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“बस यात्रा का दर्शन शास्त्र” विश्वास व्यास की कलम से

Posted on: 23 May 2018 05:56 by Ravindra Singh Rana
“बस यात्रा का दर्शन शास्त्र” विश्वास व्यास की कलम से

जिंदगी एक सफर है , सुहाना तो पता नहीं सफर जरूर है। कभी-कभी लगता है कि उर्दू के सफ़र से अंग्रेजी का सफर ज्यादा मौजू है इस लाइन में। खैर दर्शनशास्त्र की पढ़ाई तो मालूम नहीं कैसे होती है पर हम भारतीय फिल्मी गानों को दर्शनशास्त्र की पहली कक्षा समझ सकते हैं l जैसे जिंदगी का सफर है ,यह कैसा सफर कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं की तर्ज पर बगैर जाने समझे मैं इंदौर से उज्जैन के सफर पर निकल पड़ा ।अब कार तो है नहीं सो बेकार सा बेबस होकर बस में बैठने की ठानी ।जैसे ही बस स्टैंड पर पहुंचा 2 3 जोड़ी निगाहें शिकारी की तरह दूर से सताने लगी ।मन में खुशी भी हुई कि किसी नज़र को मेरा इंतजार आज भी है।

अध्यात्म में स्वयं को भुलाने की साधना लंबी है परंतु इस सफर की शुरुआत में  ही अपने को सिद्धि प्राप्त हो गई कि कई सालों में कमाए “भाईसाहब और सर ‘के गर्वित विशेषण कंडक्टर कम क्लीनर टाइप के व्यक्ति ने क्षण भर में ध्वस्त कर दिएl चीटियां काया पर कड़क आवाज के विचित्र संयोजन से उसने पुकारा सीधे साफ, मेरे दुनियावी अस्तित्व और पहचान को नकार कर,” क्यों चलना है क्या’?

ना भाई साहब, न सर ,ना दादा, ना अंकल ,सीधे-सीधे मुझे मनुष्य मात्र मानकर “क्यों चलना है क्या ?’ मेरी मुस्कुराहट का उस पर कोई असर नहीं हुआ मेरे कंधे को लगभग धकेलते हुए उसने मुझे बस रूपी भवसागर में चढ़ा दिया! मैं अपनी भाईसाहब की पहचान का संकट लिए जगह तलाश कर बैठ गया।  वैसे आध्यात्म और बस यात्रा पर कोई चाहे तो शोध कर PHD कर सकता है यह विषय अभी तक अछूता है।

इस धवल यात्री बस में आहा क्या पवित्र वातावरण है! भगवान की खूबसूरत तस्वीर, उस पर जलती 5 खुशबूदार अगरबत्तियां, (घर पर कभी ऐसी खुशबू नहीं आई है अगरबत्ती की )पूरी श्रद्धा से चढ़ाए हुए ताजे हार और अत्यंत मधुर धुन, जो किसी कमजर्फ ने फिल्मी गाने में इस्तेमाल कर ली थी, पर अब किसी जानकार ने गलती सुधार कर उसमें भजन के बोल फिट कर दिए। कुल मिलाकर वातावरण मंगलमय था। मैं अभिभूत सा कुछ सोच ही रहा था की मस्तक पर टीका, चोटी और दर्जनभर नाडे हाथ में बांधे इस नैया के खेवनहार ने एंट्री ली।

एक उड़ती निगाह से बैक मीरर में देखते हुए उसने शंखनाद की स्टाइल में गाड़ी का हॉर्न बजाया और मुझे मोह निद्रा से जगाया| एक दम जादुई तरीके से उसने पतानहीं कहाँ छुपा रखा पाउच निकाल कर आठवे सुर में बजाया और खा लिया। और बस मनुष्य जीवन की तरह धीरे धीरे खसकने लगी,तभी समय की कीमत न जानने वाले कुछ लेट लतीफ़ लोगो को बैठाकर हम चल दिये।

बस, शहर के ट्राफिक को चीरते हुए क्लीनर की रनिंग कमेंट्री के साथ बढ़ती जा रही थी |जिसमें रास्ते भर लोगों को कमजोर ड्राइविंग और कमजोर आंख कान होने के सर्टिफिकेट बट़ते जा रहे थे| बीच-बीच में बड़े ही खुले मन से, निष्प्रह भाव के साथ गालियां भी दी जा रही थी ,पर इस मायने में कंडक्टर मुझे बड़ा समभाव और पक्षपात हीन दृष्टि वाला व्यक्ति लगाl उसने दरवाजे पर लटके लटके ,साइकिल वाले से लेकर कारवाले तक को समान रूप से नबाजने में कोई कोताही नहीं बरतीl इससे सबक मिला कि समदृष्टि के साथ दुनिया को देखने से सफर आसान हो सकता है l

