झाबुआ : जनाधार की कसौटी पर कितने खरे उतरेंगे कांतिलाल भूरिया

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अरुण पटेल

21 अक्टूबर को होने वाले झाबुआ विधानसभा उप चुनाव में एक बार फिर वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया का जनाधार कसौटी पर है। लोकसभा के दो आमचुनाव खुद हारने और 2018 के विधानसभा चुनाव में अपने बेटे विक्रांत भूरिया को चुनाव न जिता के कारण उनके जनाधार को लेकर एक सवालिया निशान लगा है। इससे यह उपचुनाव उनके घटते या बढ़ते जनाधार की कसौटी होगी। इस क्षेत्र में सुदीर्घ अनुभव से तपे-तपाये राजनेता पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल का मुकाबला भाजपा के युवा चेहरे भानु भूरिया से हो रहा है। इस दिलचस्प लड़ाई में ऐसा नजर आ रहा है कि झाबुआ की राह कांतिलाल भूरिया के लिए फिर से आसान होती दिख रही है और युवा जोश के मुकाबले में अनुभव का पलड़ा कितना बजनदार है ये तो 24 अक्टूबर को पता चलेगा लेकिन अनुभव और वरिष्ठता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। जब-जब भूरियाओं का आपस में मुकाबला हुआ है तो 2014 के लोकसभा चुनाव को छोड़कर हमेशा कांतिलाल भूरिया अन्य भूरियाओं पर भारी पड़े हैं और उन्होंने जीत का परचम लहराया है। भाजपा अपने कब्जे वाली झाबुआ सीट को बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत लगा रही है लेकिन उसके ही विद्रोही कल्याण सिंह डामोर ने उसकी राह में काफी कांटे बिछा दिए हैं।

पूर्व विधायक जेवियर मेढ़ा और कांग्रेस उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया ने न केवल आपस में हाथ मिला लिए हैं बल्कि मुख्यमंत्री कमलनाथ के दोनों के दिल मिलाने के प्रयास मैदानी स्तर पर सफल होते नजर आ रहे हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांतिलाल भूरिया के बेटे विक्रान्त भूरिया की जीत में मेढ़ा रोड़ा बने थे तो अब वे उनके पिता कांतिलाल की जीत की इबारत लिखने में पूरी तरह सहायक की भूमिका में हैं। झाबुआ उपचुनाव के नतीजे एक ओर जहां यह साबित करेंगे कि प्रदेश में राजनीति के सूत्र पूरी तरह से कमलनाथ की मुट्ठी में आ गये हैं तो दूसरी ओर राजनीतिक अस्थिरता की जो बात अक्सर भाजपा नेता कहा करते हैं, उस पर भी विराम लगेगा, क्योंकि कांग्रेस के अपने विधायकों की संख्या 115 हो जायेगी जबकि भाजपा विधायकों की संख्या 109 से घटकर 108 रह जायेगी। राज्य की राजनीति छोड़कर कांतिलाल भूरिया को अचानक राष्ट्रीय राजनीति में उस समय प्रवेश करना पड़ा जब 1980 से लगातार लोकसभा का चुनाव जीत रहे कांग्रेस के दिलीप सिंह भूरिया भाजपा में चले गये, तब कांतिलाल भूरिया को 1998 के लोकसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह ने मैदान में उतारा और दोनों के सीधे मुकाबले में कांतिलाल दिलीप सिंह पर इस कदर भारी पड़े कि 2009 तक लगातार कांतिलाल भूरिया चुनाव जीतते रहे और दिलीप सिंह भूरिया उनसे लोकसभा चुनाव हारते रहे, लेकिन 2014 की मोदी लहर में दिलीप सिंह भूरिया ने कांतिलाल भूरिया को पहली बार एक लाख से अधिक मतों के अन्तर से पराजित किया। जब दिलीप सिंह भूरिया का निधन हो गया तब कांतिलाल भूरिया ने दिलीप सिंह भूरिया की बेटी निर्मला भूरिया को लोकसभा के उपचुनाव में भारी मतों से पराजित कर फिर से झाबुआ सीट पर कब्जा जमा लिया। लेकिन 2019 की मोदी लहर जो कांग्रेस पर कहर बनकर टूटी उसमें भूरिया यह सीट नहीं बचा पाये और उन्हें झाबुआ से निर्वाचित भाजपा विधायक गुमान सिंह डामोर ने पराजित कर दिया। डामोर की जीत ने अब एक बार फिर कांतिलाल भूरिया के सामने अपनी राजनीतिक यात्रा में एक नया मोड़ लाने का अवसर दे दिया और वे कांग्रेस उम्मीदवार के रुप में विधानसभा उपचुनाव लड़ रहे हैं। जैसा कि नजर आ रहा है और अन्दर ही अन्दर मोदी की लहर नहीं चल रही है तो यह उपचुनाव भी उनके के लिए मुकद्दर का सिकंदर साबित होगा।

