कैंची धाम: अलौकिक शक्तियों के स्वामी माने जाते थे बाबा

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baba neem karouri of kainchi dham

कहा जाता है कि मात्र 11 वर्ष की उम्र में बाबा का विवाह एक ब्राह्मण कन्या का साथ हुआ था। लेकिन विवाह के कुछ समय पश्चात उन्होंने घर छोड़ दिया और साधु बन गए। फिर 17 वर्ष की अवस्था में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई नैनीताल से 38 किलोमीटर दूर भवाली के रास्ते में यह जगह यानी कैची धाम पड़ता है। बाबा नीम करोली ने इस स्थान पर 1964 में आश्रम बनाया था। यहां बाबा 1961 में पहली बार आए थे अपने एक मित्र पूर्णानंद के साथ मिलकर उन्होंने यहां आश्रम बनाने का फैसला लिया 1973 में बाबा ने अपनी देह त्याग दी मगर उनकी अस्थियां आज भी सुरक्षित है।

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आज यह आश्रम आस्था के केंद्र बन गई है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। श्रद्धा के वशीभूत लोक बाबा नींव करौरी को हनुमान बाबा का धरती पर दूसरा रूप मानते हैं। उनका असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में 19 सौ में हुआ था। भव्य मंदिर का रूप ले चुके कैंची धाम में मां दुर्गा, वैष्णो देवी, हनुमान जी और राधा कृष्ण की मूर्तियां है। बाबा का कमरा और मूर्तियां उसी तरह सुरक्षित है। जैसे बाबा के समय थी। उनकी निजी वस्तुएं जैसे गद्दी कंबल छड़ी आज भी वैसे ही उस कमरे में मौजूद है जिसमें बाबा सोया, बैठा करते थे।

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बाबा अलौकिक शक्तियों के स्वामी माने जाते थे। आडंबर उसे दूर बाबा के माथे पर ना त्रिपुंड लगा होता था ना गले में जनेऊ, न कंठमाला। देह पर साधुओं वाले वस्त्र भी कभी धारण नहीं किए। आश्रम आने वाले भक्त जब उनके पैर छूने लगते थे, तो कहते थे पैर मंदिर में बैठे हनुमान बाबा के छुओ। सहज और सरल स्वभाव के धनी बाबा ने कभी किसी को आकर्षित करने की कोशिश नहीं की। उनके विदेशी भक्तों ने जाने-माने लेखक रिचर्ड अलर्ट ने ‘मिरेकल ऑफ लव’ नाम की पुस्तक लिखी है। जिसमें बाबा के चमत्कारों का विस्तार से वर्णन है। हॉलीवुड एक्टर जूलिया रॉबर्ट्स को अचानक एक बार बाबा की तस्वीर के दर्शन हो गए देखते ही पता नहीं उन्हें क्या हुआ वह बाबा की मुरीद हो गई और उनके बारे में जानने की जिज्ञासा लेकर भारत आ गई फिर उन्होंने हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया।

बाबा नीम करोली महाराज ने एक धाम नैनीताल जिले के कैंसी में बनाया तो दूसरा हिमाचल में। शिमला की सुरम्य वादियों में तारा देवी पहाड़ी पर कुटिया बनाकर बाबा 10- 12 दिन ही रुके थे जब योग ध्यान करते हुए उनके मन में कुटिया की जगह हनुमान बनाने की इच्छा जागृत हुई और यह बात उन्होंने अन्य अनुयायियों को बताइ। 1962 में हिमाचल के तत्कालीन लेफ्ट गवर्नर राजा बजरंग बहादुर सिंह (भदरी रियासत के राजा) ने यहां मंदिर का निर्माण शुरू करा दिया। 21 जून 1966 के दिन मंगलवार को इसका शुभारंभ हुआ इसको इतना अदभुत बनाया गया है कि शिमला आने वाले पर्यटक यहां गए बिना नहीं रुकते।

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