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कबीर सिंह

Posted on: 22 Jun 2019 15:32 by Surbhi Bhawsar
कबीर सिंह

आनंद कुमार शर्मा

हमारे समाज में अन्य प्रोफ़ेशन की तुलना में डाक्टर के पेशे का अलग स्थान और महत्व है , और चिकित्सक दरअसल मूलतः कलाकार होता है क्योंकि मानव मन के तारों को पकड़ कर उसकी पीड़ा को हरने का काम तो कोई कलाकार ही कर सकता है , इसलिए भी की कलाकार भावुक होता है उसकी अतिभावुकता कभी कभी स्वयं उसके और समाज पर उसके प्रभावों का नकारात्मक परिणाम भी देती है | इसी तरह की एक परिस्थिति को दर्शाती दक्षिण की हिट फ़िल्मों के रिमेक के सिलसिले की एक और फ़िल्म कबीर सिंह इन दिनों परदे पर है |

फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी है की कबीर ( शाहिद ) अमीर घराने का एक बिगड़ा लेकिन प्रतिभाशाली मेडिकल स्टूडेंट है जो अपने कालेज का टापर होने के साथ खिलाड़ी भी है , लेकिन उसकी कमी है उसकी बदमिज़ाजी और ग़ुस्सैल स्वभाव , जिसके रहते अक्सर मारपीट करने की घटनाओं से उसे कालेज से सस्पेंड किया जाता रहता है , लेकिन उसकी प्रतिभा के चलते उसके प्रोफ़ेसर उसे चाहते भी हैं | कालेज में आइ जूनियर स्टूडेंट प्रीति ( कियारा आडवाणी ) से उसे प्यार हो जाता है और उसकी दादागिरी के चलते प्रीति को कालेज में विशेष स्थान मिल जाता है जहाँ उसे कोई परेशान नही कर सकता |

दोनों एक दूसरे से बेतरह प्यार करने लगते हैं , लेकिन पढ़ाई पूरा करने के बाद , जब बात शादी की आती है तो प्रीति के घरवाले इसके लिए तैयार नहीं होते हैं , और प्रीति की शादी कहीं और तय कर देते हैं | पहले से बिगड़ैल कबीर इस घटना से अपने अवसाद के एक अलग वृत बना उसमें गुम हो जाता है | अब वो शराबी है , ड्रग एडिक्ट है झगड़ालू है लेकिन साथ ही ग़ज़ब का सर्जन भी है | नशे की गिरफ़्त में फँसा कबीर क्या फिर अपनी प्रेमिका को पा सकता है इसके लिए फ़िल्म देखना होगा |

फ़िल्म में दोनों ही पहलू हैं , ये एकदम आज के ज़माने के युवाओं की फ़िल्म है , जिसमें नायक का व्यवहार हमें अतिरंजित लगता है , उसने ना अपने परिवार के प्रति समर्पण है ना समाज के प्रति ज़िम्मेदारी , अगर कुछ है तो अपने प्यार को पाने का जुनूँ , और इसके जस्टिफिकेशन के चक्कर में फ़िल्म को कुछ ज़्यादा ही खींच दिया गया है | कबीर के दोस्त के रूप में सोहम मजूमदार का किरदार ग़ज़ब का है , और कमिनी कौशल को कबीर की दादी और सुरेश ओबेरोय को कबीर के पिता के रूप में देखना सुकून देता है | मेडिकल कालेज के आंतरिक परिवेश को फ़िल्माने में , रेगिंग , पढ़ाई , और छात्रों के व्यवहार का आँकलन करने में अत्यंत कल्पना शीलता का परिचय दिया गया है , मतलब ऐसा तो कहीं ना देखा की लड़कों के हास्टल में लड़की आ कर रहने लगे और लोग चूँ भी ना करें | फ़िल्म अत्यधिक कल्पनाशीलता और फंतासी से युक्त है अलबत्ता फ़िल्म के आख़िरी पाँच मिनट बेहद ख़ूबसूरत हैं

जहाँ तक अभिनय की बात करें तो शाहिद हमेशा की तरह रोल में घुसे बेहतरीन फ़नकार साबित हुए हैं , अलबत्ता कियारा का प्रभावी अभिनय नही रहा , गीत संगीत मुझे तो नही रुचे , रोमांस की फ़िल्म हो और बाहर निकालने पर आपके गीत के दो बोल भी याद ना रहें तो काहे का संगीत | कुलमिलाकर इश्क़ के नए मजनूँ का क्रियेशन है कबीर सिंह जो शायद आजकल के ज़माने के नज़रिए से रच दिया गया है |

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