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वो वाकई हिंदी कमेंट्री कला के जसदेव’ थे! अजय बोकिल की कलम से

Posted on: 26 Sep 2018 09:25 by Ravindra Singh Rana
वो वाकई हिंदी कमेंट्री कला के जसदेव’ थे! अजय बोकिल की कलम से

कुछ इवेंट उसके साथ चलने और गूंजने वाली आवाज के साथ दिल-दिमाग में हमेशा के लिए फ्रीज हो जाते हैं। महान हिंदी कमेंटेटर जसदेव सिंह की आवाज और कमेंट्री कला उन्हीं में से एक थी। वो रेडियो युग का ऐसा नायाब नमूना थे, जिन्होने आधी सदी से ज्यादा अपनी खनकती-लरजती आवाज, अलंकारिक भाषा और दृश्य को जज्बात की चाशनी में लपेटकर वर्णित करने के अनोखे फन से लोगों को तृप्त किया। वो आवाज 87 साल तक ध्वनि तरंगों में तैरकर मंगलवार को हमेशा के लिए खामोश हो गई। विजुअल और सोशल मीडिया की आदी आज की पीढ़ी उस अनूठी आवाज तथा उस कमेंट्री ( हिंदी में कहें तो आंखो देखा हाल) के महत्व और रस को शायद ही कभी समझ पाएगी, जो महाभारत के संजय की तरह हर पल, हर धड़कन और हर जज्बे का वर्णन अपने अंदाज में करोड़ों लोगों तक पहुंचाती थी।

इस दृष्टि से जसदेव सचमुच अनोखी शख्सियत थे। जिस तरह के शुद्ध और असरकारी उच्चारण के साथ वो रसभीगी हिंदी और उर्दू वो बोलते थे, उससे लगता नहीं था कि यह आवाज किसी सरदार की हो सकती है। मेरे जैसे अब जीवन के छठे दशक में प्रवेश करने वालों को बचपन में काफी बाद पता चला कि जिस आवाज की वजह से रेडियो पर कान लगाए बैठा करते थे, वह एक प्रबुद्ध और प्रतिभाशाली सिख की है। जसदेव की यह हिंदी कमेंट्री यात्रा इसलिए भी अनोखी थी कि उन्होंने स्कूली‍ शिक्षा उर्दू माध्यम से प्राप्त की थी। लेकिन 1948 में महज 17 साल की उमर में जब उन्होंने महान भारतीय अंग्रेजी कमेंटेटर मेलविल डि मेलो की बापू की अंतिम यात्रा की मार्मिक कमेंट्री सुनी तो तय कर लिया कि कमेंटेटर बनना है और हिंदी कमेंटेटर बनना है। तब हिंदी में कमेंट्री करना भी साहस का काम था। संयोग से इसी साल हिंदी को राजभाषा मंजूर किया गया था। इस मायने में यह आजाद भारत की हिंदी की कमेंट्री यात्रा की भी शुरूआत थी।

आज भी जसदेव की आवाज सुनें तो लगता है कि उनकी आवाज मानो माइक्रोफोन के लिए ही बनी थी। वो अनार दाने सी शब्दों की साफ और शुद्ध अदायगी, स्वर के कंट्रोल्ड उतार-चढ़ाव, भाषा का झरने सा प्रवाह और अपनी लयदार जबान में श्रोताअो के दिलों की धड़कनों को बढ़ाना और फिर उन्हें सुकून से थाम लेना, जसदेव सिंह के बस की ही बात थी।

वो दौर रेडियो या कहें कि आॅडियो मीडिया का था। चीजें सीधे नजर नहीं आती थीं। उन्हें महसूसना पड़ता था और इस महसूसने के तनाव और उत्सुकता एक अलग मजा था। ‘आकाशवाणी’ इसका सिरमौर थी। वह एक प्रभावी जरिया था, जो हमारे कानों को आंखों में बदलने का काम करता था। नजर से कहीं दूर घट रही उस हलचल, वो जोश, वो दृश्यावली, वो गहमागहमी वो कार्य व्यापार, वो जोश, वो टेंशन सुनने वालों को किसी की आंखों से ही देखना पड़ता था। खासकर 26 जनवरी पर ‍दिल्ली में होने वाली गणतं‍त्र दिवस परेड तो बिना चूके सुनने की आदत पड़ गई थी। कारण जसदेव सिंह अपनी कमेंट्री के जरिए जवानों के कदमताल, तने हुए सीने, चेहरे पर दमकती देशभक्ति और अनुशासन का जलवा कुछ इस ढंग से बयान करते थे कि लगता था कि अपन भी लेफ्ट -राइट करते कंटिंजेंट का हिस्सा हों।

