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कर्नाटक चुनाव: प्रचार के बाद तट पर छूटी गंदगी जैसे कुछ सवाल, अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 11 May 2018 06:25 by Ravindra Singh Rana
कर्नाटक चुनाव: प्रचार के बाद तट पर छूटी गंदगी जैसे कुछ सवाल, अजय बोकिल की टिप्पणी

कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार बाढ़ के बाद तटों पर छूटी गंदगी की तरह यह सवाल फिर छोड़ गया है कि चुनाव प्रचार का स्तर अब और कितना गिरेगा? कभी उठेगा भी या नहीं ? इस चुनाव संग्राम के मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा और कांग्रेस तथा देश का नेतृत्व करने वाले वर्तमान एवं भावी दावेदार नरेन्द्र मोदी तथा राहुल गांधी के बीच आरोप-प्रत्यारोपों ने जिस निचली सतह को छुआ, उससे यह प्रश्न और गहरा गया है कि क्या भारत में चुनाव अब संकीर्ण सोच और सांस्कृतिक घटियापन की कुरूचिपूर्ण होड़ में तब्दील हो गए हैं? क्योंकि हर चुनाव जुमलों और फिकरों का नया लाॅट लेकर आता है। इससे जनता का मनोरंजन या मार्गदर्शन कम, वितृष्णा ज्यादा होती है। नेता परस्पर छींटाकशी कम, एक दूसरे के कपड़े उतारने पर ज्यादा आमादा दिखते हैं।

यूं पहले भी चुनाव में राजनीतिक दलों में खट्टे-मीठे आरोप-प्रत्यारोप होते थे। तीखे कटाक्ष भी होते थे। व्यकिगत टीकाएं भी होती थीं। लेकिन एक दूसरे को चोर, हैवान और नालायक ठहराने का चलन इक्कीसवीं सदी की नई चुनावी संस्कृति और भाषा है। हमे इसी के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। मोटे तौर पर इसकी शुरूआत 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव से मानी जा सकती है, जब कांग्रेस ने राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‍िलए ‘मौत का सौदागर’ जैसा निहायत खूनी शब्द प्रयोग किया। उसके बाद तो चुनावी भाषा की जो फिसलन शुरू हुई है, उसका अंत कहां जाकर होगा, यह कोई नहीं जानता।

कर्नाटक चुनाव में भी कई नए जुमले और एक दूसरे को नीचा दिखाने वाली शब्दावली सामने आई। जुमले गढ़ने, उन्हें बेधड़क एके-47 की तरह चुनावी सभाअों में इस्तेमाल करने के मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कोई सानी नहीं है। इस बार उन्होने कर्नाटक के मुख्यामंत्री‍ सिद्धारमैया को ‘सीधा रूपैया’ करार दिया ( कन्नड़ में इसका क्या मतलब निकलता है, पता नहीं)। हिंदी में आशय यह था कि राज्य की सिद्धारमैया सरकार इतनी भ्रष्ट है कि पूरा रूपैया सीएम की जेब में जा रहा है।

बंगारकोट की एक सभा में उन्होने अजीब तुक-तान भिड़ाकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तुलना उस बाल्टी से कर डाली, जिसे दबंग लोग टैंकर से पानी भरने के लिए कतार में दबंगई से पहले लगा देते हैं। उन्होने राहुल को ऐसा ‘नामदार’ बताया, जो पीएम की आस अभी से पाले हुए है। जबकि भाजपा के लोगों को उन्होने ‘कामदार’ बताया। गजब तो तब हुआ जब मोदी ने कर्नाटक के मुधोल कुत्तो से कांग्रेस को देशभक्ति सीखने की सलाह दी। मुधोल कर्नाटक का एक इलाका है, जहां के कुत्ते ‘खूंखार देशभक्त’ होते हैं। इन्हें अब भारतीय सेना में भी शामिल किया गया है। कहते हैं कि इसके पहले दत्त भगवान ने जिन प्राणियों को अपना गुरू माना था, उनमें कुत्ते भी शामिल थे।

