्मा सृष्टि की रचना कर रहे थे, तो उन्हें कैटभ नाम के दैत्य ने इतना परेशान किया कि उन्हें इतना भयंकर क्रोध आया कि खुद क्रोध शरीर धारण करके ब्रह्मा जी के मुख मार्ग से निकलकर सामने खड़ा हो गया और उसने कैटभ को मार डाला। उसे मारने के बावजूद वह तीव्र गति से बढऩे लगा, तो देवलोक में सभी चिंतित हो गये और ब्रह्मा जी से प्रार्थना करने लगे, तब उन्होंने क्रोधरूपी विष को खंड-खंड कर जड़ और चेतन पदार्थों में स्थान दे दिया, तभी से विष के दो भेद हो गये, स्थावर और जगम। विषैली धातु और वनस्पति में स्थावर विष और सांप, बिच्छू आदि चीजों में जगम विष पाया जाता है, यह विष, दृष्टि, श्वास, डंक, नख, दांत, मूत्र तथा लार आदि के माध्यम से बाहर आता है। स्थावर विष में जड़, छाल, फल-फूल, दूध और धातु आदि को अधिष्ठान माना जाता है।

 

विषाद पैदा करने के कारण इसे विष कहा जाता है। यह उष्ण, सूखा, तेज, सूक्ष्म और आशु होता है। अत: प्राणघातक बन जाता है। विषाक्त भोजन को देखने से ही चकोर पक्षी दृष्टिहीन हो जाता है। क्रौंच पक्षी पागल हो जाता है। तोता, मैना चीखने लगते हैं और चीतल, हिरण रोने लगते हैं। बंदर को मलत्याग की स्थिति से गुजरना पड़ता है। ‘जीव-जीवक’ पक्षी का तो प्राणांत हो जाता है, जबकि मोर प्रसन्न हो जाता है। विषाक्त भोजन की चिकित्सा में कमल और चंदन का लेप, प्रियंगु, अनंत मूल और कायफल का प्रयोग किया जाता है। विषैले दूध, शहद, जल, और तेल में प्राय: झाग और बुलबुले दिखाई देते हैं। विष के संपर्क में आकर कच्चे फल जल्दी पक जाते हैं, पक्के फल जल्दी सड़ जाते हैं। सामान्यत: विष संपर्क से पके फल रस और स्वादहीन तथा गंधहीन होते हैं। उपयोग से पहले ऐसे फलों को खूब धोना चाहिए।

 

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केवल ऐसी बात ही नहीं है कि विष केवल प्राण लेता है अथवा रोग उत्पन्न करता है, बल्कि विभिन्न प्रकार के विष लाभदायक होते हैं। कई कोटि के विष औषधि-निर्माण में भी काम आते हैं और इस प्रकार देखा जाये तो विष केवल प्राण लेता ही नहीं वरन् प्राणदायक भी है। बशर्ते उसका उपयोग सही रूप और उचित विधि से किया जाये। केंद्रीय विष अनुसंधान संस्थान, लखनऊ उ.प्र. में वर्षों से निरंतर इस बात की खोजबीन की जा रही है कि किस प्रकार विष का उपयोग दवाओं में किया जा सकता है। दवाओं के क्षेत्र में विष के गुणकारी उपयोग को देखकर दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है।

 

सर्प- विष में सर्वप्रथम नीम पत्ती को खिलाकर पहचान करें

 

डोरी से कसकर बंधन लगा दें। वमन करायें और सीधे डॉक्टर के पास ले जाएं। बिच्छू, मकड़ी, चूहा, पागल कुत्ता, गीदड़ आदि पशु भी कभी-कभी काटकर शरीर में विष का प्रवेश करा देते हैं। आयुर्वेद में सभी प्रकार के विष का प्रभाव दूर करने के लिए शिरीष तथा अपामार्ग के बीच श्वेत कोयल, नीली कोयल तथा मकोय का समान भाग गोमूत्र में पीसकर इससे धृतसिद्ध करें। यह अमृत सर्पि परम विषनाशन कही गई है।

 

संखिया (फेनाश्म) खा लेने पर उल्टी-दस्त शुरू हो जाते हैं, ऐसे में दूध की लस्सी से अमाशय की धुलाई करनी चाहिए। साथ ही हायड्रेटेड फेरिक आक्साइड देने से लाभ मिलता है। बिच्छू के विष में असह्य पीड़ा होती है। लगे डंग के स्थान पर सूखे गर्म गोबर से स्वेदन कर पोछ डालें, फिर हल्दी, सेंधा नमक, त्रिकुट, शिरीष के फलों का चूर्ण डालकर प्रतिसारण का घर्षण क्रिया करने से तुरंत लाभ मिलता है।

 

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मकड़ी के विष में लखूड़े की छाल का लेप करें तथा इसका पेय बनाकर पिलाना उत्तम रहता है। पीतल की छाल का लेप तथा दूध मिलाकर पिलाने से भी लाभ पहुंचता है। धतूरे के विष में पायलोकाटपीन नाइट्रेट का इंजेक्शन एंटीडोज में लगाया जाता है। जमालगोटा (जयपालविषा) के बीज और तेल विषैले होते हैं। इन्हें खा लेने वाले रोगी को कपूर का अर्क देना चाहिए। अरंड के बीज खाने वा मार्फिया इंजेक्शन दिया जाता है। इंद्रायण विष में जौ का पानी तथा लाल रत्ती या गुंजा विष में एंटी एब्रिन का इंजेक्शन काम आता है। अफीम विष में पोटेशियम परमैंगनेट (लालदवा) २० ओंस जल में १० ग्रेन घोलकर पिलानी चाहिए। शराब के सभी गुण भी विष के समान होते हैं। इसलिए अधिक मात्रा में लेने पर यह भी विष बन जाती है। अत: मद्य विष में शीघ्र वमन कराकर विष को बाहर निकालना चाहिए।

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