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क्या इन कवियों को डाँटने-समझाने वाला कोई नहीं है? गिरीश मालवीय की कलम से

Posted on: 23 Oct 2018 12:03 by Ravindra Singh Rana
क्या इन कवियों को डाँटने-समझाने वाला कोई नहीं है? गिरीश मालवीय की कलम से

इस तरह की पोस्ट लिखने से बचता हूँ, लेकिन साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते लिखे बिना रह भी नहीं पाता। जिन्हें बुरा मानना है वे पूरी तरह मानें। कल यूट्यूब पर कोई कवि सम्मेलन सुनने का मन हुआ। मैने देखा कि एक “अखिल भारतीय ” आया। मैं बड़े चाव से सुनने लगा। मंच संचालक ने एक ओज के कवि को काव्यपाठ के लिए बुलाने से पहले उसकी इतनी प्रशंसा की कि मुझे लगा कि काव्य श्रवण का अच्छा अवसर हाथ लगा है।

उस अतिप्रशंसित कवि ने पहले अपनी जाति को लेकर कुछ अजीब टिप्पणियाँ कीं। मैने सोचा कि कुछ हल्की फुल्की बात कर वह श्रोताओं से जुड़ने का प्रयास कर रहा होगा। इतना तो ठीक था। इसके बाद उसने कहा कि वह श्रंगार नहीं लिखता, सिर्फ़ वीर रस लिखता है। इसमे भी कुछ अधिक आपत्तिजनक नहीं था, हालाकि उसकी टोन मे रसराज श्रंगार की अवहेलना का भाव निहित था। मैंने सोचा कि चलो ठीक है। बहुत सारी यहाँ-वहाँ की बातें करके उसने कविता पढ़ना शुरू किया। उसकी वाणी और शैली मुझे अच्छी लगी।

तभी अचानक चार पंक्तियाँ पढ़ने के बाद वह परम ज्ञानी बन कर बोलने लगा। उसने भगवान श्रीकृष्ण को आदिकवि निरूपित करते हुए बड़़ी अजीब बातें कहीं। उसने कहा कि श्रीकृष्ण ने गीता सुनाने के बाद अर्जुन से पूछा कि लड़ेगा कि नहीं? अर्जुन ने कहा कि और गीता सुनने से अच्छा यही है कि लड़कर मर जाऊँ। कवि फिर बोला कि भीमसेन ने अर्जुन से पूछा कि तुम लड़ने के लिए तैयार कैसे हो गये? अर्जुन बोला कि तैयार नहीं होता तो कृष्ण फिर गीता सुनाने लगते।

मुझे यह सब सुनकर बहुत रोष हुआ।क्या श्रीमद्भागवत गीता ऐसा फालतू का ग्रंथ है जिसको अर्जुन सुनना नहीं चाहता। कवि की बात त सुनकर श्रोताओं और मंचस्थ कवियों ने ठहाके लगाए। मैं सोचने लगा कि क्या श्रोताओं अथवा कवियों मे कोई ऐसा नहीं है जो हमारे राष्ट्रनायकों के बारे मे सार्वजनिक मंच से इस तरह की घटिया बातें करने वाले कवि के कान उमेठ कर डाँट यि समझा सके? मंच के स्तर मे गिरावट पर विलाप तो काफी हो रहा है, लेकिन उस नैतिक साहस का कहीं पता नहीं है जो इस तरह की प्रवृत्तियों को दबंगता से सामने आकर रोक सके। मुझे यह लिख कर अच्छा तो नहीं लग रहा, लेकिन खेद भी नहीं है. गलत को गलत कहने का साहस तो साहित्य ने ही दिया है।
(आदि कवि वाल्मीकी हैं )

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