जसदेव सिंह ने रिपब्लिक डे परेड की कमेंट्री की शुरूआत 1963 से की थी और वे 49 साल तक अनवरत पूरे देश को इस देश के लिए गर्वीले आयोजन से रूबरू कराते रहे। हालांकि उन्हें इस बात का मलाल जरूर रहा कि रिपब्लिक डे परेड की कमेंट्री का अर्द्धकशतक पूरा नहीं करने नहीं दिया गया। इनके अलावा जसदेव की आवाज में 15 अगस्त की परेड, अोलंपिक और एशियाई खेलों की कमेंट्री भी यादगार रहती थी। लेकिन जिस कमेंट्री के लिए जसदेव सबसे ज्यादा याद ‍किए जाते हैं, वह थी हाॅकी की कमेंट्री। 1975 में क्वालालम्पुर में भारतीय हाॅकी टीम ने हाॅकी विश्व कप जीता तो उसके भावपूर्ण वर्णन ने हजारों मील दूर बैठकर रेडियो पर कमेंट्री सुन रहे करोड़ों भारतीयों की आंखों में खुशी के आंसू तैरने लगे थे। जसदेव गेंद की गति के साथ कमेंट्री कर सकते थे। उनका एक अमर वाक्य आज तक याद है। जब कभी भारतीय टीम हारती थी तो जसदेव का कमेंट होता- ‘बाकी सब चूके हुए अवसरों की कहानी है।

जसदेव कहते थे कि कमेंट्री एक कला है। यह कठिन साधना, समर्पण, विजन और भाषा पर अधिकार की मांग करती है। जसदेव की खूबी यही थी कि वे प्राय: ‍िबना‍ स्क्रिप्ट के कमेंट्री करते थे। लेकिन इसके पहले वो सम्बन्धित घटना या कार्यक्रम के हर पहलू का बारीकी से अध्ययन करते थे। वे कहते थे कि अच्छे कमेंटेटर के पास अच्छी भाषा और घटना को आत्मसात करने की क्षमता होनी चाहिए। क्योंकि कमेंट्री जो देखा उसे बयान कर देना भर नहीं है। कमेंटेटर घटित हो रही घटना में अपने शब्दों, अनुभूति और भावों से नई जान डालता है। वह घटना को अपने शब्दों से सजाता है। ऐसा सजाता है कि सुनने वाला भी उफ कर उठे। शायद इसीलिए उस जमाने में सीधे मैदान में खेल देखने वाले भी कानो से जसदेव की कमेंट्री सुनकर स्वयं को तृप्त महसूस करते थे।

आज विजुअल मीडिया जैसे कि टीवी आदि ने लाइव टेलिकास्ट कर कमेंट्री के रोमांच और उसमें रची मानवीय मनोभावों की भूमिका को खत्म सा कर दिया है। आज खेलों की कमेंट्री तो पूर्व खिलाड़ी ही करने लगे हैं। उनके लिए यह आफ्टर रिटायरमेंट एंगेजमेंट है। ज्यादातर ऐसे ‘कमेंटेटर’ स्क्रीन देखकर सपाट बयानी करते हैं। कई बार लगता है कि गिटार बजाने वाले के हाथ सितार पकड़ा दिया हो। इसमें उनका दोष कम है, क्योंकि जब होनी खुद ही अपनी आंखो से दिख रही हो तो कमेंट्री की चाशनी में डुबोकर स्वाद उसका स्वाद लेने की फुर्सत किस को है। वैसे भी अब कमेंट्री में पहले सी शालीनता, रंजकता और शब्दों के माध्य्म से दृश्य चित्र खींचने की ‍िजद खत्म हो गई है। कमेंटेटर और एंकर के बीच का फर्क समाप्त हो गया है। गोया महाभारत का संजय अपना माइक किसी और को थमा कर खुद पेवेलियन में जाकर बैठ गया हो। जसदेव सिंह को पद्मभूषण जैसे पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूं’ भी लिखी, जो काफी

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