जिस दिन से झाबुआ सीट खाली हुई उस दिन से ही कमलनाथ ने अपनी रणनीति बनाना प्रारंभ कर दिया और कुछ इस ढंग से बिसात बिछाई कि यह उपचुनाव पूरी तरह से उनकी मुट्ठी में आ गया है। सबसे पहली सफलता उन्हें भूरिया और मेढ़ा के बीच एकता स्थापित कराने में मिली और मेढ़ा स्वयं कांतिलाल भूरिया के प्रस्तावक भी बने। मेढ़ा की समझ में यह आ गया है कि यदि कांतिलाल की लाटरी उपचुनाव में खुल जाती है तो उनकी भी लाटरी खुलने में देर नहीं लगेगी क्योंकि कमलनाथ का रिकार्ड इस मामले में सबसे अधिक विश्‍वसनीय है कि वे जो कहते हैं और जो विश्‍वास दिलाते हैं उसके पूरा करने की कसौटी पर खरे उतरते हैं। पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा के गुमान सिंह डामोर ने लगभग 10 हजार मतों के अन्तर से कांग्रेस के विक्रान्त भूरिया को हराकर जीता था। कांग्रेस की इस परम्परागत विधानसभा सीट पर भाजपा लगभग 10 हजार मतों के अन्तर से जो जीती थी तो उसमें उसके स्वयं के पुरुषार्थ का कोई योगदान नहीं था, बल्कि पूर्व कांग्रेसी विधायक जेवियर मेढ़ा ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और 35 हजार वोटों की चोट कांग्रेस को दी थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में जो कि प्रचंड मोदी लहर में हुआ उसमें झाबुआ विधानसभा क्षेत्र पर मेढ़ा की कांग्रेस में वापसी के कारण डामोर अपनी बढ़त कायम नहीं रख पाये और कांतिलाल से वे 8 हजार वोटों से पिछड़े गए। पूरे चुनाव प्रचार अभियान पर मुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की न केवल पैनी नजर है बल्कि चुनाव जीतने की समग्र रणनीति भी उन्होंने बनाई है और एक-एक वोट के लिए कांग्रेस एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। बीते पांच माह में कमलनाथ चार बार झाबुआ आ चुके हैं और मतदाताओं को भरोसा दिला रहे हैं कि वे कांग्रेस के उम्मीदवार को जितायें, यहां का विकास करना उनकी जिम्मेदारी होगी। छिंदवाड़ा मॉडल पर झाबुआ का भी विकास किया जायेगा। आदिवासियों के हित में भी पिछले पांच माह में कमलनाथ ने घोषणाओं की मूसलाधार झड़ी लगा रखी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया भी चुनाव प्रचार अभियान के अंतिम चरण में कांतिलाल के पक्ष में प्रचार करने आने वाले है। यहां दर्जन भर मंत्रियों ने डेरा डाल रखा है और चप्पे-चप्पे पर कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने के लिए जुट गए हैं।

