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जन्मदिन पर कैलाश विजयवर्गीय काकी जी को याद कर रो दिए और व्यक्त किए इस तरह अपने विचार | Kailash Vijayvargiya expressed his thoughts on his Birthday

Posted on: 07 May 2019 13:27 by rubi panchal
जन्मदिन पर कैलाश विजयवर्गीय काकी जी को याद कर रो दिए और व्यक्त किए इस तरह अपने विचार | Kailash Vijayvargiya expressed his thoughts on his Birthday

आज से 63 वर्ष पूर्व परम ममतामयी पूज्य काकी जी ने मुझे इस संसार में पदार्पण कराया था, बहुत बचपन की तो याद नहीं, लेकिन जबसे होश संभाला है तो किसी विपत्ति के समय मुझे माँ की वात्सल्यमयी गोद सभी संकटों से बचाव के लिए एकमात्र आश्रय के रूप में सदैव उपलब्ध रही। अपने राजनैतिक कार्यों के दौरान कई-कई दिनों तक घर नहीं जा पाता था। तब घर जाने का आकर्षण की कुछ और था। पांच मिनिट के लिए ही सही,यदि मैं काकी जी के पास बैठ जाता, उनके चरण स्पर्श कर लेता तो मानों सारे संसार की विपत्तियाँ समाप्त हो जाती थीं। उनका हाथ सिर पर अनुभव होते है मनो गंगाजल का स्पर्श हो जाता था।

बचपन से गत वर्ष तक प्रत्येक बार अपने जन्मदिन पर मैं कैसे भी करके माँ के पास अवश्य पहुँच जाता था। वे प्रत्येक बार मेरे मस्तक पर टीका लगाती, सर पर हाथ फेरती, आशीर्वाद के कुछ शब्द बोलती और हाथ में श्रीफल के साथ कुछ रुपये रख देती थी। मुझे एसा लगता था कि उनके आशीर्वाद के शब्दों में माता सरस्वती जी, सिर पर रखे हाथ में माता महाकाली और हाथ में रखे रुपये में माता लक्ष्मी माता की कृपा मुझे प्राप्त हो गई हो। मस्तक पर उनके हाथों से लगाया गया टीका मुझमें मानो नवीन ऊर्जा का शक्तिपात कर देता था।

उनके द्वारा दिया गया श्रीफल साक्षात भगवन नारायण का स्वरूप लगता था। मैं उनके द्वारा दिए गए रुपये पूरे वर्ष भर संभालकर रखता ये मुझे उनकी ममता के अमोघ कवच के रूप में स्वरक्षित रखते थे वो कहती थी कि सावर्जनिक जीवन में हमेशा सत्कर्म करना, खूब काम करना, अपनी आलोचनाओं से विचलित नहीं होना। जब तक तुम दर्पण में अपनी आँख में आँख डालकर देख सकते हो, तब तक तुम निष्पाप हो उनके इन कथनों के कारण ही मैं सत्य और नैतिकता के पथ पर सदैव चलते रहने के लिए प्रतिज्ञावध्य रहा हूँ।

आज 63वें जन्मदिन पर कैसा संयोग हैं कि 63 का आंकड़ा एक दूसरे से मिलने का प्रतीक हैं, पर मेरी और मेरे असंख्य कार्यकर्ता बंधुओं की पूज्य काकी जी से मैं नहीं मिल पाऊंगा। आज उनकी अनुपस्थिति में मेरे जन्मदिवस पर मेरी आत्मा कांप रही हैं। नेत्रों से अविरल अश्रुधार प्रवाहित है। उनके हाथ का स्पर्श अपने सिर पर लेने के लिए पूरा शरीर व्याकुल है उनके चरणों का स्पर्श हाथ मानों तडफ रहे है। मेरे बाल मन में अभी भी काकी जी की गोद में मस्तक रखने की अतृप्त प्यास पूरी तीव्रता से जोर मार रही है।

मैं जानता हूँ कि जीवन भर अयोध्या नाम को धारण करने वाली काकी जी पूरी नैतिकता से जीवन यापन करते हुए स्वयं भगवान श्री अयोध्यानाथ की शरण में चली गई है उनके महाप्रस्थान से मेरे जीवन में जो विराट शून्य उत्पन्न हुआ हैं, वह कभी भी भर नहीं पायेगा। पर यह समय अवसाद में जाने का नहीं हैं, काकी जी तो जीवित अवस्था में ही विदेह हो गई थी। उनका प्रत्येक श्वास मुझ सहित अनेक कार्यकर्ताओ की मंगल कामनाओं की प्रार्थना करते निकलता था।

उन्होंने मुझसे कहा था कि देश के लिए खूब काम करना, राष्ट्र के कल्याण के लिए समर्पित रहना, अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए दिन रात कार्य करना। अब समय है उनके इन्ही उपदेशों और आदेशों का पालन करने का, अब समय है कि उनकी आध्यात्मिक और दिव्य उपस्थिति को अनुभव करते हुए राष्ट्र के लिए काम करने का, उनके अनंत आशीर्वचन मेरा मार्ग सदैव प्रशस्त कर रहें हैं आज भारत माता को परम वैभव के सर्वोच्च शिखर पर ले जाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने मुझे बंगाल में कार्य करने का दायित्व सौपा हैं। मैं अपने सम्पूर्ण प्राण प्रण से बंगाल में पार्टी की ऐतिहासिक विजय और अंतत: राष्ट्र की समृद्धि के लिए कार्य कर परम पूज्य काकी जी के श्री चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करूँगा.. मैं उनके आदर्शों और मार्गदर्शन के अनुरूप आजीवन कार्य करने के लिए वचनबद्ध हूँ।

मैं अपने समस्त कार्यकर्ता बंधुओं, भगिनियों तथा शुभचिंतकों को इस अवसर पर उनकी शुभकामनाऔं के लिए धन्यवाद देता हूँ तथा विश्वास करता हूँ आपका स्नेह मझे सदैव की भान्ति आगे भी उपलब्ध रहेगा।

– कैलाश विजयवर्गीय

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