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जिन्ना हार गए, सावरकर जीत गए

Posted on: 07 May 2018 13:26 by Surbhi Bhawsar
जिन्ना हार गए, सावरकर जीत गए

नई दिल्ली: स्वतंत्र भारत में भी मुहम्मद अली जिन्ना चर्चा, प्रेम और घृणा के विषय बने हुए हैं, तो इसका मतलब यह है कि जिन्ना का असर अभी तक गया नहीं है। यह हर कोई जानता है कि जिन्ना कट्टरतावादी मुसलमान नहीं थे। वे लगभग उतने ही आधुनिक थे, जितने नेहरू। फिर भी उन्होंने भारत का विभाजन करने की माँग की, तो इसका आधार धर्म था।

जिन्ना जोर दे कर कहते थे कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग कौमें हैं, और वे एक साथ नहीं रह सकते। लेकिन जब पाकिस्तान बन गया, तो उन्होंने संविधान सभा में उलटी बात कही कि पाकिस्तान में हिंदू-मुसलमान दोनों को समान अधिकार होगा। धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। हालाँकि पाकिस्तान ने इस राजधर्म का पालन नहीं किया और जिन्ना की पुरानी बात को ही सही ठहराया।

लेकिन जिन्ना के बाद वाले सेकुलर कथन से संकेत मिलता है कि मुसलमानों का अपना देश उनके लिए अकीदे की बात नहीं थी। यह एकछत्र सत्ता पाने की युक्ति मात्र थी। जिन्ना न तो पक्के मुसलमान थे और न ही मुसलमानों की उन्नति के लिए उन्होंने कुछ किया था। वे पहले वकील थे, फिर राजनेता बने। कांग्रेस में काम करते हुए उनके भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षा पैदा हुई, लेकिन उनका अहं हिमालयी था।

वे शायद किसी के तहत काम नहीं कर सकते थे। कांग्रेस में इसकी कोई संभावना नहीं थी कि वे शिखर नेता बन सकें। यद्यपि तब कांग्रेस हिंदू-मुसलमान के बीच भेद नहीं करती थी, जैसा कि वह आज कर रही है। आज उसकी कोशिश यह साबित करने की है कि वह ‘मुसलमानों की पार्टी’ नहीं है, और यह साबित करने के लिए वह हिंदुओं के वे तौर-तरीके अपना रही है जो भाजपा के हैं, जिस कारण उसे हास्यास्पद भी बनना पड़ा है।

लेकिन तब की कांग्रेस में मौलाना आजाद जैसे बड़े नेता भी थे, जिनकी लोकप्रियता से प्रतिद्वंद्विता करना जिन्ना के लिए कठिन था। इसलिए जल्द ही राजनीति से निराश हो कर वह लंदन चले गए और वहाँ वकालत करने लगे। अब वे भारत लौटना भी नहीं चाहते थे। पाकिस्तान आंदोलन मूलतः मुहम्मद इकबाल की देन है, जो बहुत बड़े कवि थे। उनका लिखा हुआ गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा’ आज भी हमारे कंठ में बसा हुआ है और कोई यह आपत्ति नहीं करता कि भारत के लोगों को यह गीत नहीं गाना चाहिए क्योंकि यह इकबाल का लिखा हुआ है।

लेकिन इकबाल का पाकिस्तान जिन्ना का पाकिस्तान नहीं था और न ही आज का पाकिस्तान। वह इस्लाम के उच्चतम उसूलों की नींव पर खड़ा एक आदर्श इस्लामी राज्य था। लेकिन राजनेताओं के हाथ में पड़ कर कोई भी बड़ा सपना मिट्टी में लिथड़ने लगता है। इकबाल के सपने को जिन्ना ने पूरा किया, पर गलत ढंग से। उन्होंने अपने पाकिस्तान से उम्मीद की कि वह एक सेकुलर राज्य बनेगा।