भारतीय जनता पार्टी भी पीछे नहीं है। कांग्रेस भले ही उपचुनाव जीतने का हौंसला लेकर चुनाव लड़ रही है तो वहीं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह को पक्का भरोसा है उपचुनाव तो भाजपा ही जीतेगी। उनका कहना है कि कमलनाथ सरकार ने जनता के साथ वादा खिलाफी की है जिससे कांग्रेस सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा है। विपक्षी दल आमतौर पर सत्तासीन पार्टी पर सरकारी मिशनरी का दुरुपयोग करने का आरोप लगाता रहा है और राकेश सिंह ने भी इसी तरह के आरोप लगाए है।

भाजपा ने भी अपने पदाधिकारियों, और पूर्व मंत्रियों को मैदान में उतार दिया है। प्रदेश अध्यक्ष सांसद राकेश सिंह ने भी यहां डेरा जमा लिया है और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी यहां आने वाले हैं। लेकिन भाजपा के सामने उसके बागी नेता कल्याण सिंह ही खतरा बनकर खड़े हो गए हैं, हालांकि पार्टी ने यहां संभाग स्तरीय कार्यकर्ताओं की पूरी फौज के साथ ही धार व निमाड़ सहित अन्य क्षेत्रों के सांसदों, विधायकों और बड़े नेताओं को भी चुनाव प्रचार अभियान में लगा दिया है। हालांकि मुख्यमंत्री की 10 अक्टूबर की चुनावी सभा में 100 से ज्यादा भाजपा कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल हो गये और अंदरखाने यह भी प्रचार किया जा रहा है कि कांतिलाल भूरिया चुनाव जीतते हैं तो उन्हें उपमुख्यमंत्री या केबिनेट मंत्री बनाया जायेगा, इस प्रकार का प्रचार सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे पोस्टों में किया जा रहा है। प्रदेश भाजपा के महामंत्री संगठन सुहास भगत भी यहां पूरी ताकत लगाये हुए हैं। झाबुआ विधानसभा क्षेत्र को भाजपा ने 25 सेक्टरों में विभाजित किया है और उसकी रणनीति अब बड़ी सभा करने की नहीं है, इन सेक्टरों में अपने कार्यकर्ताओं को मूल स्थान पर डटे रहने का निर्देश दिया गया है। पता चला है कि भाजपा की व्यूहरचना यह है कि प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सभी सेक्टरों में जाकर छोटी-छोटी सभाएं करेंगे। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस छिंदवाड़ा की तर्ज पर न केवल वायदा कर रही है बल्कि क्षेत्रीय कांग्रेस भी बना रखी है और मोटे तौर पर छह जोनों में विधानसभा क्षेत्र को विभाजित कर रखा है और हर क्षेत्र का जिम्मा एक मंत्री को दे रखा है। उनके सहयोगी के रुप में दो या तीन विधायकों व अन्य कार्यकर्ताओं को भी लगाया गया है। कांग्रेस द्वारा हर बूथ पर बैठक की जा रही है और पूरा फोकस इस समय झाबुआ पर आकर टिक गया है।

और यह भी

भाजपा पर तीखा हमला करते हुए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने झाबुआ की आमसभा में कहा कि कांग्रेस गरीबों की पार्टी है जबकि भाजपा का झंडा धन्ना सेठों के यहां लगता है। पंडित जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने आदिवासियों के बारे में सोचा और उनके लिए काम किया। उन्हें उनके अधिकार दिलाये। भाजपा ने कभी भी आदिवासियों का भला नहीं किया बल्कि वह झूठे दावे करती रही है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का नाम लेकर कमलनाथ ने एक बार फिर आदिवासियों के मन-मस्तिष्क में दोनों की छवि अंकित करने की कोशिश की है क्योंकि अधिकांश आदिवासी आज भी इंदिरा गांधी को अपना हितचिंतक मानते हैं। 

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