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किसान रैली: दर्द निवारण का कोई स्थायी मंतर मिलेगा या फिर…?

Posted on: 01 Dec 2018 09:53 by Ravindra Singh Rana
किसान रैली: दर्द निवारण का कोई स्थायी मंतर मिलेगा या फिर…?

अजय बोकिल की कलम से 

दिल्ली के जंतर मंतर पर कर्ज माफी और फसलों की समर्थन मूल्य पर खरीदी जैसी बुनियादों मांगों को लेकर हुए किसानों के बड़े जमावड़े और इस मंच पर विपक्षी नेताअो की प्रभावी मौजूदगी से यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या यह किसानों की समस्याअों के हल की दिशा में सचमुच कोई कारगर पहल है या फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता की एक और रिहर्सल है? ऐसा मानने के पीछे ठोस वजह यह है कि पहले भी किसानों की ऐसी रैलियां होती रही हैं, लेकिन अन्नदाता की बुनियादी समस्याअों का कोई ठोस और स्थायी हल आज तक नहीं हुआ। कुछ सियासी दलों ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी और आगे बढ़ गए।

किसान जहां था, वहीं रहा और आज भी वही हैं। इस कड़वी सच्चाई के बावजूद अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएसएस) के बैनर तले देश की राजधानी में हो इस बड़ी रैली के कुछ मायने हैं। पहली बात तो यह है कि इसमें देश भर के 201 किसान संगठन शामिल हैं। इसे किसान मुक्ति मार्च नाम दिया गया है। अपना दर्द लिए दिल्ली में इकट्ठा हुए इन हजारों किसानों में मध्यप्रदेश सहित देश के कई राज्यों के ‍िकसान शामिल हैं। इसकी अगुवाई योगेन्द्र यादव कर रहे हैं। अपने आंोलन के तहत इन किसानों ने संसद को भी घेरा।

गौरतलब है कि इस देश में करीब 11 करोड़ किसान हैं और 14 करोड़ से अधिक खेतिहर मजदूर हैं। देश की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का बड़ा योगदान है। हालांकि जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी लगातार घटती जा रही है और खेती में लगे किसानों की हालत बदतर होती जा रही है। कारण उनका लगातार कर्ज तले दबा होना और उपज का सही मूल्य न मिलना है। ऐसे में तमाम राजनीतिक नारेबाजी के बावजूद खेती घाटे का धंधा बन गई है। बीते 23 सालों में देश में 3 लाख से ज्यादा किसान हताशा में खुदकुशी कर चुके हैं और यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। सबसे बुरी हालत उन 90 फीसदी सीमांत किसानों की है, जिनकी जोतें दो एकड़ से भी कम हैं।

सीएसडीएस द्वारा किए एक अध्ययन के मुताबिक देश में 76 फीसदी किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हैं,क्योंकि खेती से मुनाफा तो दूर पेट पालना तक दूभर हो रहा है। दिल्ली पहुंचे किसानों की भी यही पीड़ा है। उनकी मुख्यी मांगों में देश की कृषि नीति में बदलाव, किसानों की समस्याअों पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने तथा उसमें फसलों के उचित दाम की गारंटी और किसानो को कर्जमुक्ति का कानून पास करना शामिल है। इसके लिए दो ड्राफ्टु भी तैयार किए गए हैं। किसान स्वामीनाथन आयोग की उस रिपोर्ट पर बहस की मांग भी कर रहे हैं, जिसमें समूचे कृषि संकट पर बात की गई है। किसानों की मांगों का समर्थन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ के अनुसार संसद के ‘विशेष सत्र में खेती में होने वाले पब्लिक इन्वेस्टमेंट और खेती से निजीकरण की वापसी पर बहस हो। इस पर भी बात हो कि अगले 30 बरसों के अंदर देश में कैसी खेती चाहिए, हमें कॉरपोरेट संचालित खेती चाहिए या सामुदायिक खेती?’ इस किसान आंदोलन का एक खास पहलू यह भी है कि इसमें शहरी मध्य वर्ग के लोग भी हिस्सेदारी कर रहे हैं।

हालांकि पिछले चार महीने में देश में ऐसे कई किसान आंदोलन हुए हैं। उनका हश्र सरकार को मांग पत्र देने और सरकारी से कोई लिखित आश्वासन लेकर घर लौट जाने के रूप में हुआ है। अफसोस कि लिखित आश्वासनों के बाद सरकारें भी उन्हें सहजता से भूल जाती हैं। किसान जुटाए भी जाते हैं ‍तो किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए। किसानों के ताजा आंदोलन में भी केन्द्र की मोदी सरकार को घेरने और उसे सत्ता से हटाने के राजनीतिक यज्ञ का स्पष्ट संकेत है। इस मंच पर वामपंथी सहित सभी प्रमुख विपक्षी दलों के नेता दिखाई दिए। कांग्रेस अध्यघक्ष राहुल गांधी ने अपने भाषण में सीधे मोदी सरकार पर निशाना साधा और किसानो से आह्वान किया कि वे इस ‘किसान विरोधी सरकार’ को सत्ता से हटा दें। दूसरे शब्दों में उन्हें हटाकर हमे कुर्सी पर बिठाएं।