प्रधानमंत्री के इस ‘कुत्ता गुरू’ बयान पर कांग्रेस नेता संजय निरूपम ने कहा कि आज रूपया और प्रधानंमत्री में इस बात की होड़ लगी है कि कौन ज्यादा गिरता है। उधर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी मोदी और भाजपा पर कई हमले किए। हालांकि उनका स्वर और भाषा तुलनात्मक रूप से संयत थी। उन्होने मोदी पर भ्रष्टाचार को प्रश्रय देने का आरोप लगाते हुए जुमला कसा कि ‘बहुत हुआ भ्रष्टाचार, नीरव मोदी है अपना यार।‘ यही नहीं कांग्रेस ने 1 अप्रैल को जो पोस्टर जारी किया, उसमें प्रधानमंत्री पर ‘हैप्पी जुमला दिवस’ कह कर कटाक्ष किया गया।

राहुल ने भाजपा की अोर से चुनाव प्रचार करने आए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ पर यह कहकर प्रहार किया कि ‘यूपी की जनता त्रस्त, योगी कर्नाटक में व्यस्त।‘ कांग्रेस की अोर पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने भी अपनी अगम्य आवाज में जो कुछ कहा उसका लुब्बो लुआब यह था कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस तरह चुन-चुन कर विरोधियों को अपना निशाना बना रहे हैं, वैसा तो पहले कभी नहीं हुआ। सिंह ने कहा कि किसी भी प्रधानमंत्री ने ( मोदी की तरह) पद की गरिमा इतनी नहीं गिराई। उधर चुनावी दिवाली में सुतली बम के साथ-साथ जिन्ना फोटो विवाद और कश्मीर मे पर्यटक की पत्थरबाजों द्वारा हत्या जैसे ‘चीनी आयटम’ भी माहौल गर्माने के लिए फोड़े गए।

इस चुनाव में कुछ बातें साफ हो गईं। मसलन अब आने वाला हर चुनाव पहले के मुकाबले ज्यादा कर्कश और ज्यादा नंगई लिए होगा। इस बात का कोई मतलब नहीं है कि प्रधानमंत्री वार्ड पार्षद तक के चुनाव में अपनी गरिमा को दांव पर क्यों लगाते हैं? वो जादूगर हैं और हर चुनाव में जादू दिखाते रहेंगे। यह आरोप बेमानी है कि मोदी के पास जुमला गढ़ने की फैक्ट्री है। यह खीज भी बेकार है कि अमित शाह हर चुनाव को ‘करो या मरो’ की तरह क्यों लड़ते हैं या फिर अब देश में होने वाला लगभग हर चुनाव ‘हिंदू-मुस्लिम’ में क्यों सिमटने लगता है?

चीजें जिस तरह ‘मैनेज’ और ‍’डिक्टेट’ हो रही हैं, उसका मतलब साफ है कि अब चुनाव लड़ने, जीतने और मैनेज करने का व्याकरण पूरी तरह बदल गया है। यह सवाल ही फालतू है कि जो पहले नहीं होता था, अब क्यों हो रहा है? इसका सीधा जवाब है कि सत्ता पाने के लिए चुनाव जीतना जरूरी है और चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडा आजमाना जायज है। जनता जिस तरीके से झांसे में आए, उस ढंग से वह दिया जाना चाहिए। दरअसल यह कारपोरेट कल्ट का राजनीतिक एप्लीकेशन है, जिसे मोदी- शाह कंपनी ने बेरहमी से लागू किया है और कांग्रेस का हाथी लाख कोशिश के बाद भी इस कल्चर में नहीं ढल पा रहा है। इस नए चुनावी कल्चर के नैतिक पक्ष पर दस सवाल हों, लेकिन वह रिजल्ट तो दे रहा है या दिलवाया जा रहा है।

यह बात अलग है कि इतना सब कुछ करने के बाद भी कर्नाटक में कोई भी पार्टी सीना ठोंक के कहने की स्थिति में नहीं है कि वही जीतेगी। क्योंकि रिमोट अब भी वोटर के हाथ में है। यह उसके हाथ में कितने दिन और रहेगा, यह सबसे बड़ा और संजीदा सवाल है। लेकिन पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक का चुनाव ‍जिस ‘करो या मरो’ के जुनून से लड़ा जा रहा है, उससे सवाल उठता है कि क्या हमे लोकतंत्र केवल ‘किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने’ के लिए ही चाहिए?

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