छोटी-मोटी बाधाएं जीवन में ऑटो रिक्शा लोडिंग रिक्शा या साइकिल सवार की तरह आ सकती हैं परंतु सच्चा आदमी अपनी गति कम नहीं करता बल्कि बढ़ा देता है ,जिससे यह बाधाएं स्वयं ही साइड में दुबक जाती है। वैसे जीवन दर्शन के सबक के बावजूद हम यात्री भी बस में दुबक कर बैठे थे क्योंकि डिजिटल इंडिया में विकास के तमाम दावों के बावजूद बस का स्तर अभी हवाई जहाज तक नहीं पहुंचा है । इसलिए यहां सुरक्षा मानकों की जानकारी देने के लिए ,ना तो कोई खूबसूरत एयर होस्टेस होती है ,नहीं सुरक्षा पेटी ।यात्री को अपने सामान के साथ अपनी सुरक्षा भी आप करनी होती है। जैसे ईश्वर ने आपको इस दुनिया में अकेले ,स्वयं के भरोसे भेज दिया है वैसे ही यहां बस में भी व्यक्ति स्वयं के भरोसे अपनी शक्तियों को पहचान सकता है ।

जैसे कि आपको अपने स्थान से नहीं हिलाया जा सकता यदि आप की पकड़ ढीली नहीं हो । इसके साथ ही रफ्तार यदि कम ना हो तो लक्ष्य करीब होता जाता है चाहे सिग्नल पर लालबत्ती हो ,आप अपने जीवन की गाड़ी को गणित में सीखे सारे ऐंगल बनाते हुए आगे ले जा सकते हैं ।आपको बाधाओं का कोई गुरुत्वाकर्षण नहीं रोक सकता। बस मन में सबसे आगे जाने का जज्बा, एक हौसला बढ़ाने वाला ऊर्जावान साथी और मुंह में केसर युक्त गुटखा हो जो आसपास की ध्यान भटकाने वाली चीजों से, आप को बचाकर एकाग्रचित कर सके। जैसे-जैसे बस आगे बढ़ रही थी, मैं ड्राईवर की प्रतिभा का कायल होता जा रहा था कि बस के किराए में सर्कस का रोमांच ,एस्सेल वर्ल्ड का मजा और बार बार ब्रेक टच करने से बगैर प्रयास के सांस रोकने का योगासन ,सभी संभव हो रहे थे ।वह क्या कहा किसी ने तुमको देखा तो खुदा याद आया ।

जीवन की आपाधापी में ,ईश्वर का नाम लेने का सुभिता नहीं रहा, अब ये मौका भी बस के छोटे से सफर में बार-बार हासिल हो रहा था। अचानक मेडिकल कॉलेज की कुछ लड़कियों ने बस में एंट्री ली और गेट पर खड़े कंडक्टर की निगाहें देखते ही मैं समझ गया था कि अब समर्पण और त्याग की भावना दिखाने का भार मुझ पर ही आने वाला है, क्योंकि मैं उम्र ,अनुभव, अकल ,और हैसियत की कड़ी में ,काया से भी छोटा ही हूं ।पूर्वाभास सही रहा मुझे इशारों में उठाकर बस की सबसे विशिष्ट सीट बोनट पर बैठा दिया गया।

अब सुविधा यह कि मैं सबके दृष्टि केंद्र में आ गया था और भविष्य की राह सांफ़ देख सकता था और थोड़ी सी असुविधा यह थी कि कुर्सी से पकड़ समाप्त हो गई।  बगैर कुर्सी के भार शून्यता की स्थिति में ,प्रभु नाम का सहारा और ड्राइवर की योग्यता पर भरोसा ही बाकी रहा । मन से सारे अच्छे बुरे विचार समाप्त हो गए बगैर “ध्यान’ लगाएं ‘ध्यान” लग गया ।सफर भी अब प्रौढ़ हो चला था अचानक एक ट्राले को   अपने पास आते देख पा रहा था, माया मोह के मारे जीवन में पैदा हुए दृष्टिभ्रम की तरह हम आगे की ओर ,और ट्राला पीछे की ओर आता नजर आ रहा था अब सांसों के साथ धड़कने भी बेकाबू हुई और जीवन की क्षणभंगुरता का एहसास पहली बार हुआ।

आंखें बंद कर, मैं अपने शरीर के रक्त प्रवाह को बस की रफ्तार से प्रतियोगिता करते महसूस कर पा रहा था। अचानक इस अनिश्चितता को एक बड़े से अर्धचंद्र से काटते हुए, हम पलक झपकते ट्राले के बगलगिर हो गए ।फिर ट्राला पीछे हम आगे ।कुछ शायर दोस्त बताते हैं कि शेर कहे नहीं जाते बस हो जाते हैं ,मैं आज समझ पाया कि राहत इंदौरी साहब का, हमारी तरह हथेली पर जान थोड़ी है ,शेर कैसे हो गया होगा।

ड्राइवर गुटका गटक कर विजय से मुस्कुराया और मैं अपनी जान बचने पर।
एक क्षण के अंतराल में लगा ईश्वर ने बड़ी-बड़ी क्रियाओं और अलग अलग टाइप के ध्यान और आध्यात्मिक ज्ञान से दूर रहने वाले मुझसे कुछ लोगों को जीवन की क्षणभंगुरता का दर्शन सिखाने के लिए यह शॉर्टकट दिया है की बस अब तौबा कर लो वरना अंत नज़दीक है “सफर,’ का।

विश्वास व्यास

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