रस भरी बूंदें बहुत, फिर भी प्यासा रह गया रविवार Juice drops a lot, yet it remains piqued Sunday

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Aaradhana ji

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की कलम से
वैसे तो दिल्ली के मौसम का कोई ठिकाना नहीं। दोपहर गरम हो और शाम सुहानी हो जाए। रात उमस हो और सुबह सोकर उठो तो तीखी सर्द हवाओं से मुठभेड़। मगर इस रविवार तो रिश्तों की गरमी थी, कविता की रस भरी बरसात थी और तीन पीढ़ियों की बयार से सुहानी और रूहानी अहसास भी।
मुक्तांगन की आराधना जी और कही- अनकही के सूत्रधार बड़े भाई शंकर झा ने इस जमावड़े की पहल की।

हम जैसे उधार बैठे थे। भाग कर जा पहुंचे। देश और दिल्ली के सांस्कृतिक ,साहित्यिक सितारों की महफिल सज गई। देहरादून में अपनी बीमारी छोड़ कर आए बुद्धिनाथजी, शंकर झा जी, कामना प्रसाद, रायपुर से मदन मोहन दानिश, इंदौर से सीधे पहुंची रश्मि सबा, हर दिल अजीज डॉक्टर हरीश भल्ला, डॉक्टर विनोद खेतान,आला आईपीएस संवेदनशील संजय झा और उनकी कवियत्री मातंगी झा, जयपुर से पुराने मित्र विनोद भारद्वाज ,आलोक झा,प्रियदर्शी जी, ख्याल साब और भी अनेक मित्र मुक्तांगन में घंटों तक काव्य रस की फुहारों में भीगते रहे। जब विसर्जित हुए तो भी प्यासे रह गए। बहती गंगा में मैंने भी अपने हाथ धो लिए। दो लंबी कविताओं से सभी को बोर -विभोर कर दिया।

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