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आइवरी की लालसा और हाथियों के शिकार से परेशान ‘जंगली’ | Ivari’s craving and ‘wild’ troubled by elephant hunting

Posted on: 31 Mar 2019 09:34 by Pawan Yadav
आइवरी की लालसा और हाथियों के शिकार से परेशान ‘जंगली’ | Ivari’s craving and ‘wild’ troubled by elephant hunting

•विनोद नागर (फिल्म समीक्षक)

भारत में वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए न केवल ढेर सारे कानून हैं, बल्कि वन विभाग के लंबे-चैड़े महकमे पर जंगलों की अवैध कटाई और जंगली जानवरों के शिकार को रोकने की जिम्मेदारी भी है। अब यह अलग बात है कि तमाम वैधानिक प्रावधानों के बावजूद हरियाली सिकुड़ती जा रही है और आएदिन शहरी क्षेत्रों से सटे इलाकों में वन्य प्राणियों की घुसपैठ की चटपटी खबरों के लोग आदी हो चुके हैं। काला हिरण शिकार मामले में सलमान खान वर्षों तक जिस मानसिक प्रताड़ना, अदालती कार्यवाही और सजा के भुक्तभोगी रहे हैं। वह खुद उनके लिए एक फिल्म की दिलचस्प पटकथा हो सकती है। जंगली जानवरों की तरह चिंघाड़ते याहू गीत से अपनी अलग छवि गढ़ने वाले शम्मी कपूर की ‘जंगली’ (1961) और जानवर (1965) का न जंगल से कोई लेना देना था न जानवरों से. ‘शिकार’ (1969) में भी निर्देशक का सारा ध्यान कत्ल की गुत्थी सुलझाने में था।

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आठवें दशक में अहिन्दीभाषी फिल्म निर्माता चिन्नप्पा देवर ने सच्चे अर्थों में स्वयं को जानवरों से प्रेम करने वाला फिल्मकार साबित किया। उनकी बनाई ‘हाथी मेरे साथी’ (1971) ‘जानवर और इंसान’ (1972) ‘गाय और गौरी’ (1973) ‘मां’ (1976) ‘मेरा रक्षक’ (1978) जैसी फिल्मों ने जानवरों के साथ मनुष्य के मित्रवत व्यवहार का प्रेरक संदेश दिया। मोहन सैगल की ‘कर्तव्य’ (1979) का नायक एक कर्तव्यनिष्ठ फारेस्ट ऑफिसर था, किंतु ‘एडवेंचर ऑफ टार्जन’ (1985) तो जंगल और जानवर के बजाय नायक नायिका के अन्तरंग दृश्यों को लेकर ज्यादा चर्चित हुई। गोविंदा की ‘महाराजा’ (1998) और ‘शिकारी’ (2000) को जंगली परिवेश के बावजूद दर्शकों ने नकार दिया था।

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नई सदी में ‘काल’ (2005) का खौफनाक जंगल दर्शकों में दहशत पैदा करने में सक्षम रहा तो राम गोपाल वर्मा की घने जंगलों में फिल्माई ‘जंगल’ (2000) ‘डरना मना है’ (2003) और ‘अज्ञात’ (2009) ने भी दर्शकों को खूब डराया। अश्विन कुमार निर्देशित ‘द फारेस्ट’ (2009) को विशुद्ध जंगल आधारित फिल्म माना जा सकता है। इधर, 2016 में डिज्नी की एनीमेशन फिल्म ‘द जंगल बुक’ ने भी बॉक्स ऑफिस पर अच्छी धूम मचाई। हाल में ‘टोटल धमाल’ के क्लाइमेक्स में वन्य प्राणियों को बचाने की फूहड़ धमा चैकड़ी से दर्शक अपना सिर पीट चुके हैं।

बहरहाल, इस शुक्रवार प्रदर्शित जंगली पिक्चर्स की ‘जंगली’ कई मायनों में अनूठी फिल्म है। पहली बार रसेल चक जैसे हॉलीवुड के स्थापित फिल्मकार ने बॉलीवुड के लिए हिंदी फिल्म निर्देशित करने की पहल की है। ‘जंगली’ में जंगल का कैनवास वाकई अद्भुत बन पड़ा है। गठीले बदन और मार्शल आर्ट में निपुण विद्युत जमवाल को ‘जंगली’ बाहुबली के प्रभास जैसी कामयाबी दिलाने का माद्दा रखती है। हालांकि फिल्म में एक्शन सीन और विशेष प्रभाव वाले दृश्य हॉलीवुड की टक्कर के प्रतीत नहीं होते।

