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कर्नाटक: हारने की सूरत में ये हो सकते है बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस के बहाने

Posted on: 15 May 2018 03:29 by Surbhi Bhawsar
कर्नाटक: हारने की सूरत में ये हो सकते है बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस के बहाने

कर्नाटक: कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए वोटो की गिनती शुरू हो गई है। इस चुनाव को जीतने के लिए अपने दम पर सरकार बनाने वाली तीनो पार्टियों बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस ने पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन इस चुनाव में अपेक्षानुसार परिणाम नहीं आने पर इन पार्टियों के पास बहाने तैयार होंगे। आईए आपको बताते है हारने की सूरत में पार्टिया क्या-क्या बहाने बना सकती है।

बीजेपी का दक्षिण द्वार-
बीजेपी के कर्नाटक चुनाव बड़ा चुनाव माना जा रहा है, क्योकि कर्नाटक बीजेपी के लिए दक्षिण का द्वार खोलेगा। इस चुनाव को जिंतने के लिए बीजेपी ने कोई कसर नहीं छोड़ी ।है प्रधानमन्त्री मोदी ने कई रैलियां और जनसभाए की है। वही अमित शाह पिछले कुछ समय से यहां डेरा डाले हुए है। इन सबके बावजूद भी यदि बीजेपी हारती है तो पार्टी ये तर्क दे सकती है-

पहला बहाना-
यदि बीजेपी चुनाव हारी तो सबसे बड़ा सवाल मोदी लहर पर उठ जाएगा। ऐसे में बीजेपी के पास तर्क हो सकता है कि विधानसभा चुनावों का परिणाम केंद्र सरकार की नीतियों पर मैनडेट नहीं होता है। बीजेपी कह सकती है कि केंद्र और राज्यों के चुनावों के मुद्दे अलग-अलग होते हैं।

दूसरा बहाना-
बीजेपी के पास दूसरा तर्क हो सकता है कि कांग्रेस ने चुनावों से ठीक पहले सांप्रदायिक कार्ड खेला था। बीजेपी कह सकती है कि चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने अनैतिक तरीका अपनाया।

तीसरा बहाना-
सरकार नहीं बना पाने की स्थिति में अगर मोदी-शाह की जोड़ी पर सवाल उठे तो पार्टी के सीएम कैंडिडेट बीएस येदियुरप्पा के सिर पर हार का ठीकरा फोड़ा जा सकता है। हारने की सूरत में बीजेपी कह सकती है कि चुनाव से पहले ही सीएम पद के उम्मीदवार की घोषणा करना गलत कदम था, क्योंकि कई राज्यों में बीजेपी ने चुनाव परिणाम सामने आने के बाद सीएम बनाए हैं।

कांग्रेस का ‘आखिरी किला’-
कांग्रेस के लिए भी ये चुनाव अपना आखिरी किला बचाने से कम अहम नहीं हैं। इन चुनावों में न केवल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जमकर प्रचार किया, बल्कि दो साल बाद यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी भी किसी चुनावी जनसभा को संबोधित करती दिखाई दीं। इसके अलावा पूर्व पीएम मनमोहन सिंह समेत कई राज्यों के कांग्रेसी नेताओं ने इन चुनावों में जमकर प्रचार किया। ऐसे में अगर कांग्रेस कर्नाटक चुनावों में बीजेपी से पीछे रह जाती है तो जानते हैं कि उसके पास क्या तर्क हो सकते हैं।

पहला बहाना-
हारने पर कांग्रेस कह सकती है कि राज्य में एंटी इन्कमबेंसी फैक्टर का असर देखने को मिला है। राहुल गांधी अभी कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं और हार की सूरत में जिम्मेदार उन्हें नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसी सूरत में कांग्रेस का तर्क होगा कि राज्य की जनता ने सिद्धारमैया के काम के खिलाफ मैनडेट दिया है। राज्य में टिकट बंटवारे में सिद्धारमैया की पसंद का ध्यान रखा गया है, ऐसे में हारने पर जिम्मेदारी भी उन्हीं को लेनी पड़ सकती है।

दूसरा बहाना-
कांग्रेस का दूसरा तर्क हो सकता है कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो खूब मेहनत की, लेकिन कार्यकर्ता उनकी मेहनत को मुकाम तक नहीं पहुंचा सके। बता दे कि कई अहम सीटों पर यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई के युवा चेहरों को खड़ा किया गया है।

तीसरा बहाना-
हार की सूरत में कांग्रेस का एक तर्क बीजेपी पर उम्मीदवारों को तोड़ने का आरोप हो सकता है। कांग्रेस के पास बीजेपी के सीएम उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ खड़ा करने को कोई कद्दावर नेता ही नहीं मिला, क्योंकि सभी संभावित उम्मीदवार बीजेपी में शामिल हो गए थे और कांग्रेस को मजबूरन अपने ब्लॉक स्तर के नेता गोनी मालतेश को सिद्धारमैया के खिलाफ मैदान में उतारना पड़ा।

जेडीएस-
जेडीएस को राज्य में किंगमेकर बताया जा रहा है, ऐसे में सभी नज़ारे जेडीएस पर टिकी हुई है। हालाकि चुनाव प्रचार के दौरान कान्ग्रे स और बीजेपी दोनों ने ही जेडीएस को लुभाने की पूरी कोशिश की है। अब देखना ये है कि जेडीएस किसका समर्थन करती है। अब जानते है कि यदि जेडीएस ने बीजेपी का समर्थन किया तो क्या बहाना हो सकता है और यदि कांग्रेस को समर्थन किया तो क्या बहाना हो सकता है।

जेडीएस और बीजेपी-
राज्य में बीजेपी के सबसे बड़ी पार्टी बनने और जेडीएस के उसे समर्थन करने पर जेडीएस नेता कह सकते हैं कि राज्य की जनता ने सीएम सिद्धारमैया के खिलाफ मैनडेट दिया है। ऐसे में उनका बीजेपी के साथ जाना जनता के वोट का सम्मान करना है। इसके अलावा जेडीएस कह सकती है कि कि केंद्र में बीजेपी की सरकार है और राज्य के बेरोकटोक विकास के लिए यह सही रहेगा कि राज्य में भी बीजेपी को ही सरकार बनाने का मौका मिले।

जेडीएस और कांग्रेस-
अगर जेडीएस कांग्रेस के साथ जाने का फैसला करती है तो उसका तर्क हो सकता है कि वह एक सेक्युलर पार्टी है और बीजेपी के साथ हाथ मिलाना सही नहीं होगा।

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