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जानिए किस तरह से तिब्बत में मां बनने के लिए भी सिर्फ एक बार परमिट मिलता है

Posted on: 28 Jan 2019 17:19 by Ravindra Singh Rana
जानिए किस तरह से तिब्बत में मां बनने के लिए भी सिर्फ एक बार परमिट मिलता है

लेकिन इससे भी ज्यादा विचलित करने वाले वे ब्योरे हैं, जो हाल में तिब्बत से आये शरणार्थियों ने दिये हैं। पाठकों की जानकारी के लिये इनमें से सिर्फ एक ब्यौरा (सौजन्य: तिब्बतन वुमेल एसोसिएशन) इस प्रकार है -तिब्बत में हर महिला को संतान पैदा करने से पहले सरकार से एक परमिट लेना जरूरी है। एक महिला को अपने जीवनकाल में सिर्फ एक बार परमिट मिल सकता है। मां बनने के लिए कम से कम २२ साल की उम्र होना जरूरी है। यदि परमिट के अभाव में गर्भ ठहर जाता है, तो उसको कानूनी तौर पर गिराया जाता।

ऐसी खबरें हैं कि कानूनी तौर पर गर्भ गिराने की संख्या चिंताजनक है। कई बार नौ महीने के पूर्ण जीवित गर्भ को भी ‘गिरा’ कर मिट्टी में दबा दिया जाता है। गर्भपात के लिए पुराने, नुकसानदेह तरीकों का प्रयोग तो होता ही है, ज्यादातर जगहों पर भ्रूण को सिर्फ टॉयलेट से फ्लश करने की व्यवस्था है। यह सब चीन की ‘जनसंख्या नियंत्रण नीति’ के नाम पर किया जा रहा है, जिसमें ‘अल्पसंख्यकों के जनसंख्या नियंत्रण’ का खास प्रावधान है।

1987 में भिक्षुओं के पहले प्रदर्शन के बाद चीन सरकार ने तिब्बत में बाहरी लोगों के आने पर रोक लगा दी थी। विदेशियों के मौजूद होने के कारण ही वह मामला बाहर पहुंचा था। अब वहां क्या हो रहा है। इसकी जानकारी किसी सकुशल पहुंच गये शरणार्थी से पता चलती है और तिब्बती शरणार्थी हमारे यहां सब जगह हैं। नये-पुराने भारतीय जीवन में इस कदर रस-बसे कि उनकी अलग उपस्थिति का सिर्फ तब पता चलता है, जब उनके जख्म हरे हो जाए। जब वे भारत की सडक़ों पर निकल आये। पंडित नेहरू ने दलाई लामा और उनके साथियों को चीन के नरसंहार से बचाने के लिए पनाह दी, लेकिन यूनाइटेड नेशन्स में जब तिब्बत पर चीनी कब्जे के विरुद्ध प्रस्ताव रखा गया।

भारत ने वोट नहीं दिया। तिब्बती नरसंहार पर भारत ने यूनाइटेड नेशन्स में चीन के विरुद्ध तीसरी बार प्रस्ताव रखे जाने पर, 1965 में तब मुंह खोला, जब चीन भारत पर आक्रमण करके उसकी सीमा का कई मील इलाका कब्जे में ले चुका था। इस बार भी चीन सरकार को खुश करने के लिए हमारी सरकार तिब्बतियों को धर-पकड़ कर जेलों में बंद करती रही जैसे उनकी उपस्थिति से शर्मिंदा हो। हमारे यहां वे 1 लाख की संख्या में 30 वर्षों से हैँ और हमारे नहीं हैं। धीरे-धीरे सारा विश्व उनके संघर्ष में उनके साथ होता जा रहा है, लेकिन हम अभी भी कहीं और दूसरी तरफ देख रहे हैं।

उनके स्वप्नों में अभी भी तिब्बत आता है। तिब्बत, जो इन वर्षों में तेजी से लुप्त होता जा रहा है। तिब्बत जो है, तिब्बत जो नहीं है। क्या तिब्बत के दुख पर किसी भी तरह उंगली रखना संभव है? यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम नष्ट होती सभ्यता और लुप्त होती प्रजातियों के समय में जी रहे हैं। कहीं एक मिनट ठहर कर हमें इस बारे में सोचना ही होगा, उस अजन्मे तिब्बती के बारे में,जो शायद कहीं सोचना हो-तिब्बत कहां है?

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