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‘जंगली’ की कहानी ओडिशा में पारादीप बंदरगाह के समीपवर्ती जंगलों में बेशकीमती हाथीदांत के लालची सौदागरों और शिकारियों के वर्चस्व को तोड़ने वाले युवक के हैरतंगेज कारनामों के इर्द गिर्द घुमती है। चन्द्रिका एलिफेंट सेंचुरी के डॉ. दीपांकर नायर (थलाईवासल विजय) का पशु चिकित्सक बेटा डॉ. राज नायर (विद्युत जमवाल) अपने पिता से नाराजगी के चलते मुंबई में नंदिनी वेटरनरी क्लिनिक में काम करता है। उसे शिकायत है कि वनग्राम न छोड़ने की पिता की जिद और लापरवाही ने ही उसकी कैंसर पीड़ित मां को हमेशा के लिए छीन लिया। टीवी पत्रकार मीरा (आशा भट) राज की मदद से ओडिशा जाकर हाथियों के शिकार की लगातार बढ़ती घटनाओं को उजागर करना चाहती है।

पिता और एलिफेंट सेंचुरी में देश की दूसरी महिला महावत शंकु उर्फ शंकरा (पूजा सावंत) के आग्रह पर राज अपनी मां की दसवीं पुण्यतिथि के मौके पर मीरा के साथ वनग्राम लौटता है। बीते दस सालों में हाथियों के शिकार की लगातार बढ़ती घटनाओं से विचलित उसके गजगुरु (मकरंद देशपांडे) की दुरावस्था और बचपन के मित्र फारेस्ट रेंजर देव (अक्षय ओबरॉय) की बेबसी से राज हिल जाता है। इधर, क्रूर शिकारी कुटियन (अतुल कुलकर्णी) विदेशियों के लिए सबसे बड़े हाथीदांत हासिल करने के लालच में राज के प्रिय हाथी भोला के शिकार की योजना बनाता है. मध्यांतर के बाद कहानी नया मोड़ लेती है।
रसेल ने ड्रोन से जंगल में विचरते हाथियों पर नजर रखने, बंदूक और बिजली के करंट से हाथियों का क्रूर शिकार और भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों द्वारा निर्मम यातना व मार्शल आर्ट के दृश्यों का उम्दा फिल्मांकन किया है। थाईलैंड के अद्भुत लोकेशंस फिल्म का प्रभाव बढाते हैं।

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अभिनय के लिहाज से विद्युत जमवाल पूरी फिल्म में छाये हुए हैं। नवागत पूजा सावंत ने स्वयं को महिला महावत के किरदार में ढालने के लिए काफी मेहनत की है। आशा भट ताजगी लिया नया चेहरा है। राज के पिता के रोल में तमिल अभिनेता थलाईवासल विजय का काम अतुल कुलकर्णी, मकरंद देशपांडे और अक्षय ओबरॉय के मुकाबले ज्यादा ध्यान खींचता है। फिल्म का गीत संगीत वाला पक्ष कमजोर होने से ‘फकीर घर आजा’ और ‘गरजे गजराज हमारे’ गीत लोकप्रिय नहीं हो पाए।

‘जंगली’ के संवादों में जंगलीपन कम आदर्शों की दुहाई अधिक है – इतने बड़े हाथी दांत मैंने आज तक नहीं देखे.. जब जानवरों से इतना प्यार है तो चन्द्रिका क्यों नहीं जाते.. आपको जंगल के बाहर की हर चीज बुरी क्यों लगती है.. अब यह जंगल वो जंगल नहीं रह गया, लालच बस गया है यहां.. मीडिया के जरिये हम यह संदेश देना चाहते हैं कि अब जंगल में अगर शिकार होगा तो सिर्फ शिकारियों का.. कलरीपेठ का मूलमंत्र है। सृष्टि के साथ अपनी लय मिलाओ.. हाथी का शिकार करने आये थे अब शेर का भी कर लेंगे.. जब तक आइवरी की डिमांड है, हाथी जीये या मरे दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता.. हाथीदांत के लिए दुनिया में हर पंद्रह मिनट में एक हाथी शिकार बन रहा है, इसलिए मामला थोड़ा जंगली हो गया है…।

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