अब भी यह खयाल प्रगट किया जाता है कि विभाजन के समय यदि धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हो जाता, तो बेहतर रहता। यह कहना बहुत मुश्किल है कि ऐसा नहीं, वैसा होता, तो बेहतर होता। क्योंकि इतिहास जितना कल्पना से चलता है, उससे ज्यादा वास्तविकताओं के आधार पर। लेकिन सच यह है कि जिन्ना ऐसा ही बड़ा पाकिस्तान चाहते थे। लोहिया ने लिखा है कि पाकिस्तान की माँग देश के उन हिस्सों में मजबूत थी, जहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक थे। उनमें यह डर पैदा किया गया था कि भारत आजाद होगा, तो मुसलमान अल्पसंख्यक हो जाएँगे और बहुसंख्यक हिंदू उन पर जुल्म ढाहेंगे।

लेकिन पाकिस्तान बना उन हिस्सों को ले कर, जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक थे। इससे पाकिस्तान का मूल तर्क ही पराजित हो गया। जिन्ना को जो पाकिस्तान मिला, वह उन्हीं के शब्दों में ‘मॉथ-ईटेन’ (कीड़ा-खाया) था। सवाल यह उठता है कि उन्होंने इसे स्वीकार कैसे कर लिया? जिन्ना न तो ब्रिटिश राज की किसी शर्त से बँधे हुए थे न कांग्रेस को उपकृत करने की कोई मजबूरी थे। तब तक उन्हें पता नहीं था कि कुछ समय बाद ही उनकी (यक्ष्मा से) मृत्यु होने वाली है। वे इसरार कर सकते थे कि हमें तो पूरा पाकिस्तान चाहिए और जब तक वह नहीं मिलता, हम इंतजार कर सकते हैं।

कांग्रेस के नेहरू और पटेल जैसे नेता भी जल्दी में थे। अन्यथा दो चीजें होतीं। एक तो देश भर में जनमत गणना होती कि पाकिस्तान बनना चाहिए या नहीं। जब यह तय हो जाता कि देश के अधिकांश मुसलमान पाकिस्तान चाहते हैं, तो मुसलमानों से अपील की जा सकती थी कि जो पाकिस्तान जाना चाहते हैं, उनके लिए इसका उचित प्रबंध किया जाएगा। इस तरह देश का शांतिपूर्ण विभाजन हो सकता था और लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती थी।

लेकिन जो हुआ, वह एक बेईमान फैसला था। याद कीजिए कि पाकिस्तान बनने के बाद भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि से जो हजारों मुसलमान पाकिस्तान गए, वे मुहाजिर कहलाए और उनके साथ वहाँ दूसरे-तीसरे दर्जे का सलूक होता है। मुहाजिर न पाकिस्तान में सम्मान के साथ रह सकते हैं और न अपने वतन भारत लौट सकते हैं।

स्वतंत्र भारत ने जब अपना संविधान बनाया, तब उसने सावरकर और जिन्ना दोनों को खारिज कर दिया। भारत एक ऐसा राज्य बना जैसा जिन्ना अपने पाकिस्तान को देखना चाहते थे। एक सेकुलर देश, जिसमें सभी धर्मों के लोग अमन-चैन से रह सकें और विकास का फल सभी तक पहुँचे। पाकिस्तान ने बहुत जल्द जिन्ना को झुठला दिया और इस्लामी राज्य बन गया। भारत को ऐसा करने में सत्तर साल लग गए। इन सत्तर सालों में सेकुलर राजनीति को कीड़ा लगता गया और 2014 में आ कर वह भहरा कर गिर गई। अब हिंदुस्तान भी लगभग वैसा ही देश है, जैसा पाकिस्तान है। प्रशासन, न्यायालय, मीडिया, भीड़ सब एक ही राग अलाप रहे हैं। यदि 2019 के लोक सभा चुनाव में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होता, तो रही-सही कसर पूरी हो जाएगी। इस तरह जिन्ना हार गए और सावरकर जीत गए।

लेकिन अब भी मौका है। भारत की स्थिति पाकिस्तान से अलहदा इस तरह है कि यहाँ लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, मानव अधिकार और अहिंसक नागरिक जीवन के लिए एक बड़ा संघर्ष चल रहा है, जो पाकिस्तान में बहुत कमजोर है। हिंदूवाद के कीटाणु दूसरे दलों में संक्रमित नहीं हुए हैं। आज भी भारत चाहे, तो वह सावरकर से मुक्त हो सकता है। यदि भारत रास्ता दिखाता है, तो कल पाकिस्तान में भी सेकुलर जिन्ना को नया जीवन मिल सकता है।

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