यही किसानों की असली समस्या है। हर सरकार में वो केवल विपक्ष का मोहरा बनकर रह जाते हैं। राजनीतिक पार्टियां सत्ता ह‍ासिल करने के लिए किसान कर्ज माफी और उपज के बेहतर मूल्य का वादा करती हैं और सत्ता मिलते ही ‘इधर-उधर’ की बात करने लगती हैं। उम्मीदों के भरोसे जीता किसान भीड़ का पर्याय बन कर रह जाता है। कर्ज माफी भी एक ऐसा ही भुलावा है। पंजाब में पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस किसानों की पूर्ण कर्ज माफी के मुददे पर सत्ता में आई, लेकिन वास्तव में उसने छोटे किसानों के दो लाख तक के कर्ज ही माफ किए। यह काम भी किस्तों में चल रहा है। हैं। इसी तरह भाजपा जहां सत्ता में है, वहां कर्ज माफी की बात नहीं कर रही, लेकिन तेलंगाना जैसे राज्य में जहां उसके सत्ता में आने की संभावना नहीं के बराबर है, दो लाख तक किसानो का कर्ज माफ करने का वादा कर रही है। और फिर कर्ज माफी तो एक बार होगी, लेकिन किसान को तो हर फसल के लिए पैसा चाहिए, उसका क्या?

अब सवाल यह है कि यह रैली भी राजनीतिक फार्स का ही हिस्सा है या फिर इससे कोई हल भी ‍निकलेगा ? किसान रैली का एक नारा यह भी है कि ‘हमे अयोध्या नहीं, कर्ज माफी चाहिए।‘ लेकिन केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा या उससे जुड़े संगठन इससे बेफिकर दिल्ली में राम रथ यात्रा निकाल रहे हैं। क्योंकि उनका मानना है कि व्यावहािरक मुद्दों को भावना्त्मक मुद्दों से बेहोश किया जा सकता है।जब चुनाव आएंगे तो किसानों को फिर कोई गाजर देकर बहला लिया जाएगा।

फिर भी इस रैली का महत्व इसलिए है कि किसान सत्ता तंत्र से जवाब तलब तो कर रहे हैं। एक दबाव बनाने की कोशिश तो है। वैसे ऐसी रैलियां हर नई सरकार के सत्ता में आने के एक साल के भीतर ही होनी चाहिएं ताकि सरकारें किसानों की बात को केवल एक कान से न सुनें। यह बात अलग है कि चूंकि यह रैली विपक्षी दलों ने आयोजित की है, इसलिए केन्द्र में सत्तासीन मोदी सरकार इसके केवल राजनीतिक चश्मे से ही देखेगी। किसान फिर अपनी पोटलियां सिर पर रखे वैसे ही खाली हाथ लौटेगा। विडंबना यह है कि जो भी पार्टी या गठबंधन सत्ता में आता है, वह यह मानकर चलता है कि किसानों के भले का पट्टा उसने पहले ही लिखवा लिया है। उसके राज में किसान स्वर्गिक सुख भोग रहे हैं। इस कथित ‘राम राज’ में किसानों की पीड़ा की बात करते हैं, वो केवल सत्तालोलुपता के शिकार हैं। वे केवल हमे हटाने के लिए किसानों के कंधों पर सवार हुए हैं। क्योंकि कोई सच में किसान का भला कोई कर रहा होता अथवा उनकी जिंदगी बदल देता तो वह सत्ता से बेदखल ही क्यों होता ? उधर किसान की त्रासदी यह है कि वह चुनाव के वक्त अपने दुख-दर्द गोदाम में रखकर ऐसे भुलावों में खो जाता है, जिनका उसकी अपनी परेशानियों से ज्यादा सरोकार नहीं होता। वो केवल सरकारें बदलने का प्रयोग करता रहता है और हर बार खुद को और ज्यादा गड्ढे में गिरा पाता है। सत्ताधीशों से उसे केवल उपदेश मिलते हैं। ‘मेक इन इंडिया’ जैसे दावों के बीच किसान के पास यह आॅप्शन भी नहीं है कि वह खेती छोड़े तो करे क्या?

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