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मान लीजिए कश्मीर 2019 का मुख्य मुद्दा है, सुरेंद्र बंसल की कलम से….

Posted on: 20 Jun 2018 11:20 by krishnpal rathore
मान लीजिए कश्मीर 2019 का मुख्य मुद्दा है, सुरेंद्र बंसल की कलम से….

जम्मू-कश्मीर में गठबंधन तीन साल चल गया यह सब्र का बेमेल जोड़ था, दोनों ने निभाया जब तक चला अब बारी टूटने की थी ,सो टूट गया।दरअसल गठबंधन में सियासी मकसद तो होते हैं लेकिन सत्ता ही नहीं चलाई जाती , राजनीति चलाई जाती है । पीडीपी और बीजेपी ने वहां अपनी अपनी राजनीति की और राजनीति के नए दांव के लिए बाहर भी हो लिए।ज और क में जम्मू का जख्म है और कश्मीर की कसम, कसक तथा मीर हो जाने की ललक भी है। बीजेपी नीतिअन्तर्गत जम्मू के जख्म को भरना चाहती है और कसम से कश्मीर को भारत के मूल से जोड़ना चाहती है। जबकि पीडीपी और नेकां कश्मीर को स्वतंत्र करने की अंदरूनी ललक लिए जी रहे हैं। दोनों ही पार्टी के जम्मू कश्मीर में मुद्दे अलग अलग और विरोधाभाषी है और यह तब था जब दोनों के बीच सियासी समझौता हुआ था।

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अब तीन साल गुजरे यह समझौता टूटा है तो इसके पीछे दोनों ही पार्टी के अपने एजेंडे हैं। पीडीपी नरम रुख की पार्टी है और चरमपंथियों से शुरू से ही बातचीत से हल निकालने की पक्षधर रही है , कश्मीर में उसका हर स्टेप बीजेपी से बेमेल ही रहा है। रमज़ान में सीजफायर सीधे रुककर टूटने का समझौता था यह समझ बन चुकी थी कि दोनों ही पार्टी को अब अपने अपने रास्ते चले जाना चाहिए। बीजेपी के लिए 2019 बहुत महत्वपूर्ण और चुनौतियों से परिपूर्ण है । ऐसे में बीजेपी नहीं चाहती कि जेके में पीडीपी के साथ खड़ी रहकर नई पनौती शुरू हो। यूँ देखे तो कश्मीर भी एक हथियार है और मकसद भी ,बीजेपी का। यह गठबंधन बकौल मुफ़्ती मोहम्मद सईद उत्तर और दक्षिण का गठबंधन था जाहिर है उन्हेँ भी इसमें कोई विश्वास नहीं था। यह भी देखिए नेशनल कॉन्फ्रेंस से निकले हुए सईद राज्य में कांग्रेस के 12 साल अध्यक्ष रहे, 1988 में जनता दल सरकार में केंद्र गृहमंत्री हुए और 2002में कांग्रेस से ही जोड़ कर 16 सीट पर ही मुख्यमंत्री हो गए। बेटी रुबिया सईद को छुड़वाने के लिए चरमपंथियों को रिहा करवाया और बदनाम हुए। उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती ने जब से पीडीपी की कमान ली , पीडीपी अपने मकसद से फिर बढ़ी लेकिन अनुच्छेद 356 और 249 पर उसके मतभेद बीजेपी से बने रहे, पीडीपी चाहती थी ये अनुच्छेद कमज़ोर हो और ग्रेटर जम्मू कश्मीर का उद्देश्य पूरा हो । उधर बीजेपी का कश्मीर को लेकर रुख कभी बदलाव का नहीं रहा “एक विधान और एक निशान ” की नीति को बीजेपी अब अलग नहीं रख सकती। 2019 के केंद्र में ये मुद्दे जरूर रहेंगे ऐसे में बीजेपी को धारा 370 पर भी जवाब देना है। हिंदुस्तान के लोग कश्मीर को लेकर उतने ही जज़्बाती हैं जितने कश्मीरी। कोई कश्मीर को खोना नहीं चाहता। पीडीपी चाहती थी कि सशस्त्र बलों विशेषधिकार खत्म हो लेकिन बीजेपी तो अब उसके और आगे सख्ती के साथ जाना चाहती है।

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इस समझौते से बीजेपी को एक फायदा यह हुआ कि उसने सत्ता के भीतर घुसकर कश्मीर की सभी अंदरूनी फाइलें खंगाल ली है । तीन साल अंदर रहकर कश्मीर को बीजेपी ने जिस तरह देखा और परखा होगा वह कभी बाहर रहकर उसे उतना नही समझ पाती। मुझे लगता है चाबी अब बीजेपी के हाथ मे है। आने वाले दिनों में देखियेगा किस तरह लोगों की निगाहें कश्मीर पर केंद्रित रहेंगी , उम्मीद से ज्यादा अब कश्मीर में होनेवाला है, जो सीधे 2019 के चुनाव प्रभावित करेगी।

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